Badami Caves

बादाम नामक सूखे मेवे के रंग की किसी रंग श्रेणी में व्याख्या करना जटिल ही है क्योंकि बादाम के छिलकों का रंग ना तो प्राथमिक रंगों की श्रेणी में है ना ही द्वितीयक.
बादाम के छिलके का रंग ना लाल की श्रेणी में है ना गुलाबी न भूरे. एक अलग ही रंग की श्रेणी बादाम प्रस्तुत करता है और इसी बादाम के रंग को लेकर प्रकृति ने बादामी नगर में पहाड़ों को चट्टानों को रंग है जिस कारण से इस का नाम बादामी पड़ा है.

अपने सामर्थ्य, कौशल और अधिक आध्यात्मिकता को ध्यान में रख ध्यान लगाने के लिए हमारे पूर्वज ने इस भाव से निर्माण किया है जहाँ मूर्ति स्थापत्य की कला का अद्भूत प्रदर्शन से साक्षात्कार होता है

बादामी नामक छोटा शहर कर्नाटक राज्य के मध्य मैं एक भाव और रोचक पर्यटन स्थल है जिसकी यात्रा के इतिहास के दृष्टिकोण से भारत की समृद्धता क्षमता और कार्यक्षमता का न केवल अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है बल्कि विस्मित भी कर देती है

तो आज की मानवीय क्षमता को देखें तो बिजली और फॉसिल फ्यूल संचालित उपकरणों के माध्यम से कोई भी कार्य जटिल से जटिल कार्य कम समय में आसानी से कर लिया जाता है बिजली का आविष्कार होने के पूर्व मानव संस्कृति अपने बाहुबल के माध्यम से ही उपलब्ध नैसर्गिक और मूलभूत लोहे ताँबे के हथियारों के माध्यम से चट्टानों को काटकर पहाड़ों में वो सौंदर्य प्रस्तुत कर दिया है कि देखने के लिए दो आँखें भी कम पड़ें और आपकी उंगली दांतों के बीच में दबाना ही पड़े

पांचवीं छठी सातवीं शताब्दी में चालुक्य राजवंशों द्वारा बनाए गए इन गुफाओं में सनातनी और जैन धर्मो के पितृपुरुष, देवताओं की मूर्तियों को पहाड़ में गुफा बनाकर पर्याप्त रोशनी में बनाया गया है जहाँ गर्भगृह में शिवलिंग भी स्थापित किए गए हैं

किसी भी ऐतिहासिक स्थल की यात्रा उस काल के समाज की व्यवस्थाओं स्त्री पुरुषों के रहन सहन की शैली वस्त्रों का डिज़ाइन ज़ेवर आभूषण का विन्यास यदि देखने को मिले उस स्थल की आप प्की यात्रा सार्थक है बादामी की गुफ़ाओं की यात्रा ना केवल शिव पार्वती विष्णु लक्ष्मी ब्रह्मा वराह अवतार और भू देवी गरुड़ और जैन तीर्थंकर की मूर्तियों का बादामी की चट्टानों में स्थापित चार गुफ़ाओं में दर्शन न केवल दर्शनी है लोमहर्षक है और आश्चर्य चकित करने योग्य हैं

चट्टानों पर मूर्तियों को बिना त्रुटि, सही आकार एवं विन्यास देखकर एक सजावटी पैटर्न की अद्भुत प्रस्तुति मानव शरीर की कल्पना की शक्तियों और भुजाओं की सामर्थ्य को आलोकित रूप से प्रस्तुत करती है सही विन्यास में बनाए गए गुफा के अंदर के खंभे पर संभवतः छैनी- हथौड़े के माध्यम से बनाए गए विभिन्न दैवीय मूर्तियों के साथ उस दौर के नर नारियों के मूर्तियों और विभिन्न सामाजिक व्यवस्थाओं के पत्थर-चित्र अनिर्वचनीय हैं अविस्मरणीय है अकल्पनीय हैं. यहाँ तक की उस काल की सामाजिक व्यवस्था के ज़ेवर आभूषणों की शैली भी किसी को आश्चर्य चकित करने योग्य प्रस्तुति से कम नहीं है

बादामी नगर अपने बादाम के जैसे रंग की पहाड़ियों में सिर्फ़ मूर्ति कला को प्रस्तुत नहीं करती हैं बल्कि सम्मुख छत की अंदरूनी दीवार पर आज से लगभग १४०० वर्ष पूर्व के हर्बल रंगों के माध्यम से बनाए गए भित्ति चित्रों के लंबे चित्र श्रृंखला क्षेत्रों से भी आलोकित करती है. जो आज तक लगभग सुरक्षित रंग तो प्रस्तुत करते हैं

गुफा क्रमांक एक में जहाँ शिव की मूर्ति में अब 18 भुजाओं को जोड़कर नवग्रह जैसा प्रस्तुति देने का सफल प्रयास है कालो के काल भगवान शिव के अद्भुत रूप को प्रस्तुत करता है
भगवान विष्णु की एक मूर्ति कुछ जितनी गज़ब बन पड़ी है जिसे देख और अलौकिकता का आभास होता है मानव शक्ति की कल्पनाशीलता का आभास होता है जहाँ से शेषनाग के शरीर की कुंडलियां की रचना के ऊपर भगवान श्रीविष्णु एक विशिष्ट योग शैली में विराजमान है तथा उनके मस्तक के ऊपर शेषनाग भगवान के पाँच फन की छत्रछाया प्रदर्शित है भगवान विष्णु की विशेष बैठक शैली में बाएँ पैर की एड़ी के मूलाधार को स्पर्श करटे हुए प्रदर्शित की गई है जो की सक्रियता के प्रयास को समर्पित है. इस दौर की भी पेनियल ग्लैंड की उत्तेजना को स्थापित करने के लिए प्रदर्शित हैं

इन गुफाओं के खंभों से के भिन्न आकार के दृश्य होने की गोलाकार और सीढ़ीनुमा विन्यास उस दौर की शिल्प कर्मियों की कल्पना को प्रदर्शित करते हैं और इस दौर के नागरिकों के विस्मित होने का कोई कारण नहीं छोड़ते है. बादामी क्षेत्र की चट्टानों के हज़ारों वर्ष का इतिहास की उपस्थिति से चट्टान के पत्थरों में विभिन्न गहरे लाल और हलके लाल रंगों का अद्भुत द्रश्य प्रदर्शित होता है जो किसी प्राचीन दौर में समुद्र के जल के संपर्क में हज़ारों वर्ष तक बने रहने से समुद्र के जल स्तर में उपस्थित तत्वों जैसे मैगनीशियम, कैल्शियम, सेलेनियम आदि के कारण इन पत्थरों पर चट्टान पर गहरे लाल भूरे और स्याह रंग के अनमोल छटा भी प्रदर्शित करता है. इन मूर्तियों में भी पत्थर के विभिन्न रंग अपनी छटा बिखेरते हैं जिनके दर्शन मात्र से आपके मस्तिष्क की कोशिकाओं मैं आश्चर्य का अमृत दोगुना हो जाता है

इस प्रकार की रचनाओं की निर्माण में त्रुटियों की सम्भावनाएँ एकदम शून्य स्तर पर रखे जाने का विशिष्ट निर्देश पालन किया जाना अनिवार्य होता है इन गुफाओं के निर्माता चालुक्य राजाओं के द्वारा निर्मित इन मूर्ति कलाओं का त्रुटिरहित प्रस्तुतिकरण दीवारों पर अंकित मूर्तियों खंभों पर बनी विशिष्ट मूर्तियों और डिजाइनों के साथ अच्छा और बनी मूर्तियों की कला त्निर्माण उस दौर की कला के उच्च स्तर को प्रदर्शित करता है
जहाँ प्रथम गुफा भगवान शिव को समर्पित हैं तो द्वितीय व तृतीय गुफा सृष्टि के संचालक भगवान विष्णु को समर्पित है गुफा क्रमांक चार जैन एवं बौद्ध शैली में जैन तीर्थंकरों को समर्पित है.

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