शासन ने तो अपने कर्तव्य निभा दिया और अब 1 अगस्त से दो पहिया वाहन चालकों को हेलमेट पहने बिना पेट्रोल नहीं मिलेगा. आखिर इस प्रकार के उपायों से हम आम नागरिक प्रेरित क्यों नहीं हो पाते हैं. क्या हम तंत्र के विरुद्ध एक अघोषित युद्ध छेड़े हुए हैं कि किसी भी कानून के चलते हेलमेट का उपयोग नहीं किया जायेगा. किसी दुर्भाग्यशाली दिन को दुर्घटना हो जाने पर हम बड़ी चतुराई से सड़क निर्माण में कमी और अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ करते हुए डॉक्टर की लूट को कोसते रहते हैं.
किसी भी युवा वाहन चालक के लिए देश की सड़क ही उसके प्रथम अपराध की जन्मभूमि होती है जो समय से अपराधों की श्रृंखला स्थापित करती है. छोटे अपराध जैसे बिना अनुज्ञा पत्र के वाहन चलाना, चौराहे की लालबत्ती संकेत पर वाहन ना रोकना, ज़ेबरा क्रॉसिंग के पूर्व ही वाहन रोक लेने का पालन न करना या गलत दिशा से अतिक्रमण कर वाहन चलाना हम भारतीयों की आदत में सम्मिलित है. ग्रामीण क्षेत्र तो है ही नगरों में भी वाहन चलाते समय नियमानुसार सड़क पर वाहन चलाने के प्रति अनुशासन का पालन करते नहीं देखा जाते है. यह आश्चर्य और मंथन का विषय है कि भारत में वर्ष 2021 में 26593 तथा 2022 में 500029 मौतें दो पहिया वाहन के उन चालकों की हुई है जिन्होंने एक छोटे से अनुशासन हेलमेट पहनने का पालन नहीं किया और चालक असमय कालकवलित हो गए. एक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय सड़कों पर दो पहिया वाहनों से होने वाली प्राणघातक दुर्घटनाओं में से लगभग 71% मौतें हेलमेट न पहनने के कारण होती हैं.
हाल ही में दो-तीन सड़क दुर्घटनाएं ऐसी हुई है जो मात्र चुटकी भर अनुशासन के अभाव का प्रतीक है जिनके कारण वाहन चालकों को असामयिक ओर दुखद मृत्यु का वरण करना पड़ा है. एक उदाहरण में जन्मदिन का केक मध्यरात्रि को समय पर पहुंचने के लिए गलत दिशा से घुसे एक कार चालक के सामने बाइक सवार दो महिलाएं सामने से दुर्घटना का सामना कर अपने प्राण गवां देती हैं. एक और घटनाक्रम में आपने बीमार बच्चे को अस्पताल दिखाने के लिए जाती बाइक पर पीछे बैठी महिला सड़क के गड्ढे में बाइक के उछल जाने से सर के बल गिर पड़ती हैं और जीवन मृत्यु संघर्ष में अस्पताल में बेहोश पड़ी है. इन सभी प्रकरणों में हेलमेट ना लगाना और थोड़े से समय को बचाने के लिए सड़क की निश्चित दिशा को छोड़ विपरीत दिशा से शॉर्टकट को माध्यम बना लेना न केवल मौत के घाट उतार देता है बल्कि आरोपी वाहन चालक का जीवन भी नर्क बना देता है. बढ़ते और उन्नत होते भारत की सड़कों पर न केवल ट्रैफिक बढ़ा है बल्कि सड़क लगातार चौड़ी होती जाने के बावजूद भी वाहनों की संख्या में कमी नहीं हो रही है और जब भारत में “चलता है की” संस्कृति का प्रादुर्भाव भारतीय मानस में अविरत रूप से जारी हो तो साल भर में भारत में सड़क दुर्घटनाओं के अंतर्गत डेढ़ लाख से अधिक होने वाली मौतों को न केवल बचाया जा सकता है बल्कि परिवार का मुखिया या सहायक की मौत या लकवाग्रस्त होने के बाद लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहता है उसके बाद जो व्यक्ति,धन ओर समय हानि होती है वह एक हेलमेट या एक सीट बेल्ट के समय से पहनने तथा चुटकी भर अनुशासन से सड़क की दुर्घटनाओं का आंकड़ा नीचे रखा जा सकता है. अनुशासन मुकुट की भांति होता है जिसके सर सजता है वह सुंदर ही दिखता है और सड़क पर किए गए अनुशासन के पालन से न केवल ठन्डे मस्तिष्क से दूरी तय करने का अनिवार्य कार्य भी पूर्ण होता है बल्कि कामकाज के स्थान पर भी पूर्ण निष्ठा से कार्य संपन्न कर देश की उन्नति में सहायक होता है. यह ‘जुगाड़’ और ‘चलता’ है, की संस्कृति से आम व्यक्ति की हानि अधिक होती है जो पालन किया जाए तो परिवार, समाज तथा देश के लिए हितकारी है.
कुछ वाहन चालक तो हेलमेट पहनने के बाद भी इस अंतिम यात्रा से नहीं बच पाए क्योंकि उन्होंने हेलमेट का बेल्ट नहीं लगाया हुआ था. हेलमेट का बेल्ट नहीं लगाया हुआ था तो दुर्घटना होते से ही यह हेलमेट रूपी आत्मरक्षा उपकरण अपनी जगह छोड़ गया और पक्की सड़क पर सिर टकराने से वाहन चालकों की मौत हो गई.
आंकड़ों को देखा जाए तो बाइक स्कूटर और इलेक्ट्रिक दो पहिया वाहन की सालाना बिक्री लगभग एक करोड़ 80 लाख से अधिक है जबकि भारत में हेलमेट का उत्पादन 5 करोड़ के लगभग है प्रतिवर्ष है जिसमें से 4.5 करोड़ हेलमेट उच्च गुणवत्ता के ब्रांड श्रेणी के होते हैं वही 50 लाख के लगभग स्थापित ब्रांड्स के देसी स्तर पर बनाए जाने वाले हेलमेट की संख्या होती है.
आमतौर पर यह देखा जाता है कि जो वाहन चालक हेलमेट का प्रयोग करते हैं वह अनुशासित रूप से सड़क के नियमो जैसे ज़ेबरा क्रॉसिंग, रेड लाइट, सड़क की लेन आदि का पालन भी करते हैं. इस संस्कृति का विकास किया जाना अनिवार्य होगा जहां दो पहिया वाहन चालक न केवल स्वयं हेलमेट का धारण करें बल्कि पीछे बैठे साथी और यदि कोई बच्चा या महिला ओर वृद्ध भी हो उसके लिए भी हेलमेट साथ में रख पहनना अनिवार्य करें.
अनुशासनपरक संस्कृति अधिक लंबे समय तक सड़क-सुरक्षा की भावना विकसित कर पाएगी. यहाँ सेल्फ-पुलिसिंग अर्थात आत्म अनुशासन के माध्यम से वाहन चालन को एक सुरक्षित आवागमन बनाया जा सकता है. समाज में सड़क परिवहन में जो अनुशासनहीन व्यवस्था जारी है वह समय अनुकूल नहीं है और इसी के कारण ऊपर वर्णित दुर्घटनाओं के उदाहरण से यह समझ जा सकता है कि हमें किस स्तर पर अपने मानस, वाहन चलाने की शैली और कार्यशैली को परिवर्तित करना होगा.
दो पहिया वाहन सवार एक गलती अनजाने में करते हैं कि पीछे बैठे परिवार को बिना हेलमेट के वाहन पर बिठाते हैं और संतुलन बिगड़ने की स्थिति में पीछे बैठी महिला, बच्चे, बुजुर्ग बड़ी आसानी से रोड हिट करते हैं और सिर की गंभीर चोट को प्राप्त होकर मौत या जिंदगी के बीच अस्पताल पहुंचकर पूरा वित्तीय संतुलन बिगाड़ देते हैं. हालांकि शासकीय योजनाओं में वाहन क्रय करते समय ही हेलमेट साथ में विक्रय किया जाता है परंतु अनुशासनहीनता के चलते आम नागरिक हेलमेट न पहनकर अपनी हेठी या नासमझी में एक बड़ी कीमत में चुकाने को तैयार हो जाते हैं.
प्रजातांत्रिक व्यवस्था में देश के मेट्रो शहर जैसे दिल्ली मुंबई बेंगलुरु हैदराबाद चेन्नई आदि में नियम पालन के बेहतर प्रयासों की से 80% तक वाहन चालान हेलमेट का पालन करते हैं वहीं छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्र में स्थिति अति विकट है क्योंकि पुलिस सर्वत्र उपस्थित नहीं रह सकती है अतः भारत के सुधि औषधि नागरिकों को चुटकी भर अनुशासन यानी स्वयं-पुलिसिंग की भावना को सीखना और मानना होगा ताकि वाहन चलाते समय हेलमेट ना पहनने से दुर्घटना में प्रतिवर्ष 50000 से अधिक होने वाली मौतों और अनावश्यक वित्तीय भर को एक इस छोटी सी आदत से रोका और संभाला जा सके.
वैसे तो पांच प्रकार के हेलमेट, बाजार में उपलब्ध होते हैं परंतु फुल-फेस, ओपन-फेस, मॉड्यूलर और मोटो क्रॉस हेलमेट एक आदर्श संरचना के माध्यम से 100% सुरक्षा प्रदान करते हैं वही हॉफ-फेस हेलमेट कपाल की रक्षा तो कर लेते हैं परंतु सिर के सामने एवं पीछे के हिस्से को सुरक्षा नहीं दे पाते हैं. आने वाली संततियों को हर वाहन के चलाने के प्रशिक्षण के दौरान हेलमेट न पहनने के दुष्प्रभाव की सोशल मीडिया लिंक भी साझा की जाना चाहिए ताकि दुर्घटना से थोड़ा भय पैदा हो और वाहन चालक बिना हेलमेट लगाए वाहन चलाने के लिए कभी तैयार ना हो. पीछे बैठे साथी के लिए भी हेलमेट पहनने का नैतिक दायित्व वाहन चालक का हो ताकि सुरक्षा का स्टार उच्च स्तर पर स्थापित हो.
हेलमेट ना पहने के वाहन चालकों के बहाने अस्वीकार योग्य हैं कि फांसी जैसा लगता है, सर दर्द होता है, पसीना आता है, सुनाई नहीं पड़ता है, हवा बंद हो जाती है, अच्छा नहीं लगता है जैसी स्थितियों से समझौता किया जा सकता है परंतु सिर पर चोट लग जाए तो क्षतिग्रस्त हुए मस्तिष्क के ऊतकों का पुनर्जीवन असंभव है. थोडा सा समझौता कीजिये ओर कपाल सुरक्षित कीजिये अन्यथा कपाल क्रिया में देर नहीं है.
कलयुग के इस दौर में जब वाहनों के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है संतुलित गति, हेलमेट का उपयोग, सीट-बेल्ट का बांधना, सड़क के नियमों का पालन से ही देश की बढ़ती जनसंख्या और उस पर चलते वाहनों की बढ़ती संख्या की संकीर्णता से बचने के लिए यातायात नियमों का स्वतः स्फूर्त पालन स्थापित करना होगा अन्यथा दिन या रात में होने वाली छोटी या बड़ी दुर्घटना से होने वाली चोट या गंभीर चोट अथवा मौत की कीमत न केवल परिवार को चुकाना पड़ती है बल्कि समाज और देश भी इससे अछूता नहीं रह पाता है.

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