सरकारी नौकरी अपने आप में एक अभिनव अनुभव और प्रयोग है जिसमें सीमित संसाधनों में न केवल कार्य की अपेक्षा होती है बल्कि भ्रष्टाचार और दुर्व्यवहार के दोषारोपण आपकी इस नौकरी के वेतन के साथ मिलने वाले कदाचित ऐसे उपहार है जिन्हें आपको लेना ही होता है भले उनकी आपको आवश्यकता हो ना हो आप ने भ्रष्टाचार या दुर्व्यवहार किया हो न किया हो !
व्यावसायिक जोखिम !
आज सवेरे सवेरे एक 70 वर्षीय वृद्ध उत्तम स्वास्थ्य स्थिति में तेज़ी से मेरे कक्ष में प्रवेश किये और लगभग आदेशात्मक स्वर में उन्होंने मुझ से विनम्र निवेदन किया कि मुझे कमज़ोरी महसूस हो रही है एक एक्स -रे करा दीजिए ब्लड-प्रेशर शुगर और सीबीसी की जाँच करा दीजिये!
जैसे वरदान!
मैं आश्चर्यचकित भी था और प्रसन्नचित भी था मेरे देश के नागरिक सोशल मीडिया की रीलों और यूट्यूब का दर्शन करते करते स्वयं के शरीर की स्थिति सम्बंधी, रोग की पकड़ और डायग्नोसिस तीनों बनाने में कुछ इतना सक्षम हो गए हैं कि वे चिकित्सक को भी सीधे-सीधे बता सकते हैं ये जाँच करानी है.
अद्भुत!
पिछले लगभग एक दशक से चिकित्सकों के ऊपर से रोगियों का भरोसा कुछ इस प्रकार कम हुआ है कि क्लीनिकल जाँच से अधिक लेबोरेटरी और रेडियोलॉजी की जाँच के प्रति चिकित्सक तो चिकित्सक, रोगी का भी भरोसा जाँचों पर अत्यधिक हो गया है. वे सोचते हैं कि जाँच से रोग की पकड़ बेहतर हो पाएगी और धन राशि ख़र्च होने के साथ साथ मेरे रोग का निदान और उपचार सही प्रकार से आरंभ हो सकेगा
सच हो कदाचित!
इंटरनेट और स्मार्ट फ़ोन के दौर में गूगल या ह्वाट्सऐप अथवा यूट्यूब के इस दौर (भयावह, उत्तम, संवेदनशील होने का निर्णय मैं पाठक के विवेक पर छोड़ता हूँ) में अच्छे से अधिक भ्रामक और अवैज्ञानिक समाचारों का ज़ख़ीरा कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि वह सदैव ही सच प्रतीत होता है.
स्वयंसिद्ध!
कैंसर किडनी मधुमेह जैसी बीमारियों के ऐसे चट मंगनी पट ब्याह जैसे उपचार के विज्ञापन इस प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है कि सुधि से सुधि व्यक्ति भी एक बार तो इस बहकावे और भुलावे में आ ही जाता है और व्यावसायिक वणिक बुद्धियों का शिकार हो जाता है. आश्चर्य तो इस बात का होता है कि आधे से अधिक जनसंख्या को विज्ञापन आधारित उपचार पर अधिक भरोसा है और अपने शासन की तंत्र में भी उपस्थित चिकित्सकों और तंत्र के अवयवों पर कोई भरोसा नहीं होता है विश्वास नहीं है. अब जबकि न्याय के तराजू में तौला जाए तो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के माध्यम से न केवल त्वरित डायग्नोसिस संभव है और जटिल से जटिल रोगों का समुचित नियंत्रण और उपचार भी पहले की तुलना में अधिक सुगमता से उपलब्ध भी है.
सक्षम निर्णय!
खैर मैंने उन साधु पुरुष को सारी ऑन-डिमांड जाँच लिख दी. सवा घंटे बाद वे अपनी सारी जाँचें लेकर उपस्थित हुए सभी जाँचें सामान्य स्तर को इंगित कर रही थीं. मेरे यह कहने पर कि आप बिलकुल ठीक है वे प्रसन्नचित होकर चले गए.
संतोषम अपहरणम!
अहम का भाव एक ऐसी स्थिति में उपस्थित होता है जो यदा कदा बाहर घूमने को निकल जाता है और शासक के तंत्र की परीक्षा का सबसे बड़ा उदाहरण शासकीय चिकित्सालय हैं जो मध्य प्रदेश में तो कम्युनिटी हेल्थ सेंटर, प्राइमरी हेल्थ सेंटर और अन्य शासकीय चिकित्सालयों के माध्यम से उपलब्ध है जहाँ अन्य सरकारी विभागों से प्राप्त की अवहेलना उलाहना असंतोष इत्यादी का बदला चिकित्सालय में सेवा को प्रस्तुत चिकित्सकों , परिचारिकाओं और वार्ड सेवकों से निकाल लिया जाता है. शासकीय अस्पताल दबाव के अभिन अंग हैं जहाँ दवाई से लेकर पोस्टमार्टम को रिपोर्ट तक ऐन-केन प्रकारेन
दबाव प्रस्तुत किए जाते हैं.
प्रक्रतिम सत -रज- तम
चूँकि अस्पताल कोई धारा नहीं लगा सकते, बुरा नहीं सोच सकते तो इसलिए दबाव के समक्ष नतमस्तक हो जाते हैं क्यूंकि रोगी का त्रुटिपूर्ण कथन भी चिकित्सक के सारे सत्य से उच्चतर स्तर पर होगा. मानो या कि न मानो!
नतमस्तकम
कई बार यह कहने में भी आता है कि इस चिकित्सालय में ये जवानी की इतनी गर्मी दिखा रहे हो तो क्या यही गरमी कलेक्टर कार्यालय या पुलिस स्टेशन पर दिखा सकते तो पता नहीं तुम्हारा क्या हाल होता!
जो है सो है!

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