Respect Is Eternal

आदरणीय, आप, तुम, तू से तूतू, मैंमैं तक

भीड़ चीरकर आगे पहुँच मैंने, टिकट खिड़की पर बैठे सज्जन पुरुष से कहा,

आदरणीय, क्या आप मुझे दो टिकट दे पाएंगे ?

नो सर, शो इज फुल्ली सोल्ड आउट!

टिकट विक्रेता ने अंग्रेजी में संवाद किया. मैंने अंतिम प्रयास कर कहा,

देखिए कुछ सहायता कीजिए ना, आप कर सकते हैं.

आपकी भाषा-शैली से मुझे मेरी अहमियत का बड़ा भावुक अनुभव हुआ है. मेरी खुद की दो टिकट-कम-पास है और मैं उन्हें आपको देता हूँ नि:शुल्क क्योंकि ये मुझे स्टाफ कोटे से मिली है.

टिकट विक्रेता ने जैसे यह कहकर बम फोड़ा.

मेरे ह्रदय और चेहरे पर हर्ष मिश्रित उदास मुद्रा के भाव उपस्थित हो गए. परंतु विक्रेता ने पास थमा दिए.

तो ये है जादू, भाषा के अलंकार का बोलचाल में प्रयोग करने का. यदि यही ग्राहक कहें, अबे तू दो टिकट देगा क्या?

तो निश्चित रूप से उत्तर ना ही आएगा भले ही टिकट शेष ही क्यों ना हो अथवा सह्रदय भाव से टिकट प्राप्त ना होगा.

मीठी बोली मीठा व्यवहार, कसैले बोल तो खट्टा या कड़वा व्यवहार. 

मानवीय संबंधों का शिलालेख बरसों और दशकों में छैनी-हथोड़े की चोटों से अंकित होता है. व्यवहार की स्याही से लिखा जाने वाला यह मानवीय सबंधों का अद्भुत विज्ञान अनिश्चितता की लिजलिजी भूमि पर यात्रा आरंभ कर मन्वंतर में शिलालेख की स्थिति को प्राप्त हो यह कामना होती है. अभिवादन के स्तर से संबोधन का भाव का मानवीय संबंध स्थापना का भले ही छोटा सा अव्यय हो, सीमेंट की भांति कार्य करता है. स्त्री-पुरुष, युवा-वृद्ध के मध्य संबोधन में आदरणीय या आप जैसे सुधी शब्दों का प्रयोग चाशनी की भांति कार्य कर सकता है जो गोंद के लड्डू जैसे जटिल व्यंजन को भी एक सूत्र में बांध लेता है. इसी प्रकार आप जैसे आदरसूचक संबोधन का अनुवादक शब्द, अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध ही नहीं है. आदरणीय के संबोधन से स्थापित हुई संबंधों की ट्रेन आपके मानसिक धरातल पर उतरती है तो कालांतर में संबंधों की उष्मा तुम और तू के स्तर पर पहुंचने की संभावना को जीवित रखती है. हालांकि आदरणीयता के उच्च स्तर से प्रस्फुटित संबंधों का बीज तू-तड़ाक के अनौपचारिक स्तर पर पहुंचे आवश्यक नहीं. परन्तु आदरणीयता की औपचारिक शैली, अनुशासन व पारिवारिक संस्कार का एक अभिनव उदाहरण अनुभव प्रस्तुत करती है. वहीं अनौपचारिकता की जमीन पर गिरते संबंधों के बीज का वृक्ष रूपी प्रगाढ़ता में परिवर्तन पूर्णकालिक मित्रता का हामी है। इस श्रृंखला में तुम से तू और तू से कतिपय अपशब्दों से मित्र को संज्ञा देना एक अलग ही सागरमाथा स्तर है जहाँ आप प्रेम, सहनशीलता के साथ दशकों का याराना बिना लिहाज प्रदर्शित होता है, जो आपसी संबंधों की सुदृढ़ भूमि पर महाबोधि वृक्ष की भांति खड़ा होता है.

है.

ढक्कन है क्या घर पर?

अधिकारी के निवास पर आगंतुक ने बिना लिहाज पूछ डाला नौकर ने भी भीतर जाकर सूचना दी कि साहब के बचपन के मित्र आए हैं.

अधिकारी विस्मित. 

तुम्हें कैसे पता चला?

जी, उन्होंने आपको सर या आप के नाम से नहीं बल्कि बचपन के छेड़खानी वाले नाम से संबोधित किया इसलिए समझ में आ गया.

खूब रंग जमा जब दोनों मित्र फिर मिल बैठे. 

जितना प्यारा संबोधन आदरणीय है, उतना ही सम्मोहक संबोधन है, तू, यदि इसे मित्रों, भाई-बहनों के मध्य प्रयोग में लाया जाए. तू जैसे संबोधन का प्रयोग प्रेमी-युगल के मध्य एक दूसरे के प्रति प्रेम प्रतीक का प्रिय संबोधन हो सकता है जब सुसंगता की अनुकूलता उच्च स्तर पर पहुँच रही हो. यही संबोधन, तू आपसी विवाद का विषय भी हो सकता है. यदि उच्च स्वर-नाद से इसका उच्चारण किया जाए तो ऐसा संबोधन तू-तू, मैं-मैं का उत्पत्तिकारक भी बनता है. सम्मानसूचक आदरणीय में, प्रेम-तत्व,भले कम हो, तू जैसे अनौपचारिक संबोधन में प्रेम या घृणा का तत्व अत्यधिक मात्रा में उपलब्ध होता है.

जहाँ मुँह बंद होता है वहाँ से मौन की भाषा नेत्रों के माध्यम से आरंभ होती है. भाषा नैनो से व्यक्त हो या कंठ संग जिव्हा से मस्तिष्क के उतार चढ़ाव को प्रस्तुत करती है. मस्तिष्क का ज्वार-भाटा शब्दालंकार के माध्यम से जुबानी ज्वार की प्रस्तुति हो सकती है तो मौन रूप में सामुद्रिक भाटा का प्रतीक बन प्रस्तुत होता है. जहाँ नैन उदास,, उद्दात सूने, हँसते, खिलखिलाते, रसमय, स्निग्ध, बुझे परिद्रश्य के साथ सुधि मानव को द्रवित कर सकते हैं तो जिव्हा के मार्ग पर चलकर उपस्थित हुए शब्द पुष्प की भांति मन मुदित कर सकते हैं अथवा पाषण की भाँति आघात के हामी हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं. प्रेम भाव से कहे गए आदरणीय जैसे संबोधन शब्द अथवा आप जैसे शब्द या तुम की स्निग्धता हृदय तक तिरोहित हो मन को मृदंग जैसा अनुभव कराती है. वही द्वेष भाव से आदरणीय, आप, तुम या तू का बाण रूप मस्तिष्क हृदय और आत्मा तीनों को भेदने में सक्षम है. शब्द वही है भाव अनंतर है, निर्णायक है तब भी जब द्वापर में शब्दबाण से महाभारत जैसा विनाशकारी युद्ध घटित हुआ. आपसी सम्बन्धों के भारी भरकम रगड़ खाते संपर्क-सतहों को चिकनाई देने वाला तत्व आपस में बोले जनि वाली भाषा ही है जो रक्त -तप्त होते संबंधों को शांत रखने का कार्य कर सकती है, चाहे वह भाषा के मौन से संभव हो अथवा मीठी भाषा से आलोकित हो. जुबान से उत्पन्न जबान यानी वाणी का वास्तविक कार्य वस्तुत: बात को कहना नहीं कदाचित ढंकना है. कुशल वाकशक्ति से उचित शब्दों का संयोजन व उपयोग से सभ्यतापूर्वक अनुशासित व आचार्य, विद्वान श्रेणी के वक्ता व ठग वक्ता दोनों का विशेष कौशल हो सकता है. नए संपर्क से आदरात्मक संबोधनों से सचेत रहने की भी आवश्यकता है. क्षणिक व्यावसायिक संपर्क की तुलना में दीर्घकालिक संपर्क से सिल-बट्टे पर चौकस निगाह बनाए रखना समय की मांग है, आदरणीय.

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