
वर्ण व्यवस्था की कितनी भी आलोचना की जाए, यह तो तय ही है कि प्रत्येक व्यक्ति में परिवार-समाज की सुरक्षा का क्षत्रीयत्व भाव की उपस्थिति अनिवार्य है. उसके साथ ज्ञान के अर्जन व व्यावहारिकता में ब्राह्मणत्व भाव की विभिन्न मात्रा में उपस्थिति न केवल दृष्टिगोचर होती है बल्कि आवश्यक भी है. इसी प्रकार मानव, व्यावसायिक बुद्धि के प्रयोग से व्यावसायिक तत्वों का अधिष्ठाता हो थोड़ा- बहुत तो सौदा कर ही लेता है. तथापि थोड़ा-बहुत घरेलू स्वच्छता हेतु शुद्र भाव का भी हामी है. ऊर्जा के विभिन्न आयामों से ये चारों वर्ण प्रत्येक मानव में अपनी प्रतिभा से आलोकित या विलोपित होते रहते हैं. इसी प्रकार चार अन्य तत्व भी मानव मानस के अधिकारी हैं जिन्हें रायचंद, ज्ञानचंद, करमचंद व जयचंद जैसी श्रेणियों में रखा जा सकता है और थोड़ा सा मन-मंथन करें तो आप भी इस मानस के कतिपय व्यक्तित्वों को अपने समीप अवश्य पाएंगे.
प्रथम श्रेणी के रायचंद, एडवाइजरी बोर्ड के अध्यक्ष, सचिव या सदस्य सब घोषित-अघोषित रूप से समझ प्रस्तुत रहते हैं. इनके मुख्य वाक्य, ऐसा कर लेना था…, यह कर लो…, अरे मुझे बताना था… जैसे जुमले अतिप्रिय होते हैं. यह सदा सहायक होते हैं पर मात्र जुबानी रूप से. देने को आए तो यह रायचंद श्रेणी के वीर पसीने की एक बूंद भी न दे पाए. सदा ही बिना पूछे अपनी स्वयंभू-राय देने के हामी हो शुभचिंतक बने रहने का ढोंग कर प्रस्तुत होते हैं. रायचंद से ज़रा गहराई से टेक्निकल बिंदुओं पर चर्चा कर लें तो वे शून्य हो जाते हैं. मूलतः शून्य स्तर के होने के बाद भी कलदार याने सर्वज्ञानी दिखने के प्रयासरत्त अमूमन, रायचंद चाय- कॉर्नर, कॉफी-पार्लर, पान-शॉप पर गहन चर्चा करते नजर आते हैं. इनके विषयों की कोई सीमा नहीं है. विराट कोहली को यह शॉट कैसे खेलना था… से लेकर पुतिन के यूक्रेन पर हमले की सामरिक योजना तथा अगले हमले पर यह करना चाहिए, का उद्घोष यदाकदा श्रवण हो जाता है. आप विषयांतर कर दे तो भी वह उसी दक्षता से जीभों की लपालप करते हुए आपको निरुत्तर करने को नए विषय पर भी सदैव तैयार होते हैं. बजट सत्र में वित्तीय चर्चा, कश्मीर पर भारत को क्या करना होगा जैसे विषयों पर भी ये छद्म-ज्ञानी, ज्ञान की गंगा बहाने में चूकते नहीं है, भले खुद के करियर में भतेरे छेद हो रखे हों तथा विपन्न आर्थिक स्थिति के धनी होकर ये पान-शो के स्वामी और ऑडी शोरूम के स्वामी दोनों को समान अधिकार से मार्केटिंग के गुर निशुल्क उपलब्ध करा देते हैं. राय-उत्पादक नामक सॉफ्टवेयर कमोबेश हर मानव में उपस्थित हैं और बिना मांगे बोल उठने को आतुर है. यह सॉफ्टवेयर वाचाल रूप से सक्रिय है तो सुधिगण में भी बेसुध पड़ा है और जब तक पूछा ना जाए, यह सॉफ्टवेयर अपने कुलीन स्तर को छुपाएँ रखता है और तोल मोल के ही अपने मस्तिष्क को जिव्हा विभाग को कष्ट देता है. रायचंद राजनीति क्रिकेट और जीवन जीने के तरीकों पर अपनी प्रतिभा से गीताग्रंथ जैसी रचना को कलमबद्ध करने को भी प्रस्तुत होता प्रतीत होता है जब तक कि कोई मूर्ख-शिरोमणि इन्हे परम ज्ञानी ही ना समझ लें.
इसके विपरीत ज्ञानचंद मानस के व्यक्ति श्रमसाध्य हो सदैव-विद्यार्थी-भाव के वाहक होते हैं. अपने अर्जित ज्ञान के साथ-साथ वे नए ज्ञान-विज्ञान, कला-संस्कृति के प्रति जिज्ञासु भाव के निरंतक साधक बने रहते हैं. समाज के प्रत्येक तबके में ये सम्मान के अधिकारी होते हैं क्योंकि वे मस्तिष्क और जिव्हा के संतुलित प्रयोग से स्वर्ण जैसे शब्द उत्पन्न करते हैं. ज्ञानचन्द अपने ज्ञान के घमंड से परे हो विज्ञान-भूगोल या कला के समंदर की एक बूंद बने रहकर तो स्वयं के तुच्छ भाव को प्रकट करते हैं. अनुशासन, शिक्षा-ग्रहण भाव के सादे भाव से ज्ञानचंद अपने क्षेत्र विशेष में सशक्त हस्ताक्षर बन जाते हैं जिससे समाज-देश को सदैव सकारात्मक पूंजी प्राप्त होती है. ज्ञानचन्द में रायचंद उपस्थित हो जाए तो ज्ञानचंद की संभावित उन्नति पर गतिरोधक आरोपित प्रतीत होगा. ज्ञानचंद को भी रायचंद होने से बचने के अभीष्ट प्रयास करना समय की मांग है अन्यथा ज्ञानचंद भी राय चंद्रगिरी के भंवरजाल में डूब जाए तो माया मिली ना राम की उक्ति चरितार्थ होगी. ज्ञानचन्द समय की धरोहर है जो ज्ञान-गंगा को एक काल से दूसरे काल तक पहुंचाने में सहायक है. सतयुग से आज कलयुग तक पृथ्वी पर उपस्थित ग्रंथ, उपनिषद, पुराण के साथ मानव निर्मित भौगोलिक रचनायें,ज्ञान के स्वामियों के माध्यम से ही अंतरित होती आई है. निस्वार्थ भाव के स्वामी ज्ञानचंद की जमात समाज की, देश की अनमोल धरोहर है जिन्हें संभालकर रखा जाना चाहिए.
करमचंद – कर्मण्येवाधिकारस्ते…, के गीता महाश्लोक के अनुयायी करमचंद मानव के सार्थक जीवन के अनमोल घटक है. चार बरस की आयु के बाद से लेकर अंतिम सांस तक कार्यालय में लीन बने रहने वाले करमचंद चाहे वह बचपने में विद्यालयी अथवा खेल शिक्षा हो, किशोरावस्था में महाविद्यालयीन शिक्षा, वयस्क अवस्था में करियर जनित श्रम हो या वृद्ध-अवस्था में मात्र जीवित रहने की श्रमसाध्य कार्य, करमचंद हमेशा कार्यरत रहते हैं. कर्म का पाठ आलस का दुश्मन है जो ऊर्जा का वाहक हो कर कार्य सिद्धि का प्रतीक है. रोटी-कपड़ा-मकान, वाहन-धन-संपदा, शिक्षा-सुरक्षा के मूल में है कर्मबल का मंत्र जिसकी सिद्धि से जन्म जन्मांतर से प्रगति होती चली आयी है., करमचंद कलम या हथियार, औजार या कौशल से जीवन को सफल बना लेते हैं. करमचंद, लक्ष्मी और सरस्वती दोनों का आसानी से वरण कर लेते है. धैर्य और संतोष के धनी करमचंद ज्ञान के अमृत को जोड़, जीवन के मैदान में भी सफल खिलाड़ी होते सिद्ध होते हैं जो अपनी धनात्मक ऊर्जा से परिवार
उर्जा से समाज देश की धरोहर सिद्ध होते हैं. कर्मवीर, आपने कर्म-तत्व से सैनिक, चिकित्सक, अधिकारी व्यवसायी, श्रमिक या छात्र रूप को आत्मसात कर अपने भुजबल से भविष्य की अनुपम गाथा का इतिहास लिख ही लेते हैं. कछुए की भाँति चलते रहने के हामी करमचंद खरगोश को मात दे एक अनुशासित और नेक जीवन शैली से सफल और मोक्ष जैसा जीवन उत्पन्न कर समाज के अद्भुत किरदार रूपी उदाहरण स्थापित होते हैं.
जयचंद – असंतोष और खीज-भाव के धनी ये जातक अपनी सफलता की रेखा को बड़ी करने के लोभ में अन्य प्रतिस्पर्धियों की रेखा मिटाने में अधिक विश्वास करते हैं भले ही इस हेतु उन्हें परिवार-समाज-देश या मानव जाति के विरुद्ध ही क्यों न जाना पड़े. प्रकृति की प्रस्तुत इस लीला में, पृथ्वी पर मानव जन्मों के विभिन्न मानसों में यह जयचंद अवस्था अजीब है जहाँ दूसरे के माल हड़पने, सत्ता पर अन्यायपूर्वक काबिज होने या स्वार्थपरक हो देह-देश के शोषण को बिना हिचक ये व्यक्तित्व उपस्थित होते जाते हैं. प्रकृति भी इन ऋणात्मक साधकों को अपनी पारी खेलने का अजब-गजब मौके देती है. उदाहरणों की श्रृंखला में पहचान करने का दायित्व में पाठकों पर छोड़ता हूँ परंतु आप के आसपास से लेकर दूर-दूर तक इस प्रकार के द्रोही मानस आपके नैनो के समक्ष तैर जाएंगे. लिंग, आयु, अवस्था और नैतिक मूल्यों के पालन से परे ये जयचंद अपनी स्थापित स्वार्थों की पूर्ति हेतु समाज व तंत्र के प्राकृतिक नियमों की अवहेलना कर अपना मलिन साम्राज्य पा ही लेते हैं.

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