Revenge!

Blog No. 400

बदला
नैतिक कहानी

स्वास्ति, विदेशी प्रतिनिधिमंडल से जॉइंट वेंचर की बैठक है, तुमको ही लीड करना है और डील क्लोज कराना है.


स्वास्ति, स्टाफ को दिवाली गिफ्ट देने का निर्णय तुमको लेना है कितना बजट चाहिए बता देना


स्वास्ति, पदोन्नतिके अभ्यर्थियों के वेतन पात्रता का आंकलन कर के मेल कर देना


स्वास्ति, टर्न ओवर के टारगेट बढ़ाने के लिए अफ्रीका महाद्वीप में पैर पसारने हैं. बोर्ड मीटिंग बुला लो.

स्वास्ति… स्वास्ति…. स्वास्ति….

सुबह से शाम का पूरा समय कंपनी में स्वास्ति के चारों ओर ही घूमता रहता. तिस पर टॉप मैनेजमेंट और अधीनस्थ कर्मी-दल सब हर्षित कि स्वास्ति मैडम जी को जो बोला है तो हो ही जाना है….

स्वास्ति अयंगर
मध्य आयु
मल्टीनेशनल कंपनी
वाईस प्रेसिडेंट का उच्च पद
आई.आई.एम. से उत्तीर्ण और प्रशिक्षित
मार्केटिंग के मेधावी हस्ताक्षर
कंपनी और समाज में जबरदस्त योगदान और प्रभाव
जीवन में संतुष्टि के सब आयाम पूर्ण
स्वास्ति का शैक्षणिक और व्यवसायिक अनुभव के के साथ छठी इंद्री से सफल होते निर्णयों के कारण स्वास्ति की कंपनी की धुरी उसके चारों ओर ही घूमती थी.
मध्यप्रदेश के छोटे से शहर से आई स्वास्ति गणित में अपनी रुचि के कारण एक लब्ध प्रतिष्ठित तकनीकी महाविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की.
पश्चात् प्रबंधन में परास्नातक की पढ़ाई करने भारतीय प्रबंधन संस्थान आई आई एम आ गई थी.
पर्याप्त ऊँचाई, गेंहुआ रंग, तीखे नैन, पतली नाक, चौड़ा माथा, साँचें में ढाला पतला शरीर और तेज चाल के साथ त्वरित प्रतिक्रिया के हाव भाव ने कॉलेज में उसे अल्पकाल में ही प्रसिद्ध कर दिया.

साथी लड़के इस षोडशी के संग साथ को लेकर अपने विचार व्यक्त करने लगे. कोई मुखर तो कोई एक तरफा चाहने वाले शांत मन से टुकुर टुकुर. जैसे कोई दौड़ चल पड़ी हो. मंगेश, निरुपम, इंद्रनील, सहाय, अचलांग और जॉर्ज का एक समूह बन गया.

प्रत्येक प्रशिक्षण कक्षा के बाद कैंटीन में बैठ आज के पाठ की समग्र विवेचना करना और हँसी मजाक के साथ एक दूसरे के टांग खींचना नियमित हो गया. घंटों के निर्विघ्न साथ के बाद फिर हॉस्टल के कमरे या लाइब्रेरी में बैठक. उस दौरान बीच बीच में व्यक्तिगत फ़ोन या ह्वाट्सऐप चैट. जैसे हॉकी में होता है न मैन टू मैन मार्किंग. हर लड़का अपनी जुगत में कि स्वास्ति से निकटता हो जाए तो जीवन सफल हो जाये. परंतु स्वास्ति के मन मयूर में तो उसके छोटे शहर के बचपन का स्कूल साथी अरुणेश था जो अब चिकित्सा महाविद्यालय का नवनियुक्त लेक्चरर था. मन में कोई और आ जाये यह उसने कभी सोचा न था. वह बस सही समय की प्रतीक्षा में थी.

समय की ऊर्जा बहती चलती है और प्रकृति के किसी भी गुण जैसे तम, रज या सत नामक तत्वों के अधिकारी हो भाग्य में निहित होता है वह घेरा बनाकर प्राप्ति कर ही लेता है. इसी समूह के मेधावी इन्द्रनील ने बैच में शीर्ष स्थान प्राप्त किया और अवार्ड की सीढ़ी से उतरते-उतरते स्वास्ति को विवाह प्रस्ताव दे दिया,
मेरे साथ जीवन गुजारोगी?
स्तब्ध रह गई स्वास्ति!
मन की भटकन अजीब है. वह, विकल्प उपलब्ध हो जाये तो ऊहापोह के दौर-दंगल में उतर जाता है. नेपथ्य में बचपन से साथ पढ़ा सज़्जन पुरुष चर्मरोग विशेषज्ञ डॉ अरुणेश और समक्ष में जमाने के हिसाब से चलने वाला स्मार्ट इंद्रनील.
छह फुट लंबा, बहुर्मुखी, भाषाओं पर एक जैसा नियंत्रण और सफल होने को सदा आतुर, एकाग्रचित्त और लीन.

मन की चेतन, अवचेतन तथा अचेतन अवस्थाओं में से अवचेतन मन सबसे रहस्यवादी है अप्रकट है और अनिर्णय के भंवरजाल में उलझा देता है. चेतन मन आक्रामक होकर चेतना का एकमात्र प्रतीक है जो अधिकारी बनकर निर्णय के तराजू को अपने पक्ष में झुकाने में अधिकाधिक बार सफल होता जाता है. अचेतन मन तो बस निश्छल भाव से आर्द्र परिस्थितियों का जनक होकर परिस्थितोयों को अंगीकार कर शून्य तत्व की प्राप्ति को अग्रसर होते हुए हथियार डालने को मजबूर हो जाता है. कुछ इसी प्रकार परिस्थितियों का ताना-बाना बना जब स्वास्ति के अभिन्न और भिन्न मित्रों, परिवार-संबंधियों की चेतना से स्वास्ति और इंद्रनील का गठजोड़ बन गया. डॉ. अरुणेश भी विवाह संस्कार में सम्मिलित हुए. नैनों की किनोर में भरे आंसुओं से बधाई देकर बिना प्रीतिभोज ग्रहण किये ही प्रस्थित हो गए. किसी को पता भी न चला. यहाँ तक कि स्वास्ति को भी पता न चला कि उसका बचपन का सज्जन मित्र और प्रथम प्यार इतनी आसानी से आत्मसमर्पण कर गया या यूं कहें कि स्वास्ति के निर्णय का सम्मान कर गया.
कहा जाता है ना कि बात गयी, बीत गयी. समय बीतता गया. चिकित्सक अपने हर एक घाव लेकर नेपथ्य के हामी हो गए तो स्वास्ति अपने भविष्य के मौकों को मेट्रो शहर में अधिक उपयुक्त जान भरे स्टेडियम के मध्य, मैदान में क्रिकेट खिलाड़ी की भाँति उतर गयी. दौर का दौरा नया-पुराना होना नियति का चक्र है. समय का पहिया अगले घंटे के लिए घनघोर प्रतीत होता हो कदाचित परंतु भूतकाल में बिताये दर्शकों का स्मरण कुल पल मात्र मात्र की धरोहर हो जाता है. वैसे ही जैसे आती सांस में प्राणवायु कृतज्ञ भाव से भरती है तो वहीं संपन्न सांसे विस्मृत होती जाती है.


20 बरस बीत गए. कुछ सुख, कई सफलता तो कुछ विच्छिन्न असंतोष तो कहीं दुख की पहेलियों में स्वास्ति को वाइस प्रेसिडेंट बनाया गया. वहीं इन्द्रनील पिछड़ कर अब स्वास्ति के ही मातहत हो गए. इन्द्रनील मैनेजर का पुरुषोचित अहम् चोटिल करने लगा. स्वास्ति को भी सूचना मिली कि इन्द्रनील के परस्त्री संबंध भी हो चुके हैं. आरंभ में तो बेपरवाह स्वास्ति को अपने निर्णय एवं प्रेम की अतिशय खुराक पर संशय ना हुआ और व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता का आरोप जान सिरे से खारिज कर दिया. परन्तु जब एक नई इंटर्न के साथ स्वास्ति इन्दानील ने स्वयं अपनी आँखों से देख लिया तो जैसे पांव के नीचे से बसुंधरा ढह गई. प्रतय्क्षम किम प्रणामं.
मात्र एक साक्ष्य ने जैसे साक्षी को साक्षात द्रश्य प्रस्तुत कर दिया. एक तो सहपाठी, फिर पति, फिर सहकर्मी और अब अधीनस्थ के प्रति स्वास्ति के मन में एक भी वितृष्णा का भाव उत्पन्न हो आया. एक बार आंकलन की सामाजिक तराजू पर कोई रख दिया जाए तो वह सब भी सुनाई देने दिखाई देने लगता है जो कभी कहा या देखा न गया हो. स्वास्ति ने जब, कॉलेज के दिनों के किस्से स्मरण में बुलाए तो इंद्रनील की प्लेबॉय जैसी छवि ध्यान आ गई. अब भी साथ में भोजन करते करते फ़ोन सुनने इधर नील बालकनी में बाहर खड़े हो बात करते हैं. पूछने पर कहते हैं स्टॉक ब्रोकर का फ़ोन था या कुछ और. स्वास्ति मस्तिष्क जैसे बारूद का ढेर हो गया और फटने को आतुर. स्वास्ति व इंद्रनील के वैवाहिक जीवन में दरार स्थापित हो चुकी थी.


मार्केटिंग का फलसफा भी अजीब है जो सफलता ना मिले तो ताकत से श्रम को आगे रखता है और जब असफलता सुनिश्चित हो जाए तो प्रतिद्वंदी को नष्ट करने का स्वाभाविक भाव उत्पन्न हो जाता है. एक रणनीति उपस्थित हो जाती है, पराजित करने की, विद्रोह की ओर बदले की. जब नकारात्मक भाव उत्पन्न होने लगे तो उचित-अनुचित का निर्णय संदिग्ध धरातल पर स्थित हो जाता है.
यही सोच स्वास्ति ने फ़ोन लगा दिया चिकित्सक अरुणेश को जो उसका पहला प्यार था. पहली घंटी पूरी होते होते दूसरे ही दूसरी ओर से उसने एक भाव से मृदु स्वर उपस्थित हुआ.


अरे वाह आज तो लॉटरी लग गई.

अरुणेश का दबंग पर स्थिर स्वर गूंज उठा.
हाँ डॉक्टर याद आ गई तेरी. स्वाति ने कहा
क्या हाल है आपके, अरुणेश ने औपचारिकता का स्वर बनाये रखा.
बहुत अच्छे हैं. अरुण कुछ काम था तेरे से. स्वास्ति ने भूमिका पर सीधे ध्यान दिया.
बताना स्किन प्रॉब्लम है क्या? अरुणेश अभी भी संशय में है.
अरे ना रे तुम डॉक्टर लोग भी ना जाने हर एक को मरीज ही समझ लेते हो. स्वास्ति ने मुस्काते हुए तंज कसा.
हाँ यार, क्या करे दिन भर यही लगा रहे थे अब तो आदत बन गयी तू बता क्या करना है. खिसियाते हुए अरुणेश ने बोल्नाजारी रखा.
तुझसे मिलना है! गूंजा जैसे स्वास्तिका स्वर.
जैसे सन्नाटा हो गया हो…
स्वाति ने कहा हैलो क्या हुआ?
अरूणेश ने कहा, वाकई लाटरी लग गयी है क्या मेरी?
ऐसा ही समझ ले.
बता क्या करना है?
मेरी कॉन्फ्रेंस है. कोच्चि में अगले शनिवार-रविवार को. दो तीन. होटल ताज में तुम्हारा भी रूम बुक किया है मैंने और एयर टिकट भेज रही हूँ भोपाल से बैठकर आ जाना.
ऐसा क्या हुआ स्वास्ति कोई खास बात है गंभीरता से अरुणेश ने पूछा
बस तुझसे मिलना है पुराना हिसाब निपटाना है और एक हिसाब बराबर करना है. स्वास्ति का स्वर दृढ़ था.
अरे कोई खास बात है क्या? अरुणेश अब भी अनिर्णय में था.
नहीं
लग तो रहा है
अरे ज्यादा दिमाग नहीं लगाना, बोला जैसा, वैसा करना. वाईस-प्रेसिडेंट महोदया का स्वर गूंजा.
ओह यस, आप बुलायें और हम ना आए ऐसा नहीं हो सकता.
ठीक सब जानकारी मेल कर रही हूँ.
अरे सुनो टिकट ना कराना मैं कर लूँगा स्वास्ति.
अरुण तुम मेरा पहला प्यार हो मेरा भी कुछ हक है कि नहीं.
हाँ है ना
तो बस चले आओ
कहाँ बाहों में, कहते कहते हँस दिया अरुणेश
ज़्यादा उडो नहीं अरुण. लॉटरी नहीं लगी हैं बस किसी को बताना नहीं हैं कि तुम्हे किसने बुलाया है. कॉन्फ्रेन्स बोल के आ जाना.
ओके बॉस मिलता हूँ फिर.


होटल ताज, कोच्चि समुद्रतीरे, कोचिन शिपयार्ड का कर्मशील नगर. भोपाल से हैदराबाद, हैदराबाद से कोच्चि पहुँच कर होटल में चेक-इन कर अरुण ने फ़ोन पर संदेश छोड़ा स्वाति को.
रूम नंबर 503
तुरंत जवाब आया
रूम नंबर 502 बिलकुल सामने शाम को 8:00 बजे मिलते है ओके
अरुणेश ने सोचना आरंभ किया कि ऐसा क्या हुआ? कैसे बुलाया गया? एकदम गुप्त रखने का बोल, 2 दिन के लिए. कमरे भी आमने सामने. संशय, उहा-पोह और भय सब मस्तिष्क में गोते लगाते रहे. जातक डूबता रहा उतराता रहा आखिर थक कर सो गया यह सोच कि स्त्री को समझ पाना स्त्री स्वयं के लिए संभव नहीं है तो मस्त रहिये.
शाम 7:00 बजे उठ गया नया कुर्ता पजामा पहना और टीवी पर मैच देखने लगे. आठ बजकर पांच मिनट पर दरवाजे पर घंटी बजी. लगभग दौड़ते हुए पुरुष ने दरवाजा खोला तो देखा उसकी कल्पनाओं से ही अधिक सुंदर स्त्री एक काले रंग की स्लीवलेस, लो-कट,बैकलेस ड्रेस पहने पहला प्यार नए रूपरंग और कलेवर में आतुर सा खड़ी थी.
डब्बा सा मुंह खोले अरुण बस खड़े-खड़े देखता ही रह गया. मादक, उत्तेजक, नशेमन, कजरारे और ना जाने क्या क्या सोच गया. तभी स्वास्ति ने डॉक्टर की आँखों के सामने चुटकी बजाई. अरुणेश की जैसे तंद्रा टूटी और उसने अपनी दोनों बाहें फैला दी. परंतु स्वास्ति ने बस हाथ बढ़ाकर हैंडशेक भर कर लिया.
अरुणेश से बोले बिना रहा न गया कि,
अरे मैं तो सोच रहा था मेरी लाटरी लगी. यहाँ तो सिर्फ टिकट हाथ आया है. पुरुष अहंकार ने हामी भरी.
अरुण अंदर नहीं बुलाओगे, स्वास्ति का स्वर शांत था.
अरे सॉरी, आइये आइये.
बैठक बनी, एकल सोफे पर दोनों आमने सामने विराजित हुए. बीच में मेज .
पहले कुछ खाने पीने को मांगा ले. स्वास्ति ने कहा और रूम सर्विस को इण्टरकॉम पर निर्देश दिए गए.
बातचीत आरंभ करने के लिए अरुणेश ने पूछ लिया, कॉन्फ्रेन्स हो गई?
कौन सी ? अरे पग्गल, तेरे को मिलने के लिए प्रोग्राम बनाया था. बहुत लॉटरी लॉटरी करता है ना तो सोचा मौका दे ही दूँ. स्वास्ति का लहजा मृदु था.
गंभीर हो गया अरुण. पुरुष भी कम विचित्र नहीं होते है. जब तक प्रिय वास्तु प्राप्त न हो दौड़ते रहते हैं. जैसे ही प्राप्त हुई तो रूचि समाप्त. फिर पूछ लिया ऐसा क्या है?
खुश नहीं हूँ मैं यार! कहते कहते स्वाति का गला भर आया. अरुण जो अभी तक मस्ती के मूड में था भी गंभीर हो गया. मुददे की गहराई डॉक्टर की समझ आने लगी तभी डोरबेल बजी और स्नेक्स के साथ ड्रिन्क्स परोसे गए बातचीत का सिलसिला चल पड़ा.

डॉ साब का तो चेहरा सफेद पड़ता गया
लॉटरी का कड़वा सच उनके सामने था

कह उठे, बदला लेना है?
हां, बदला. मुझे धोखा दिया गया है. धोखा. मेरे त्याग और तपस्या याने वफादारी का ये फल. मैं आहत हूं और मैंने सोच लिया है कि जो मुझे प्राप्त हुआ है वही मुझे देना है. तुमसे बेहतर कोई सूझा नहीं. बदला, आँख के बदले आँख, विश्वासघात के बदले विश्वासघात.
घड़ों पानी पड़ गया, अरुणेश पर. किम्कर्ताव्यविमूढ की अवस्था में पाया आपने आपको. लम्बी साँस भरी. जैसे समेट रहे हों आपने आप को. दुविधा के भंवरजाल में डूबते उतराते अनिर्णय की स्थिति में सोचने लगे. बचपन का खोया प्यार एक ओर जो पूर्ण समर्पण को प्रस्तुत. मौसम, सुरक्षा दस्तूर सहमति सब हाथ भर की दूरी पर. देर किस बात की. मस्तिष्क ओर ह्रदय के मध्य अनिर्णय का दंगल. आखिर नजरें नीची की और सिर उपर उठाते हुए प्रेम से स्वास्ति को देखा और बोलना आरम्भ किया….

नारी सदा से त्याग और समर्पण के हॉर्मोन और मानस से पीड़ित रही है और प्रकृति की सत्ता की धुरी. आप पूछ सकते हो कैसे? उत्पादन तो स्त्रीत्व से ही है. मादा के पैदा होते ही उसकी वैल्यू स्थापित होती है. जबकि पुरुष को अपनी वैल्यू पैदा करना होती है. उसे एक समय देना होता है कोई 20 बरस में तो कोई 40 में या यहाँ तक कि 60 में अपनी वैल्यू उत्पन्न कर पाता है. तब वह समाज, देश और प्रकृति के लिए उत्पादक बन पाता है. जबकि नारी जन्म से है. पुरुष को जेंटलमैन कहना पड़ा क्यूंकि सब नहीं होते है जेंटलमैन. स्त्री के लिए ऐसा कोई शब्द गढ़ा ही नहीं जा सका. क्यूंकि स्त्री में सज्जनत्व जन्मजात है. ममता, क्षमा, प्रेम और समर्पण की अधिस्तात्री होती है कोमलांगी. जो सामाजिक और प्राकृतिक न्याय के बिंदु पुरुष को विकसित करना होते हैं वे स्त्री में स्वतः स्फूर्त उपस्थित होते हैं. मानसिक विकर्षण के शिकार ना हो आप. इसी पुरुष के साथ होने को बीस बरस पहले आप आकर्षण के शिकार हुए तो थे न? सही बोलिए, तब भी विकल्प उपलब्ध होने के बाद भी आपने मुझे त्याग एक अति-नटी याने स्मार्ट पुरुष का वरण किया. हां बोलेंगी आप? और हाँ, याद रहे, पुरुष तो होते ही लंपट हैं. अरुणेश ने सांस भरी.


लंपट याने? स्वास्ति ने अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत की.
याने मौकापरस्त, चरित्र की चिकनी सड़क पर जैसे मौका मिला तो फिसलने को भी न्यायसंगत ठहराने को तैयार. देखो मैं भी तो फिसलने आ ही गया ना. मैं भी अपने वैवाहिक जीवन से संतुष्ट हूं और अपनी पत्नी के प्रति सम्मान भी रखता हूँ. मैं भी थोडा लम्पट तो हूँ ही! अरुणेश ने बोलना जारी रखा.


भटकन एक दौर है! परंतु हर मानस इस दौर को सम्भाल नहीं पाता है. बदला तर्कसंगत है परंतु किस प्रकार हो यह विचार का विषय है की धिक्कार न हो. जैसा उन्होंने आपके साथ किया वैसा आप उनके साथ का दीजिए तो बदला भौतिक है. याने शारीरिक. और कोई मार्ग अगर आप पूछें तो आप मानसिक हमला करें. जैसे कि मुझे सब ज्ञात है आपके चारित्रिक पतन के संबंध में. और मैं यह आशा करती हूँ कि आप अपने बच्चों के समक्ष एक अच्छा उदाहरण बनेंगे. बच्चे वही करते है जो माता पिता को करते हुए देखते है. अरुणेश के सज्जन बोल वचन सुन स्वास्ति की आँखें नम हो आयीं. और झटके से उठ खड़े हो स्वास्ति ने आपने कमरे का रुख कर लिए. अरुणेश भी निस्तेज मन से बिना कुछ खाए ही सो गया.
प्रभात काल, नई उर्जा ओर प्रकाश के साथ आता है ओर दिन-रात का सबसे अच्छा काल है जब शरीर ओर मन दोनों ही स्निग्ध निर्मलता से ओतप्रोत हो मिलते है, एक नई शुरुआत को. दिन उगा, दो घंटे तक अरुणेश को कोई सन्देश न मिला. आखिर उसने सामने के कमरे में इण्टरकॉम से फोन लगाया. घंटी जाती रही, फोन न उठा. आखिर चप्पल पहन कमरे से बाहर हो 502 की घंटी बजा दी. दरवाजा न खुला. अरुणेश ने फिर होटल के रिसेप्शन का रुख किया और स्वास्ति के बारे में पूछा.
मैडम ने तो चेक आउट कर लिया. रिसेप्शन पर जवाब मिला.
अरे?
सोचने लगा अरुणेश कि ऐसी कैसी गलती हो गयी. लौट चला अरुणेश. कि रिसेप्शन से आवाज आई सर, आपके लिए एक एन्वेलोप छोड़ा है मैडम ने. लिया लिफाफा ओर सीधे कमरे में आ गया अरुणेश.
बिस्तर पर लेट, लिफाफा खोला, एक चेक था. अरुणेश की आँखें विस्तारित हो गयीं, कहें फटती लगीं. एक करोड़ का चेक अरुणेश के नाम. जैसे होश खो बैठा अरुणेश. तुरंत फोन लगा दिया स्वास्ति को. फ़ोन बंद आ रहा था. मायूस हो गया सोचते सोचते, ये मैंने क्या कर दिया. खैर अरुणेश ने भी चेक आउट किया और आपने ग्रह नगर को रुख किया.
चेक खाते में जमा करा दिए सकुचाते और दिल मसोसते. भूलने के श्रमसाध्य प्रयास जारी हो गए.
एक दिन बाद, बैंक के अधिकारी का फोन आया, डॉ अरुणेश, चेक पर हस्ताक्षर न होने से डिसओनर हो गया है.

अरे, निशब्द हो अरुणेश ने फोन रख दिया.

Leave a comment

Blog at WordPress.com.

Up ↑