Stooping Low is the Guarantee, to good heights!

पैर छूने की कला, करे सब का भला


सम्मान देने और आदर भाव प्रकट करने की भारत की पुरातन परंपराओं में से एक, पूज्य के चरण छूने की है. यह सत्कार का आरंभिक रिवाज कई बार, ग्रामीण क्षेत्र में पांय-लागी कहने मात्र से अथवा वाक़ई में झुककर पाँव छूने की परंपरा से प्रदर्शित होती है जो कनिष्ठों द्वारा वरिष्ठों को अनिवार्य सम्मान स्वरुप में प्रदर्शित किता जाता है. पैर छूने की परंपरा पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी कम से कम भारतीय समाज में तो प्रचलित है ही. पिता-पुत्र, गुरु-शिष्य व रोगी-चिकित्सक के मध्य भी चरणस्पर्श के माध्यम से कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित किया जाता है. परंतु पांय-लागी होने का सबसे अधिक प्रचलन राजनीति में प्रदर्शित होता है जहाँ उच्च पदों पर आसीन राजनेताओं के चरण-रज वंदन का लाभ न केवल कार्यकर्ताओं को मिलता है बल्कि कार्यकर्ता और पदासीन सत्ताधीश दोनों मिलकर आम मतदाता नागरिक के चरणों में भी प्रस्तुत होने के लिए यदा-कदा उपस्थित होते हैं. भारतीय उप-महाद्वीप में अनादि काल से चरणस्पर्श की परंपरा का निर्वहन न केवल माता-पिता के प्रति सम्मान का प्रतीक है बल्कि आम तौर पर कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित करने का एक सरल व सुगम माध्यम भी है.

राजनीति के सेवा-व्यवसाय में चरण-स्पर्श एक प्रकार से ताश के पत्तों की तुरुप की की चाल जैसी विधा है जहाँ नैतिक अथवा अनैतिक कार्य करा लेने के लिए अथवा वोट माँगने के लिए आम और ख़ास, छोटे और बड़े, स्त्री और पुरुष, वृद्ध और जवान सभी के चरणों में राजनीतिज्ञों के द्वारा झुककर प्रणाम करने, चरण छूने का उपक्रम किया जाता है ताकि सत्ता की सुनहरी सीढ़ियां चढ़ी जा सके. अन्य क्षेत्रों में भी इस पैर-पुजाई का प्रचलन है. कमोबेश शासकीय अथवा निजी प्रतिष्ठानों में भी ऐसा माना जाता है कि जो चरण-रज वंदन करेगा उसकी उन्नति, प्रोन्नति, पदोन्नति समय पूर्व हो जाएगी. यह चरण स्पर्श की विधा हर व्यक्ति के मानस की पहचान नहीं होती है. यह सुधि से बदी आदत में बदलती अहंकारी व्यक्ति के अभ्यास का विषय हैं जो अपने स्वार्थ के प्रति अत्यधिक सजग हो अपना काम निकालने के लिए किसी भी हद तक झुकने को तैयार हो. उस व्यक्तित्व के मन-मानस में चरण-स्पर्श की विधा में पारंगत होना अनिवार्य है चाहे स्वाभिमान को तजना पड़े. सुधिगण के लिए कृतज्ञता प्रकट करने की स्थिति से ऊपर उठकर स्वार्थपरक हो किसी न किसी प्रकार से अपने अधिकारी-गुरु अथवा मालिक की कृपादृष्टि प्राप्त करने की एक अभिव्यक्ति प्रयास है जो यदा कदा प्रकट नहीं होती बल्कि दैनिक रूप से निरंतर एक मातहत के लिए अपने अन्नदाता या सत्तादाता के सम्मुख उनके पग पखारने या चरण-पादुका को आलोकित एवं प्रकाशित करने के लिए प्रस्तुत होती है.
चरण-रज वंदन की अनमोल स्थितियां आमतौर पर हमारी धरोहर हैं, जो स्वार्थपरक हों तो स्वाभिमान की हत्या उपरांत ही पैदा होती हैं जो हरेक स्थिति-परिस्थिति में स्वार्थ परक चरण छूने का अनिवार्य तत्व है.


रामायण में एक प्रसंग आता है जिसमें वानर-राज बाली सामने जो भी खड़ा होता है उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती है तभी भगवान् श्रीराम ने पेड़ के पीछे खड़े होकर बाली का संहार किया था. इसी प्रकार जब कोई भी व्यक्ति नजदीकियां बढाने को उद्यत होता है तब वह पैर-पूजक एक भिन्न दया भाव पैदा करने को विवश कर देता है. इस प्रकार पूज्य की आधी शक्ति को पैर पूजक हर लेता है. आश्चर्यजनक तो यह है कि वरिष्ठ को ये गुमान होता है कि यह चरण-पूजक मेरा सच्चा और सार्थक भक्त है. चरण-पूजन के निरहंकारी भाव की हत्या, सफलता की न केवल गारंटी है बल्कि प्रतिभाशाली भी जो इस नियम का पालन नहीं करता है उसकी तरक़्क़ी और उन्नति के अवसर धूमिल हो जाते हैं.
हम भारतीय आमतौर पर राजनीति के बड़े पुरखा बने फिरते हैं. हम राजनीति पर न केवल अपना विचार रखने के लिए प्रस्तुत होते हैं बल्कि राजनीति करने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते हैं चाहे वह कोई नौकरी लगाने की बात हो या खेल की राज्य- राष्ट्रीय टीम का चयन हो जहाँ अंधा बाँटे रेवड़ी अपने अपने को दे, का नियम लागू होता है और यहाँ अंधा वही है जिसके पाँव छुए जा रहे हैं और अपने वही है जो अंधे के पांव छू रहे हैं.

पुरानी कहावत है जो जितना झुकेगा वो उतना बढ़ेगा. झुकने का यहाँ पर तात्पर्य है कि सीखने के लिए या कृतज्ञ भाव से झुकना. आगे बढ़ने के लिए स्वार्थ से पात्र न होते हुए अगली सीढ़ी पाने के लिए छूकना भी उन्नति के प्रयास होते हैं. जब सामर्थ्य, बुद्धि, कौशल व प्रशिक्षण आदि से कारज सिद्ध न बने तो सामर्थ्य व बुद्धि की कमी को छुपाना स्वार्थसिद्धि का सबसे आसान मार्ग चरण छूकर ही उच्च स्थान प्राप्त करना है. और जब उच्च स्थान पा जाओ तो बुद्धि-कौशल से परिपूर्ण मानस की अवहेलना कर जो चरण छूने में आसक्त हो, प्रस्तुत हो और हमेशा पैरों में आज्ञाकारी की भाँति पड़ा रहे का ही पालन पोषण करता है. पुरानी कहावत है कि अपने कार्य को प्रणाम करो तो किसी को प्रणाम नहीं करना पड़ेगा ओर यदि अपने कार्य को प्रणाम नहीं किया तो आपको पूरी दुनिया को प्रणाम करना पड़ेगा. राजनीति के तहत मालिक के चरणों का ध्यान जो रखे, जो वहीँ चरणों में पड़ा रहे तो छोटी-बड़ी सत्ता के सुनहरे गलियारों की सुगन्धित आभा और नारायणी का वरण सुनिश्चित है.

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