मेरा जारी रहे बाकी देश से समाप्त हो भ्रष्टाचार –

हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए,
अब देश से रिश्वत की अर्थी निकलनी चाहिए.
दक्षिण पूर्वी महाद्वीप के भारतीय मूल के नागरिक जुगाड़ प्रिय होने के साथ-साथ अपनी सुविधा के प्रति बड़े सम्वेदनशील होते हैं और जब मुद्रा-राक्षस संबंधी विषय प्रस्तुत हो तो स्वाभाविक रूप से अनैतिकता के उपमार्ग से आता धन सुधि एवं प्रीतिकर प्रतीक होता है. इसके विपरीत जब हम भारतीयों को रिश्वत देना होती है तो हृदय के कोने से हूक उठती है.
हमारे भ्रष्ट आचरण की पराकाष्ठा तो कुछ इस प्रकार है कि अतिरिक्त धन की लालसा में अनाज में भी मिलावट की जाती है. नौकरी पाने में रिश्वत, नौकरी में काम कराने पर रिश्वत, राजनीति को धनोपार्जन का व्यवसाय कदाचित अनादिकाल से स्थापित है. यहां तक कि अब तो जीवन रक्षक औषधि के व्यवसाय में भी भ्रष्टाचार नियमित रूप से दैनिक अखबार की सुर्खी बनता रहता है. राष्ट्रिय चरित्र ही कुछ इस प्रकार से विकसित हो गया है कि मेरा भला सर्वोपरि, भले जुगाड़ से हो या किसी के बिगाड़ से हो.
हजारों वर्ष की संस्कृति की धरोहर है भारत जहां नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय में भी गुरु-शिष्य परंपरा का वह प्रादुर्भाव था कि भारत को विश्व गुरु के सम्मानित शीर्ष पद पर अनादि काल से माना जाता था. भारत ने दुनिया को खगोल-विद्या, शून्य की अवधारणा, अंकगणित और अन्य वैज्ञानिक विधाओं से न केवल साक्षात्कार कराया बल्कि आने वाली संततियों को बिना कागज के ही स्मरण शक्ति से ही शिक्षित कर उपनिषद, पुराण, भगवत-गीता आदि को स्थानांतरित किया जाता रहा और आज भी अपने नैतिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए जम्बूदीप की नागरिक सत्ता अपने विश्वविद्यालयों, तकनीकी के शिखर-महाविद्यालयों के माध्यम से न केवल देश में बल्कि अन्य विकसित होते देशों में भी अपने शैक्षणिक अनुभवों का केवल प्रचार प्रसार कर रहे हैं बल्कि स्थापित भी कर रहे हैं. परंतु भ्रष्टाचार की खरपतवार बुरी तरह से आर्यावर्त की पावन भूमि पर स्थापित है, जिसे सक्रिय या अक्रिय रूप से स्वीकार करना ही पड़ता है और उस पर तुर्रा यह है कि भ्रष्टाचार देश से समाप्त होना चाहिए परंतु मेरा छोटा-मोटा जो भ्रष्टाचार है वह अवचेतन मन में कायम रहना चाहिए चाहे वह भारत शासन से टैक्स की चोरी हो, धन की रिश्वत के माध्यम से आवक हो या ट्रैफिक सिग्नल पर मेरे अनुशासन का उल्लंघन हो या मेरे कार्य क्षेत्र ऑफिस में मेरे द्वारा की जाने वाली कामचोरी या समय की चोरी ही क्यों ना हो. भले ही पीर पर्वत सी मेरी हो गई हो और हिमालय से गंगा तो समय से आ गई परंतु भ्रष्ट-आचरण की अर्थी अभी निकलती दिखाई नहीं पड़ती है. किसी अच्छे स्कूल में या मेडिकल कॉलेज या इंजीनियरिंग कॉलेज में बच्चों का दाखिला हो, सूटकेस भर के पैसों का नगद लेन-देन ना हो यह सामान्य घटना लगता है. ऐसा ही समागम अन्य क्षेत्रों में भी प्रचुर मात्रा में भारत में उपलब्ध है. हम भारतीयों का कमोबेश स्वभाव है कि कुछ भी ऐसा कारज करो कि रूपये में 3 अठन्नी बन जाये
पढ़ना सब चाहते हैं
रहता अनपढ़ कोई नहीं
अनुशासन सब चाहते हैं
लेकिन अनुशासित कोई नहीं,
मूलत: भारत में सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है, अनुशासन की कमी और इसी अनुशासन की कमी से न जाने कितने भ्रष्टाचार जन्मे है और कानून का अभय कुछ इतना प्रभावी है कि रिश्वत लेते पकड़ा गया हूँ तो रिश्वत देकर छुट जाऊंगा, का भाव अकल्पनीय रूप से प्रभावी है. जब सब भ्रष्ट व्यवस्था है तो कानून से तो मैं छूट ही जाऊंगा तो की फर्क पेन्दा है. जिसकी लाठी उसकी भैंस का भजन करते करते हम उस मानस के अधिष्ठात्री हो गये हैं कि अकेले मेरे सुधरने जाने से क्या देश सुधार जाएगा.
हमारा राष्ट्रीय चरित्र कुछ इस प्रकार जुगाड़ आधारित हो चुका है जहां भगवत् गीता का महा-उपदेश, कर्मण्ये वाधिकारस्ते से आलोकित तो है परंतु मा फ़लेसु कदाचन से प्रेरित नहीं है. हर क़ीमत पर सफलता पाने का मानस हमें साम-दाम-दंड-भेद का ऐसा प्रणेता बनाता है जो देशवासियों की अनमोल धरोहर बन चुका है और इसी कारण देश सुधारना चाहिए की आकांक्षा अक्षय है जबकि मेरा अपना भ्रष्टाचार जारी रहे का सुविधाजनक भाव क़ायम रह जाता है. शासकीय, नियामक या शैक्षिक हो या व्यावसायिक और चिकित्सालय तक संस्थान मानवीय अवगुणों के बंधक बन कर रह गए है. उद्यमी, मेधावी, नियंता और प्रशासन में यह हिम्मत हो सकती है कि वे भारत के तंत्र को सुधारने का बीड़ा कुछ इस प्रकार उठा लें कि उच्च गुणवत्ता की शिक्षा का प्रदायन हो ओर राजनीतीक हस्तक्षेप इस न्यून स्तर पर हो जहाँ मेधावी ओर मेहनती छात्रों को शिक्षा ओर नौकरी के लिए परदेश गमन न करना पड़े और सही खिलाडी के चयन से ओलिंपिक खेलों में भी भारत के लिए मैडल की बरसात हो जाये. सतयुग में जब आतंक बढ़ता था तो दुखी के आव्हान पर ईश्वर कष्ट हरने स्वयं चले आते थे.
डायरेक्ट डायलिंग…
प्रभुजी स्वयं अपने स्वतःस्फूर्त रूप में याचक की रक्षा करते हुए युद्धरत होते थे.
त्रेतायुग का प्रादुर्भाव हुआ तो प्रभूजी ने स्वयं उपस्थित होना बंद किया और अवतार लेना प्रारंभ किया. विष्णु जी ने राम के रूप में 12 कला से सज्ज हो अवतरण किया और पृथ्वी को न केवल नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ाया बल्कि पृथ्वी को आततायियों से मुक्त भी किया. युद्ध में स्वय अस्त्र शस्त्र उठाये और सक्रिय रूप से भाग लेकर कार्य सम्पन किया.
3000 वर्षो के बाद द्वापर युग में जब अतिवाद पुनः बढ़ा तो ईश्वर को पुनः अवतरित होना पड़ा और श्रीकृष्ण ने अपने चातुर्य बल और 16 कलाओं के प्रदर्शन से साम दाम दंड भेद से पृथ्वी को शुद्धता से आलोकित किया ताकि समाज में नैतिक मूल्य स्थापित हों और समाज उन्नति करें.
कलियुग के इस कालखंड में परमपिता ने भी मानव जाति को अपने हाल पर छोड़ दिया है. वो परमपिता किसी भी स्थिति में कलियुग में पैर धरने को राजी नहीं हैं. मूल रूप या अवतार, किसी रूप की बात करो ऊर्जा के वह परम स्त्रोत जिनसे इस पृथ्वी और ब्रम्हांड के विभिन्न लोकों को ऊर्जा मिलती है के हृदय में न पसीजने का भाव जारी है.
अब उनका संदेश स्पष्ट है कि अपनी लड़ाई स्वयं लड़ो. शिक्षा का पाठ जो मैंने स्वयं अपने मूल रूप से उपस्थित होकर सतयुग में, अवतरित होकर त्रेता युग में तथा नीतिज्ञ अवतार में द्वापर युग में लीला की है, उससे शिक्षा लेनी ही होगी. मृत्यु लोक की कतिपय बुराइयों से मुक्ति का आसान उपाय सूझता नहीं है अभी तो.
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