चुटकी भर अनुशासन – नागरिक संहिता
उम्र में बड़ा या छोटा, स्त्री या पुरुष, नया या पुराना वाहन-चालक सबसे पहला अपराध सड़क पर वाहन चलाते समय करता है चाहे वह छोटा अपराध ज़ेबरा क्रासिंग पार करने का हो या रुकने का संकेत करने वाली लाल बत्ती हो या चंद क्षण बचाने का गलत दिशा में वाहन चलाने का बड़ा अपराध हो हम भारतीय बड़े हक से करते हैं. मेरे एक मित्र जो पुलिस में उच्च पद पर हैं, ये कहते हैं कि 30 लाख की आबादी का यह शहर सुबह होते ही सडकों पर कूद पड़ता है और 24 घंटे यातायात के नियमों का उल्लंघन करता है चाहे जितना पुलिस-बल व्यवस्था की सेवा में लगा हो. आखिर हमारे जवान से लेकर उच्च अधिकारी, कैसे इस नागरिक अराजकता का नियंत्रण करे जबकि नागरिकों की सुरक्षा का दायित्व भी हमारा है.
यह स्थापित सत्य है कि नियंत्रण, सत्तातंत्र का दायित्व है. समाज व्यवस्था और प्रजातंत्र पूर्ण सत्यता एवं निष्ठा से कार्य करें ताकि देशवासियों के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय न होने पाए और यदि अन्याय होता है तो भी सत्ता तंत्र की यह जिम्मेदारी है तंत्र में अनिवार्य अनुशासन बनाकर रखा जाए ताकि तंत्र के वाहक तत्वों में न केवल भय का वातावरण हो बल्कि अपराध के प्रति स्वत:स्फूर्त नकारात्मक भावना हो और तंत्र सुचारू रूप से कार्य कर सके. इन्हीं कर्म से केंद्र एवं राज्य स्तरों पर तंत्र को सहयोग करने की विभिन्न अभिकरण की स्थापना की गई है ताकि भ्रष्टाचारण पर ना केवल रोक लगे बल्कि आमजन में भी भ्रष्टता के प्रति एक विषभाव उत्पन्न हो. अनुशासन के साथ एक उत्तम सामाजिक व्यवस्था स्थापित रह सके.
इसमें भी कोई दो मत नहीं है कि तंत्र अपने दायित्वों के निर्वहन से अछूता नहीं रह सकता है परंतु कदाचित नैतिक दायित्व समाजजनों का भी है कि वह लाभ के वशीभूत हो अनैतिक कार्य को पहचान कर उसके पक्ष में ना खड़े हो. क्यों कर यह नहीं हो पता है कि अधिक लाभ पाने के लिए हम विभिन्न किस्म लॉटरी का सहारा लेते हैं और परीक्षा में सफलता पाने के लिए मेहनत का सहारा छोड़ पेपर-सॉल्वर गैंग, पेपर-लीक गैंग के भरोसे अपना भविष्य सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं. मेडिकल कॉलेजों में दाखिला या पुलिस ओर सरकारी नौकरी में भर्ती लेने के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या की तुलना में परीक्षा में बैठने वाले अभ्यर्थियों की संख्या कई गुना अधिक होती है. इससे प्रतियोगिता का स्तर इस ऊंचाई पर पहुंच जाता है कि अति सामाजिक व्यक्ति भी इस प्रकार के प्रलोभन में आने से बच नहीं पता है. धन की धमक और सत्ता का बाहुबल यह जब दोनों मिल जाते हैं तो अन्याय संभावित हो जाता है और अंधा बाते रेवड़ी अपने-अपने को दे जैसी कहावत चरितार्थ होने लग जाती है. सरकारें अपने स्तर पर कहीं नैतिकता का पालन करने का प्रयास करती हों कदाचित परंतु यह स्थिति वैसी ही है जैसे सड़क पर चलने के लिए अनुशासन का पालन चौराहे पर पुलिसमैन खड़ा हो तो लोग पुलिसमैन का लिहाज कर रुक जाते हैं और रोकने वाली लाल बत्ती का सम्मान हो जाता है जब कोई पुलिस वाला चौराहे पर उपस्थित ना हो तो अनुशासन की अवहेलना होती है और लाल बत्ती का ठहरने का निशान किसी को भी रोकने में सक्षम नहीं होता है.
आखिर कमी कहां है ? लाल रंग ने तो अपना कर्तव्य निभा दिया. कहीं ना कहीं हम भारत के नागरिक इस कर्तव्य को निभाने में चूक जाते हैं. पेपर लीक में जब पेपर आया तो मना नहीं किया गया कि नहीं मुझे पेपर की आवश्यकता नहीं है. मेरी मेहनत और मेरा भाग्य मेरा भविष्य निश्चित करेंगे और तो और सोशल मीडिया के जरिए दलालों ने मॉक टेस्ट के पेपर भी कुछ राशी में विक्रय करना आरंभ किया. भारतीय मानस में अनफेयर मीन्स का प्रादुर्भाव इतना अत्यधिक है कि वह इसे तुरंत स्वीकार कर लेते हैं. बॉलीवुड में बनी उन फिल्मों का महिमा मंडल अत्यधिक होता है जिसमें समाज के तंत्र के विरुद्ध फिल्म का अभिनेता अपने रोल का निर्माण करता है चाहे वह चोरी या डकैती के माध्यम से अन्याय को न्यायसंगत ठहराने का कथानक हो. अन्य सामाजिक बुराइयों जुआ सट्टा लॉटरी और ताश पत्ती के साथ अब लूडो जैसे लतों ने हमारे बीच अनुशासित जीवन जीने का मोह ही समाप्त कर दिया है. इस समाज में अब अधिक पैसे वाले का सम्मान अधिक है अधिक पैसा किस प्रकार से कमाया गया है इस संदर्भ में समाज मौन हो जाता है. कहीं ना कहीं आने वाली संततियों में के लालन पोषण में कमी रही है तभी नैतिक मूल्य का तेज गति से हाथ हुआ है और सामाजिक व्यवस्था निम्न स्तर पर जाने को आतुर है यह दुखद है.

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