Blog No 390
असत्य का बोलबाला, सच्चे का ……,
समझ तो गए होंगे.
असत्य की दुकान इतना चलती है कि सत्य बेचारा होकर रह जाता है. अभी फ़िलहाल में संपन्न देश के आम चुनाव में राजनेता तो छोड़िए एग्जिट पोल में आम मतदाता ने भी झूठ का बड़ा दामन थामा और अपने मताधिकार का किसके पक्ष में किये जाने का पूछने पर पोलेस्टर एजेंसी को सत्य कथन नहीं किया कि किसको मतदान किया और असत्य, गोलमोल और भ्रामक जानकारी दे दी . अब जितने भी ए बी सी डी वोट कैलकुलेटर एजेंसी थे वे जो आँकड़े लेकर कर चुनाव के अंतिम दिन आये. वे असल परिणाम से इतर निकले याने मतदाता का असत्य इस प्रकार चला कि एग्जिट पोल के जीतने वाले समस्त दावे धराशायी हो कर धरतीपकड़ हो गये. असत्य का ऐसा महिमामंडन लंबे समय से नहीं देखा जा सका था.
मतदाता के असत्य कथन का तात्पर्य ही यह है कि वह अपने गुप्त मताधिकार का खुलासा करना नहीं चाहता है. इस असत्यपरक एग्जिट पोल की झागदार लहर को असली जान भारत के स्टॉक एक्सचेंज भी सवार हो लिये और ढाई हज़ार अंक का सागरमाथा छू लिया.
असत्य का यह अद्भुत खेल मनोरंजन का साधन भी बना जब मॉर्निंग वॉकर्स क्लब, मोबाइल चैट रूम, ऑफिस स्टाफ़ और घरेलू मोर्चों पर भी ये आम चुनाव के असत्य एग्जिट पोल परिणाम और सत्य से हाहाकार कराते ये एक्सञेक्ट पोल खुले आसमान की भाँति देश पर छा गये.
अब एग्जिट पोल के पेडलर्स को नितांत मुँह छुपाने को कोई जगह ही नहीं उपलब्ध है. तयशुदा स्तर पर पुनः यह साबित हुआ कि एग्जिट पोल पर मतदाता की अभिव्यक्ति सच के पैमाने पर ताश के पत्तों की भांति ढह जाती है.
कहा जाता भी है कि असफलता के 100 बिच्छू होते हैं जबकि सफलता तो घोड़े पर सवार होकर निकल लेती है. ऐसा ही कुछ इस बार के एग्जिट पोल में हुआ.
राजनीति में सीखने वाले प्रथम गुण में सम्मिलित है असत्य वचन करना. उसके बाद का अनिवार्य गुण है, मोटी त्वचा का धारण करना तथा अंत में स्वयं हित को सर्वोपरि रखना. राजनीती के माध्यम से सत्ता के साधक आम जनता में से ही आते हैं ओर इसी के चलते चुनाव दर चुनाव के प्रयोग करते हुए मतदाता ने भी कम से कम असत्य वचन करने की विद्या सीख ली और उसे प्रायोगिक तौर पर चुनाव पश्चात एग्जिट पोल में आजम भी लिया.
चुनाव भी साल दर साल होने वाली नियमित तथा अजब घटना है जो भारत जैसे देश में पंचायत स्तर, नगरीय निकाय स्तर, विधानसभा-विधान परिषद तथा संसद के उच्च एवं निम्न सदन की सदस्यता प्राप्त करने का न केवल द्रविड़ प्राणायाम है बल्कि सत्ता परिचालन के सबसे कम बुरे उपाय में से एक है जहां प्रजा अपने मताधिकार का प्रयोग कर एक राज्य सत्ता का निर्माण करती है जो देश की राजनीति की दिशा का निर्धारण करती है. वैसे तो असत्य के ऊपर सत्य की प्रमाणिकता निर्विवाद है परंतु पुरानी कहावत है कि जब तक सत्य अपने जूते पहनना पहना है तब तक असत्य पूरे विश्व का चक्कर लगा कर आ जाता है और असत्य का यही तत्व इसे रोचक रोमांचक और रमणीक बना देता है. असत्य बिना सक्षम साक्ष्य के भी विश्वास कर लिया जाता है तो सत्य को नंगे पैर घिसटना होता है. सत्य वाणी हमेशा कड़वाहट का प्रतीक होती है और कदाचित चुनाव के परिणाम एग्जिट पोल सत्य एवं असत्य की तुला पर संतुलित हो गए हैं.

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