Hamare Raam

लगभग 7000 वर्ष पूर्व अयोध्या नगरी में रघुवंश परिवार में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म हुआ और उनके जीवन चक्र का घटनाक्रम कुछ इतना रोचक हुआ कि आज इतनी शताब्दियों के बाद भी श्रीराम की कहानी की जीवंत प्रस्तुति न केवल आकर्षित करती है बल्कि जीवन जीने का एक अनमोल संदेश भी देती है. इस शनिवार हमारे राम नामक नाट्य मंचन को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.

इंदौर के लता मंगेशकर सभागृह में आयोजित हुआ इस नाट्य मंचन में राम-सीता के वनवास, उनके पुत्र लव-कुश के अपने पिता से प्रश्नों के उत्तर देने के प्रसंगों के साथ रावण की शिवभक्ति, अहंकार और पांडित्य के प्रसंगों से आलोकित भिन्न प्रकार की प्रस्तुति के नयनाभिराम दर्शन का प्रदर्शन था. यह एक अत्यंत दुर्लभ और अद्भुत अनुभव था, जहाँ
रावण का चरित्र, आसुरी प्रकृति का होने के बावजूद एक भिन्न सकारात्मक आयाम का नया दर्शन प्रदान करता है.

नाटक के एक दृश्य में रावण के स्वप्न में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम आते हैं और दोनों के मध्य स्थापित संवाद श्रीराम के सज्जनत्व तथा रावण के आसुरी प्रवृत्ति के प्रत्येक मानव में होने का जीवन्त आभास प्रस्तुत कर जाते हैं. जब इस स्वप्न दृश्य में दर्शक दीर्घा के सामने खड़े श्रीराम के बिल्कुल पीछे मंच पर ऊँचाई में खड़े रावण का दृश्य प्रस्तुत होता है तो एकदम से अच्छाई और बुराई का अलौकिक दृश्य देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं.

और स्मरण आता है वह कथानक जब हमारी माताएं सुनाती थीं कि हर व्यक्ति के मन में दो भेड़िया होते हैं. एक अच्छा और एक ख़राब और दोनों ही सदा झगड़ते रहते है. बच्चे के पूछे जाने पर कि कौन सा वाला भेड़िया जीतता है तो माँ कहती थी कि जिस भेड़िए को आप भोजन देते हो अर्थात् राम और रावण दोनों ही आपके अंतर्मन की अमूल्य धरोहर है.

अंत में लक्ष्मण के द्वारा दशानन रावण से नीति ज्ञान से प्राप्त करने की अवसर पर रावण की विद्वता का अंदाज़ लगता है जो विद्वान होने अथवा विद्यावान होने के अंतर को ना केवल प्रस्तुत करता है बल्कि पर्दे पर एक गहरी छाप छोड़ता है

कदाचित हम सब इन सामाजिक जीवन जीने के विभिन्न नैतिक आयामों से परिचित हूँ परंतु मृत्युशैया पर रावण के यह कहे जाने पर कि सत्ता, सौंदर्य, संपदा या सौष्ठव का अहंकार, नाश का तत्व है….शरीर के रोंगटे खड़े कर देता है.

हमारे राम नाटक का मंचन एक अद्भुत प्रस्तुति है जिसे हम भारतीयों को सपरिवार अवश्य देखना चाहिए ताकि बच्चों के लिए यह एक नया अनुभव हो तो वहीं वयस्कों के लिए यह एक स्मरण तत्व हो ताकि जीवन के नैतिक मूल्यों की समरसता कायम रहे और बेहतर सामाजिक व्यवस्था का निर्माण हो सके

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