Untouchable Truth(362)

सत्य अछूत है

कलेक्टर कार्यालय में अनुविभागीय अधिकारी ले समक्ष करबद्ध खड़ा एक इतर विभाग का कर्मचारी.
गरजे अधिकारी, कहाँ रहते हैं आप?
शांति.
बोलते क्यों नहीं हैं !
शांति.
अरे बोलिए भी! आपके बारे में शिकायत प्राप्त है की आप हेड क्वार्टर में नहीं रहते हैं और ऑफिस के बाद रोज शाम को गाँव चले जाते हैं.
शांति.
बोलिए , बोलिए, अन्यथा निलंबित कर दूंगा.
अभयदान हो तो निवेदन करूँ सर,
हाँ, बोलो बोलो.
जी महोदय, सच बोलूं.
और नहीं तो क्या, तुम्हारा झूठ सुनेंगे क्या.
जी सर, काम ख़त्म करके ही मैं अपनी बाईक से रोज 20 किलोमीटर दूर गाँव चला जाता हूँ. माँ पिता वृद्ध हैं, दवा –गोली,सेवा –सुश्रुषा देखना होती है. मजबूरी है.
साहब गरजे, ऐसे नहीं चलेगा. अधिकारी के मन में कोई दया भाव नहीं आया.
आपने सच कहा है मतलब मेरी सुचना और शिकायत सही है. स्टेनो, इनको कारण बताओ नोटिस जारी करो और ३ दिन में जवाब देने का लिखो.
अदालत विसर्जित हो गयी.


बाहर निकलते कर्मचारी के लटके हुए मुंह को देखते हुए उसका मित्र बोल उठा…. सच बोलने की जरुरत थी. छोटे कर्मचारी को शरीर पर सुबह से ही तेल लगाकर निकलना चाहिए ताकि पकडाई में न आ पाए. अधिकारी तो कानून बताएँगे ही.
कर्मचारी की आँखों में आंसू आ गए.
समस्या आती है तो समाधान भी लाती है. जब मुख्य मार्ग बंद हो जाये तो छोटी पगडण्डी खुल ही जाती हैं. कर्मचारी को भी सुधि- सहारा मिल गया. मित्र ने कह दिया, मेरे घर की उपरी मंजिल पर एक कमरा ख़ाली है जिसका मैं किराया चिट्ठी बनाकर तुम्हें किरायेदार बता देता हूँ. पुरानी तारीख से, एक शपथपत्र और नोटरी बना देते हैं, थोड़ी झूठ की खेती कर देते हैं, फसल लहलहा जाएगी.


३ दिन में जवाब, किराया रशीद, नोटरी आदि नोटिस के प्रति उत्तर में जमा कर दिए गए.
अधिकारी निरुत्तर.
लिखतम का हिसाब है. मौखिक का क्या हिसाब, जब तक गवाहों के समक्ष न लिखा जाये और हस्ताक्षर न प्राप्त किये जायें.

झूठ के पाँव नहीं होते, पंख होते होंगे झूठ के, जो सबको लुभा देते हैं.

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