भगवान की कहानियां…
भगवान खूब आनंदित रहते हैं परंतु कभी कभी मृत्युलोक की यात्रा को भी उपस्थित होते हैं और मानव को दर्शन भी देते हैं। यहां द्वैत और अद्वैत का प्रश्न त्याग दें तो ईश्वर के दर्शन का लोभ प्रत्येक सुधिमन को सदैव बना रहता है। यह बात और कि प्रभु दर्शन की असीम ऊर्जा को कितने महामना देख पाते है, सहन कर पाते हैं।
कलियुग में ईश्वर आसानी से प्रसन्न नही होते है जबकि सतयुग में मानव के एक आव्हान पर ईश्वर के दौड़े चले आने के उदाहरण प्राप्त हैं। इसी कलियुग का किस्सा है कि, एक मानव की तपस्या से प्रभु प्रकट हुए और कहा-
मांगो वत्स क्या मांगते हो।
छबि निहारते मानव के मुंह से शब्द ही नहीं निकले। प्रभूजी जी ने हाथ पकड़ झकझोरा तो ऊर्जा का उच्च प्रवाह मानव में हो गया और वे दूर बेहोश जा गिरे। प्रभूजी ने अपनी ऊर्जा का डोज़ कम किया और बेहोशी दूर कर मानव से बोले पुनःबोले,
बोलो वत्स क्या चाहते हो।
होश में आते ही दर्शन की निमग्न श्रद्धा से मुक्त हो पूछ लिया जिज्ञासु कलयुगी मानव ने,
प्रभु क्या ये सच है कि आपका एक सेकंड का काल हमारे कई हजार वर्षों के बराबर होता है। प्रभूजी ने स्वीकृति में अपना मुखमंडल हिलाया।
मानव ने फिर पूछा,
क्या आपका एक पैसा, हमारे करोड़ों के बराबर होता है।
प्रभूजी ने स्वीकृति में फिर अपना सिर हिलाया।प्रभूजी फिर आप मुझे अपना 1 पैसा दे दीजिए।
प्रभूजी अवाक…
बुद्धि और कलियुग का मायाजाल अद्भुत है, ये आपकी मति फेर देता है और भ्रम में डाल देता है जबकि जानकारी होने के बाद भी आत्मज्ञान नही होता है कि सब नाशवान है और क्षणिक ही है और इस जन्म में कोई अमरत्व नहीं है।
प्रभूजी जी मुस्कुराए, तरस आया उन्हें इस मानव की बुद्धि पर और बोले,
एक सेकंड मे देता हूँ….
और अंतर्ध्यान हो गए।
वह मानव अब फिर प्रतीक्षा में है कि क्या त्रुटि हो गयी। भगवान का एक पैसा, एक सेकंड बाद मिलने के आशीर्वाद के साथ आया है तो माया में उलझे रहो और प्रतीक्षा रत रहो।
यह कलियुग की लीला है कि लालसा समाप्त नहीं होती है और तो और प्रतीक्षा भी समाप्त नहीं होती है।
सतयुग में जब आतंक बढ़ता था तो प्रभु, देव/ महादेव /देवता/ ऋषि /मुनि/ मानव/ गरीब/ रोगी / शंकर/कंकर /किन्नर /फ़क़ीर के आव्हान पर कष्ट हरने स्वयं चले आते थे।
डायरेक्ट डायलिंग…
प्रभुजी स्वयं अपने स्वतःस्फूर्त रूप में याचक की रक्षा करते हुए युद्धरत होते थे।
त्रेतायुग का प्रादुर्भाव हुआ तो प्रभूजी ने स्वयं उपस्थित होना बंद किया और अवतार लेना प्रारंभ किया। विष्णु जी ने राम के रूप में 12 कला से सज्ज हो अवतरण किया और पृथ्वी को न केवल नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ाया बल्कि पृथ्वी को आततायियों से मुक्त भी किया। युद्ध में स्वय अस्त्र शस्त्र उठाये और सक्रिय रूप से भाग लेकर कार्य सम्पन किया।
3000 वर्षो के बाद द्वापर युग में जब अतिवाद पुनः बढ़ा तो ईश्वर को पुनः अवतरित होना पड़ा और अपने चातुर्य बल और 16 कलाओं के प्रदर्शन से साम दाम दंड भेद से पृथ्वी को शुद्धता से आलोकित किया ताकि समाज में नैतिक मूल्य स्थापित हों और समाज उन्नति करें। इस महती कार्य के लिए श्रीकृष्ण ने अवतार लिया और बिना अस्त्र शस्त्र के प्रयोग किये ही अपना युद्व कौशल प्रदर्शित किया और समाजशत्रु हंता बन समाज में नैतिकता का पथ पढ़ाया। द्वापर युग में एक समय ऐसा था कि पुरुषो की संख्या ही नगण्य रह गयी थी और पूरे आर्यवर्त में अनाथ और विधवा प्रलाप ही रह गया था।
कलियुग की लीला तो और भी अनजान परेशान है। इस कालखंड में परमपिता ने मानव जाति को अपने हाल पर छोड़ दिया है। वो परमपिता किसी भी स्थिति में कलियुग में पैर धरने को राजी नहीं हैं। मूल रूप या अवतार, किसी रूप की बात करो ऊर्जा के वह परम स्त्रोत जिनसे इस पृथ्वी और ब्रम्हांड के विभिन्न लोकों को ऊर्जा मिलती है के हृदय में न पसीजने का भाव जारी है। अब उनका संदेश स्पष्ट है कि अपनी लड़ाई स्वयं लड़ो। शिक्षा का पाठ जो मैंने स्वयं अपने मूल रूप से उपस्थित होकर सतयुग में, अवतरित होकर त्रेता युग में तथा नीतिज्ञ अवतार में द्वापर युग में लीला की है, उससे शिक्षा लेनी ही होगी। मृत्यु लोक के कतिपय पात्रों ने विज्ञान के सहारे अब सतयुग त्रेतायुग और द्वापर युग के महा मानवों को अभिनीत कर दिव्य संदेशों को आमजन में प्रवाहित करने का प्रयास किया है। विज्ञान के रास्ते ऑडियो विजुअल का यह प्रयोग और समाज के बड़े भाग को इसकी पहुंच से इसे
ईश्वर का नए प्रारूप में अवतरण
समझा जा सकता है। संदेश स्पष्ट है कि अर्वाचीन घटनाक्रमों से शिक्षा प्राप्त की जाए और छोटी कहानियों से स्पष्ट संदेश आगे बढ़ाया जाए जो साधारण बुद्धि के आमजन को भी आत्मसात हो जाये।
ठाकुर जी की ऐसी ही एक अन्य कथा है जिसमें एक गरीब, ठाकुर जी की पूजा करते समय कोई अन्न आदि का भोग नहीं लगा पाता था। एक दिन उसने सोचा सिंबॉलिक या काल्पनिक भोग लगा देता हूं। इस तरह से उसने पूजा के बाद ठाकुर जी को भोग लगाना शुरू किया हाथों से। उसने 4 चम्मच आटा, एक चम्मच शक्कर और 2 चम्मच घी को समर्पित किया और इस तरह से काल्पनिक हलवा बना और काल्पनिक हलवा ठाकुर जी को प्रस्तुत किया गया। ठाकुर जी को यह प्रयोग बड़ा पसंद आया और अपने बैकुंठपुर में बैठे सोचने लगे, इसकी भक्ति और प्रेम दोनों में बड़ा रस है।
…. और ठाकुर जी की कृपा उस जातक पर होने लगी धीरे-धीरे उनके दिन बदलने लगे। धन दौलत ऐश्वर्या स्वास्थ्य गाड़ी घोड़ा बंगला सब हो गया लेकिन पूजा-अर्चना में भोग लगाने की विधि वही रही। जब भी पूजा अर्चना को ठाकुर जी के लिए बैठते, काल्पनिक रूप से आटा घी शक्कर हवा में से लेते और हलवा के रूप में प्रभु को अर्पण करते।
जब धन आता है तो थोड़ी कंजूसी भी आ जाती और यह वी मानव स्वभाव है।
एक दिन उन्होंने कुछ ऐसा किया की एक मुट्ठी आटे की भरी , अर्पित की, दो मुट्ठी आटे की भरी और रोक ली। फिर एक मुट्ठी शक्कर की भरी वह अर्पण की। दूसरी मुट्ठी शक्कर की भरी और अर्पण किये बगैर रोक ली। फिर एक चम्मच घी लिया जब दूसरा चम्मच लेने लगे और इसी के चलते उन्होंने वह एक चम्मच घी जो कल्पना में ही था को भी प्रभु के भोग को अर्पण करने से रोक दिया और उसी समय ठाकुर जी प्रकट हो गए हाथ पकड़ लिया, बोले
….हे जातक बरसों से तू सेवा कर रहा है काल्पनिक रूप से भोग लगाता है और अब काल्पनिक भोग में भी कंजूसी करने लगा है। जातक को काटो तो खून नहीं ।
तो कहने का तात्पर्य है की ठाकुर जी तो भोग के नहीं मनुहार, अनुग्रह, ज़िद के भूखे हैं प्रेम के भूखे हैं। द्वैत और अद्वैत का समर ज्ञान निरर्थक है यदि जिज्ञासु को प्रेम का ज्ञान न हो जो प्रथम सीढ़ी है ईश्वर में लीन होने की दिशा में।

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