Saintly Sadhu Baba(Blog-347)

साधू बाबा

उनका गाँव ही नहीं, आस पास के ५२ गाँव उन्हें साधू बाब के नाम से आधी सदी से बुलाते थे. सन १९०२में जन्मे , चम्बल के किनारे क्यारिपुरा गाँव के पुरखा, पुरोधा और अपने जमाने के पहलवान राजपूत कहे जाते थे…जो १८ छंटाक घी ठौर बैठे पी जायें और ५०० उठक बैठक लगा दें. हाथों से घंटों कुएं का पानी खींच कर अकेले गाँव भर की एकत्र महिलाओं की बाल्टी बर्तन पानी से भर दें…और गुड चना खाकर पानी पीकर सो जायें. दो सिक्कों के बीच सुपारी रख कर हथेली में दबा लें तो सुपारी के टुकड़े हो जायें.
इस बाहूबली का वैवाहिक जीवन थोडा रहा और मात्र ३७ साल की उम्र में वे विधुर हो गए. परिवार सुख हेतु घर द्वार रिश्तेदार पुनर्विवाह के लिए पीछे पड़े रहे ….नहीं किया तो नहीं किया विवाह…अकेले ही ३ बच्चों का पालन किया और उनकी सज्जनता, सहायता का भाव, दानशीलता के चलते साधू बाबा के नाम से ख्यात हो गए.

बच्चे उन्हें बापू बुलाते और घर के द्वारे सुबह से लोग आ जुटते , अपनी छोटी बड़ी समस्या का समाधान जानने. समस्या सुनते और तुरंत समाधान…प्राकृतिक न्याय के हामी, जो नैतिक रूप से गलत तो गलत और जो सही वह सदैव सही. मानो या न मानो…रामायण पूरी रटी हुई …हर समस्या के लिए एक चौपाई और स्थापित सिद्धांत . बेटे बेटी का भविष्य बना अपनी कोठी में दिन रात सबका स्वागत, साधारण भोजन से…सबको चाय और चम्बल नदी के बीहड़ों में स्थित गाँव के यात्रियों को रात रुकना हो तो खटिया पड़ी है.. गद्दा रजाई मछरदानी ले लो, सो जाओ जैसे धर्मशाला हो. भोर होते होते मेहमान अपने अपने घर. सदाशयता इतनी कि डाकू मान सिंह, लखन सिंह और रूपा डाकू जो चम्बल के बीहड़ों के दुर्दांत नाम भी साधू बाबा से मिलने आ जाते…


पूछ ही लिया एक दिन मैंने…अपने इतनी रामायण पढ़ी , राजपूत होने के बाद भी आपका पांडित्य सराहा जाता है आपका लोग समस्या समाधान पूछते है …कैसे आप सबको संतुष्ट कर लेते हो.
सर पर प्यार से, इस पोते के… हाथ फेर दिया. आज दोपहर में मेरे साथ लेटना, बिजली नहीं है तो मैं हाथ पंखा झलूँगा और तुम सुनना. सहमती हो गयी.
दोपहर में वे बोले बुढ़ापे में नींद कम आती है अब पूछो क्या पूछना है.


रामायण का क्या पथ है क्या संदेश है? मैंने प्रश्न दाग दिया.पूछे , रामायण कथा जानते हो…तो सुनो.
मैं उनके पैताने….. याने पैरो की तरफ बैठ गया ….
रामायण की कथा में नैतिक संवाद है मानव जाति के लिए कि इस प्रथ्वी पर आदमी को जीवन कैसे जीना है. पर भ्रष्ट हुए तो नेपथ्य में जाना होगा, ब्राह्मण रूप में रावण हो या वानर रूप में बाली, दोनों ने चरित्र का हनन प्रदर्शित किया और प्रकृति ने उन्हें अपने में समयपूर्व ही समेट लिया. प्रकृति हर तत्व को सीमा में रखने के उपाय जानती है और “अति सर्वत्र वर्ज्यते” का बखूबी पालन करती है. सुधिजन प्रकृति के प्रताप को प्रकोप कह देते है, आपदा कह देते है, लेकिन प्रकृति को उत्तेजित किसने किये. मानव जाती के कर्म का यही पाठ हमें रामायण सिखाती है. मानव जन्म त्याग के लिए हुआ है.

मरने के बाद तो क्या होता है …..क्या नहीं …..कोई वापस आके बताता नहीं परन्तु इस जीवन में जिसने त्याग किया है वह संतुष्टि की एक विशिष्ट अवस्था को प्राप्त कर लेता है. राम ने सिंहासन का त्याग किया, भारत ने भी यही त्याग किये और साधुभाव से जीवन जिया. सीता के त्याग तो अविश्वनीय है और उनके नारी चरित्र का पालन करते इस हिन्दुस्तान में कई नारी ऐसी मिल जाएँगी जिन्होंने त्याग से समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना की है.. चारों भाई ने अद्वितीय नैतिक बल का प्रदर्शन किया और आज भी ६-७ हजार साल बाद भी मानव मन इन सच्चरित्र महामना को ह्रदय से सम्मान देते हैं.


रामायण का सबसे नैतिक पाठ है लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन न करना. सीता जैसी देवी और अपने एक हाथ से शिवधनुष को उठाकर एक स्थान से दुसरे स्थान पर रखने का बल रखने वाली सीता माँ कैसे लक्ष्मण रेखा का पालन करने से चुक गयी….और उसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी उन्हें. यह पाठ हमारे लिए भी कि ‘अति सर्वत्र वर्ज्यते’ का पालन किया जाये.


लक्ष्मण के हिस्से में आया,सेवा का भाव दर्शनीय और शिक्षण योग्य है जिसने बिना लोभ, भय और स्वयं के मोह से भिन्न होकर बड़े भाई को सेवा प्रदान की.
….मानव जीवन में प्राकृतिक नियम का पालन सभी को आसानी से समझ आता है लेकिन वह फीका स्वाद पैदा करता है इसीलिए राजनीती, विद्वेष, ईर्ष्या, जलन, सौतिया डाह, बदले की भावना, वासना, लालच और क्रोध जैसे विकारों से जीवन कलुषित होता है.

Leave a comment

Blog at WordPress.com.

Up ↑