Reincarnation

मेरी नयी यात्रा….
जब मैं भगवान के दरबार से पृथ्वी लोक में आने को उद्यत हुआ तो ईश्वर ने मुझे पूछा

इस बार कहां जाना चाहोगे

मैंने कहा मैं इस बार आपकी स्वयं की भूमि……. देवभूमि ……आर्यावर्त याने भारत जाना चाहता हूं और प्रकृति रुपे महाशक्तिमान और अलौकिक भगवान, साकार कहो या निराकार कहो, मुस्कुरा दिए ……और मेरा जन्म इस पावन धरती पर हुआ

आज मैं यह भारत के नाम खत लिख रही हूं कि कैसे मैंने अपने आप को पाया है …..जीवन का अर्थ सिर्फ लोलिता के जंगल में शारीरिक सुख…… मानसिक सुख या धार्मिक सुख और आर्थिक सुख पाना है यही मेरा आत्मिक विचार रहता था लेकिन जब मैं इस पवित्र भूमि पर पैदा हुआ तो मुझे ऐसा लगा हे पावन भूमि तुम अलग तुम सुचिता की पवित्रता की अमूल्य थाती हो धरोहर हो जिसे दो देवलोक कहा गया है तो एकदम सही कहा गया है क्योंकि इस धरती पर प्रेम सहिष्णुता की कुलीन और भेदभाव जैसी मलिन भावनाओं का भाव है और इसी कारण यह भूमि सदियों से सबको लुभाती रही है कि मेरी मुक्ति का मार्ग देवभूमि भारत से ही निकलता है


इस भारत देश में नागरिकों का छोटा परिवार मध्यम परिवार बड़ा परिवार है और बड़े परिवार के साथ में पलने वाले मछलियां हैं कुत्ते हैं गाय हैं भैंस बैल हैं और जीवंत सूर्य है चांद है पृथ्वी है धरती है नदी है तालाब हैं वृक्ष हैं पूजन योग्य पीपल बरगद हैं …ये सब भारतीय परिवार के सदस्य हैं…..यानी तुम्हारे इस धरती पर सबके लिए स्वीकार्यता है


…. और तो और इस देश की अर्थव्यवस्था कुछ इस तरह से प्रेम ईश्वर ने स्थापित की है कि हर 2 महीने में कोई बड़ा त्यौहार आता है और घरों में रखी की जमा की हुई राशि पुनः चलन प्रचलन में आ जाती यहां लोगों का इतना सीधा व्यवहार है किस दुर्गा पूजा पर मंगलामुखी तक पूजी जाती हैं जो अपना तन बेचकर जीवन यापन करती यहां देवदासी ईश्वर की पूजा में रहती हैं और स्वयं ईश्वर ने यहां दूर-दूर पर धार्मिक स्थलों को स्थापित किया ताकि लोग धर्म को जीवंत ऊर्जा का स्रोत जानकर पूजा अर्चना के दौरान घरों से से निकले और प्रकृति दर्शन देव दर्शन, पर्वत दर्शन, दिव्य दर्शन कर सकें….दर्शन से कृतज्ञता का भाव पैदा होगा और प्रकृति के प्रति सम्मान भी…तो प्रकृति भिन्न तत्वों की सुरक्षा भी स्थापित होगी.


चित्त की चंचलता को शांत करने के बिना मानव मन की शांति प्राप्त ना होगी और यह देवभूमि की ही विशेषता है कि माया मोह लोभ क्रोध मद इत्यादि वासनाओं के होने के बावजूद चित्त की चंचलता को शांत करने के उपागम उपलब्ध हैं प्रश्न उठता है की चंचलता को काबू कैसे किया जाए ……यक्ष प्रश्न है ….. उत्तर भी मुझे इसी पृथ्वी पर मिले….. इसी देव भूमि पर मिले ….मैत्री करुणा मुदिता और उपेक्षा के माध्यम से मन को त्वरित और अनिवार्य रूप से शांत किया जा सकता है

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