प्रकृति का एकमात्र स्थाई नियम है परिवर्तन और प्रकृति की ही एक अवधारणा है समाज और समाज में होती है प्रथाएं जो अनादि काल से प्रचलन में है और समय के साथ इनका प्रभुत्व बढ़ता है और कालांतर में कमतर होता जाता है. कुछ प्रथाएं कुरीति का रूप धारण कर लेती है तो कुछ परंपरा बन कर रह जाती हैं. यदि आप आज के संदर्भ में देखें तो बाल-विवाह, सती-प्रथा जैसी बुरी प्रथाएं विभिन्न चरणों में समाज सुधारकों के प्रयासों से भारत भूमि से रवाना कर दी गई जबकि छुआछूत और दहेज जैसी कुरीतियों और प्रथाएं कुछ दशकों पहले तक अपने विकृत स्वरूप को भिन्न-भिन्न रूप में बनाए रखने में सफल रही.
समाज में कालजई परिवर्तन प्रस्तुत होते रहे और आज 21 वीं सदी के पहले दो दशकों में ही कुछ ऐसा परिवर्तन आया है कि आर्यावर्त का पूरा परिदृश्य ही परिवर्तित होते दिखता है, जहां बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ जैसे शासकीय अभियानों ने लिंग-परीक्षण कर बालिका की भ्रूण हत्या पर रोक लगाई है वहीं बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान ने समाज में एक ऐसी ज्वाला प्रज्वलित की है कि डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड-अकाउंटेंट या अन्य शासकीय-अशासकीय नौकरियां और व्यवसायों को करने के लिए नारी शक्ति तो उपलब्ध है ही पुरुष क्षेत्र के एक-तरफा एकाधिकार वाले क्षेत्रों में भी लड़कियों ने न केवल अपना दम-ख़म दिखाया है. अब वे सफलतापूर्वक भारत की सीमाओं की चौकसी कर रही है, लड़ाकू विमान को उड़ा रही है भारवाहक पानी के जहाज को चला रही है और साहसी जोखिम भरे खेलों में अपने प्रभुत्व और कौशल से देश को एक नया आयाम भी दिला रही है.
इसी के चलते विवाह की स्थापित प्रथा में दहेज के लेन – देन की कुरीति कम से कम नगरीय क्षेत्र से तो लुप्तप्राय ही हो गई है और जहां दहेज प्रथा अभी प्रचलन में है वहां भी कम संख्या में ऐसे प्रकरण देखने को मिल रहे हैं. यह एक मानसिकता का परिवर्तन ही है कि लड़का लड़की में अंतर न करने की परिवार के बुजुर्ग की कही हुई बातें अब स्थापित होने लगी है. अब लड़कियां भी अपने सपनों को जी का रही हैं और पूरा भी कर रही है. वह किसी भी स्थिति में मात्र घरेलू महिला बनने को राजी नहीं है. यदि वह घरेलू महिला है तो वह भी कुछ अपने स्तर पर आर्थिक, सामाजिक, आध्यात्मिक सरोकारों के चलते कुछ न कुछ कार्य करना चाह रही है और कर भी रही है.
स्त्री अथवा पुरुष लिंग के स्टेटस में समानता का जो श्री-गणेश हुआ है, वह शिक्षा या व्यवसाय या सेवा के समस्त क्षेत्र में एक जैसा प्रदर्शित होता है जो देश के स्वस्थ मानस का प्रतीक तो है ही बल्कि देश को एक बेहतर जीडीपी की ओर धकेलने में सहायक भी है.
छुआछूत और वर्ण विभेद जैसी सामाजिक बुराइयां भी अब देश के विभिन्न कानूनों एवं विधिक नियमों के चलते कम से कम नगरीय ढांचे से बाहर हो चुकी है. अब पानी पीने के लिए या भोजन पानी के लिए छुआछूत या वर्ण विभेद जैसी प्राचीन कुप्रथाओं के दर्शन नहीं होते हैं जो विकसित होते समाज की न केवल एक पहचान है बल्कि आगे के लिए भी एक उज्जवल भविष्य प्रस्तुत करते हैं.
भविष्य की सन्ततियां कदाचित आश्चर्य प्रकट करें कि क्या ऐसी कुरीतियाँ भारत जैसे सुधि समाज में प्रचलन में रही हैं.
इसी प्रकार समाज में विवाह की प्रक्रिया में भी अपनी ही जाति में विवाह करने के प्रचलित परंपराओं में शिथिलता आई है और अब बच्चे अपनी पसंद अनुसार समाज की अन्य जातियों में भी विवाह कर रहे हैं. इससे यह भली-भांति प्रतीत होता है कि समाज की प्रकृति परिवर्तन को उन्मुख है और यह जाति प्रथा भी अगले कुछ वर्षों में अपने विलुप्त होने के स्तर पर पहुंचने की और तेजी से अग्रसर है.
आपको कदाचित भरोसा ना हो आज से 50 वर्ष पूर्व तक धन कमाना और सहेज कर रखना जैसी परिवार के पुरखाओं की सीख बंधनकारी थी ओर सदैव काम आती थी. धन होने के बावजूद लोग खर्च करने से बचते थे तथा धन को बुरे दिनों के लिए सहेज कर रखते थे ताकि बीमार होने पर कोई वित्तीय संकट आने पर इस जमा किए हुए धन को प्रयोग में लाया जा सके. अब पिछले दो दशकों से जब से मेडिकल इंश्योरेंस, टर्म इंश्योरेंस, लाइफ इंश्योरेंस, कार इंश्योरेंस, लोन इंश्योरेंस इत्यादि का सुरक्षा कवच उपलब्ध हुआ है तब से भारत के नागरिक स्वयं पर खर्च करना भी सीख गए हैं और यह नई आदत उन्हें न केवल इस अतिरिक्त धन को विभिन्न लग्जरी और कुलीन उपागमों के ऊपर खर्च करने के लिए प्रेरित करती है बल्कि विश्व की सबसे बड़े उद्योग, पर्यटन को भी साधने में सहायक है. अब भारत के नागरिक, देश के विभिन्न हिस्सों पर न केवल धार्मिक स्थलों के बल्कि पहाड़ों से लेकर समुद्र तट तक भ्रमण कर रहे हैं. भारतीय अब दुनिया के विभिन्न भ्रमण योग्य स्थान पर भी अपनी धनराशि का उपयोग भी कर रहे हैं.
एक बड़ा परिवर्तन और समाज ने देखना शुरू किया है और वह है सरकारी नौकरी की ओर न ताकना. बदलते परिद्रश्य में यह समाज समझ रहा है सरकारी नौकरी की संख्या अब कम हैं. यह भ्रम है कि सरकार नई नौकरियां बड़ी संख्या में जारी करेगी जिसमें प्रथम श्रेणी से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक सब कार्य करने के लिए सरकारी नौकरियां उपलब्ध होगी! अब सरकार चतुर्थ श्रेणी कर्मियों के लिए तो आउटसोर्स के माध्यम का उपयोग कर रही है अतः सरकारी क्षेत्र में नई नौकरियों की संभावना तो धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं. डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा जैसे शुद्ध एवं एकाधिकार वाले क्षेत्रों में तो सरकारी नौकरियों का प्रचलन है ही परंतु वर्ष 2000 के आसपास पैदा होने वाले मिलेनियल बच्चे-बच्चियों की प्रथम चाहत सूची में सरकारी नौकरियों की संख्या पहले के मुकाबले में अत्यंत कम है तथा वह निजी क्षेत्र के टेक्नोलॉजी, फाइनेंस और आधारभूत संरचनाओं के व्यावसायिक क्षेत्र में अपने लिए रोजगार पा रहे हैं. इसी के साथ जोखिम लेने वाले परिवारों के बच्चे स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने तथा स्टार्टअप के माध्यम से रोजगार भी पैदा कर रहे हैं. यह आश्चर्यजनक लगता है कि स्टार्टअप के माध्यम से भारत ने बड़ी तेज गति से उन्नति की है और कम उम्र में ही बच्चे आप अरबपति होने लगे हैं. यदि सफलता का एकमात्र मापदंड पैसा ही माना जाए तो भारत के बच्चों ने इस दिशा में बड़ी तेजी से उन्नति की है हालांकि भारत के बेहतर होते कार्य क्षेत्र में दुनिया भर की मल्टीनेशनल कंपनी का आगमन होने से भी देश के अभीयांत्रिकीय छात्र जगत को तेजी से रोजगार उपलब्ध हुआ है जो की अच्छा संकेत है.
शिक्षा का एक अच्छा संकेत यह भी हुआ है की उच्चतर शिक्षा के प्राप्त करने के मापदंडों से विवाह की उम्र आप में 25 के बाद तक खिसक गई है जिसके कारण करियर प्राथमिक आवश्यकता बन गया है और परिवार छोटे होने लगे हालांकि करियर के चलते संयुक्त परिवार की अवधारणा को जबरदस्त झटका लगा है जिसके चलते अब छोटे या न्यूक्लियर परिवार अधिक संख्या में प्रचलित है करियर की लंबी उड़ान लेने के लिए अपने छोटे गांव शहर कस्बे नगर को छोड़ महानगर की तरफ दौड़ने से परिवार की वित्तीय स्थिति दो अत्यधिक सुधर गई है परंतु परिवार के सदस्यों की संख्या एक छत के नीचे कम होती चली गई है विवाह की उम्र अधिक हो जाने से होने वाले बच्चों की संख्या में भी परिवर्तन आया है भारत सरकार की दो बच्चों के परिवारों की पूर्वधारणा की सफलता भले संदिग्ध रही हो परन्तु अब शिक्षा में उच्चतर स्तर प्राप्त किए हुए बच्चे बच्चियां अपने करियर के प्रति इतना सजग है कि वे अपने परिवार को समझौते के स्तर पर रखने के लिए तत्पर हैं इसके चलते परिवारों की वित्तीय स्थिति उत्तम स्तर पर पहुँच चुकी है परिवार छोटे हो गए जबकि संयुक्त परिवार तो छोटे नगरों यह गांव की धरोहर मात्र बनकर रह गए अंकित करोड़ नागरिक को की देव के संसाधनों पर सभी नागरिको का हक होने के साथ यह नैतिक जवाबदेही भी नागरिको की है कि देशी जनसंख्या पर नियंत्रण हो ताकि अनादिकाल से जीवित रहें भारत देश के साधनों का अनादिकाल तक उपयोग प्रयोग होता रहे हो


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