Karma

पुण्य प्रश्न, पाप प्रश्न

पवित्र माह के आते ही एकाधिक सुधिजन अति कर्मकांडी होते जाते हैं. ईश्वर को मोहित करने को ये मलिन मन, अंतर्मन की यात्रा का बहिर्गमन करते हुए प्रकृति के शुभ आशीर्वाद रूपी फूल पत्ती पौधे पर कुछ यूं झूम जाते हैं जैसे पुष्प समर्पण से ही साकार या निराकार ईश्वर के साक्षात दर्शन बस अब हुए या ये हुए. सु-मन ताक पर रख सुमन रूपी पुष्प तोड़ते यह मानव मन विचलन के अति सागर में पाप धोने को आतुर ये मानव कभी जल स्नान, कभी तीर्थ दर्शन को नशेमन हो डोलते-फिरते कहीं न पहुंचते हुए मिथ्या भ्रम को सदा पाले जाते हैं.

…ऐसे ही एक सुधिमन, मेरे घर-आंगन में लगे एक फूलदार वृक्ष के फूल तोड़ते सद्गुरु से अद्भुत संवाद हो गया….

प्रकृति प्रेमी – अरे आप फूल क्यों तोड़ रहे हैं?

तथाकथित ईश्वर प्रिय जी – हम तो रोज ही ले जाते हैं आज आप ने देख लिया है !

प्रकृति प्रेमी – यह तो ठीक बात नहीं है.

तथाकथित ईशप्रिय -अरे हम तो भगवान को पुष्प चढ़ाते हैं.

प्रकृति प्रेमी – तो आपने अपने घर में एक पौधा क्यों नहीं लगाया ?

तथाकथित दिव्यदृष्टा – लगाया था पर पता नहीं क्यों पनपा नहीं!

प्रकृति प्रेमी – तो आपने कॉलोनी के किसी भी वृक्ष को कभी एक लोटा जल डाला हो या सिर्फ कर्मकांड हेतु पौधों और पेड़ों के पत्ते और फूल या फल ही तोड़ते रहेंगे?

मौनप्रेमी निशब्द

प्रकृति प्रेमी – अच्छा मेरे प्रश्न का उत्तर दे दीजिए क्या आप ने पाप करना बंद कर दिया है? यदि हां तो ईश्वर के किसी भी रूप को आप मानते हो इन पुष्प की उन्हें कतई आवश्यकता नहीं है और यदि आपने पाप करना बंद नहीं किया है तो आप अपने ईश्वर को निरर्थक पुष्प समर्पित कर रहे हैं…. वे स्वीकार करेंगे ही नहीं. वे तो आपका प्रेम रूपी सुमन चाहते हैं. आदरणीय आपका असम्मान करने की मेरी कोई आकांक्षा नहीं है परंतु प्रकृति से हम हैं … प्रकृति से ईश्वर है. प्रकृति ही ईश्वर है आप मोह करेंगे तो पुष्प तोड़ घर ले जाएंगे और प्रेम करेंगे तो पुष्प को पल्लवित होने देने के लिए खाद पानी धूप हवा सब समर्पित कर प्रकृति रूपी ईश्वर की साधना ही करेंगे !

सहमति में या असहमति में सिर हिलाते ये प्रेमी आदरणीय बिना कुछ कहे प्रस्थित हो गए…

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