विषमना
विष की कुछ मात्रा हर जीव का अनिवार्यघटक है . अमृत की पूजा आराधना और साधना का प्रचलन है परंतु विष भी कैसे अमृत बनाया जाये यह सुधिगण के लिए श्रमसाध्य प्रसंग हो सकता है.
सनातन परंपरा में जीवंत उदाहरण महाप्रभु शिवशंकर का है जिन्होंने कार्तिक माह की अमावस्या को सागर मंथन से उपजे असीमित और अति रासायनिक विष को भी जनहित में अपने कंठ में धारण कर लिया. विष की अनुपस्थिति मात्र अमृत तुल्य पर्यावरण का निर्माण कर देती है.
दैनिक जीवन में विष का आगमन और सामना अवश्यंभावी है परंतु अपने मन में उत्पन्न विष को अपने तक रोक लेना किसी भी सुधि मानस का अमृत विकल्प हो सकता है
विष नकारात्मकता का द्योतक होने के साथ साथ विवेक का हामी हो सकता है जब साधु और बुद्ध मानस विष की उत्पत्ति को विचार के धनुष बाण से उदासीन कर दे
जटिलता है कि मन के विष को दबा देना और अमृतभाव को आलोकित कर देना
जीवन का रंग कैसा हो जो बुद्धत्व के विष समान हो या रावण के अमृत भाव के समान हो
विचार कीजिएगा!


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