बुजुर्ग बड़े, कह गए अनादि काल से
बोझा कम रखो बने रहो हल्के सदा,
तनाव हो या तन का भार इच्छा से
जो अल्पांक हो तो यात्रा सुगम सदा…
माया की कमल पत्तियां जल पर बिखरी
दल दल नीचे है माया सबको लुभाए सदा,
जो दौड़ पड़े हम सब इस मचान से उस को
भार अधिक हो तो व्यर्थ डूबना तय सदा…
भवसागर इसे ही कहते तना खड़ा है मोहक
लोक परलोक की यात्रा जाने तू यूंही सदा,
जीव का अहम अदभुत बोझा ढोते चलते
सत्य से दूर, संस्कार भूलते रहते हम सदा…

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