स्वस्थ्य मेव जयते
यह ऐसा घोर कलयुग है जिसमें अब हम स्वास्थ्य के पीछे भागते हैं. कारण जो भी हो, जोड़ जोड़ कर धन और नाम, हम अपने शरीर के जोड़ों से जोड़ और तोड़ का गणित बिठा लेते हैं और गणित भी ऐसा कि मानव शरीर में उपस्थित 600 अरब कोशिकाएं, 640 मांसपेशियां, 206 हड्डियां, 96000 किलोमीटर लंबी धमनी, शिरा कैपिलरी भी शक्कर की चासनी में डुबो देते हैं तिस पर 12 टन की कैपेसिटी वाले ट्रक पर 20 टन लादने जैसी हालत पैदा कर इस 50 किलो के तन को ओवरलोड करना हमारा प्रिय शगल है ….
फिर शुरू होती है जंगम जंग, कि तनाव बढ़ा और मनमाफिक उच्च स्तर पर धन और नाम पहुंचे न पहुंचे, शरीर का रक्तचाप जरूर उच्च स्तर पर पहुंच जाता है। हृदय नामक पंपिंग स्टेशन आखिरकार चिररर मिररर कर चूचू का मुरब्बा हो, परित्यक्त व्यवहार करने लगता है । मशीन की भांति चलने वाली यह चिरैया जैसी शरीर की रचना कब स्थूलकाय ट्रक हो जाती है संभवत शोध का विषय हो सकता है लेकिन अब जो हो गया सो हो गया।
जुबान पर शक्कर की फैक्ट्री हो ना हो रक्त में अधिक शक्कर हुई कि स्वास्थ्य ने लगाई डुबकी और अब हम सब चंगापन पुनः पाने के लिए हम सब दौड़ पड़ते हैं । कोई दवाई खाने की दौड़ लगा देता है तो कुछ संतुलित पौष्टिक भोजन पर अपनी ऊर्जा को दांव पर लगाता है परंतु मीठा न छोड़ने वाले सुधीजन, उच्च रक्त शक्कर के साथ खुद के लिए डॉक्टर के घर की या क्लीनिक की नियमित दौड़ लगाने को तत्पर रहना पड़ता हैं। उस पर दोष पूरा डॉक्टर को तुम ठीक नहीं कर पा रहे जैसे परीक्षा में फेल होने पर दोष परीक्षक का कि उसने ५ नंबर से फेल कर दिया जबकि होना ये कि तुम खुद ५ नंबर की स्वयं को मदद न कर पाए तो शिक्षक को क्या दोष.
क्यूबा, शक्कर का कटोरा बताया जाता रहा और खून में शक्कर की फैक्ट्री हिंदुस्तान में स्थापित हो गयी. शक्कर न हुई, जैसे अपराध हुई। नमक के बारे में जैसे छत्रसाल कहते थे कि नमक से मीठा कुछ नहीं और नमक तो शैतान का बच्चा ही हो गया. जीभ को लुभाने वाली हर डिश पर उपस्थित चाहे वह चाय, दही, फलों के रस या सलाद ही क्यों ना हो . और नमक को शरीर से निचोड़ना याने कठिन कार्य जो सिर्फ दौड़ने से ही संभव है और दौड़ना सभी के लिए कंचनजंगा जैसी चढ़ाई जो मरते मर जाओ,. चढ़ते ना बने ।
छोटे बच्चे, मोटे बच्चे, जवान मोटे और बूढ़े पतले सबको नमक और शक्कर को शरीर से जलाने की दौड़ दौड़ना है वह भी रोज परंतु आलसी मन सुबह को उठाये न उठे। दिन दोपहर या शाम सुहानी या भीनी भीनी रात को जो दौड़े तो हंसी का पात्र बने और दिन भर तो नमक-शक्कर का गठजोड़ धमाचौकड़ी शरीर में बनाए ही रखेगा। जोड़ जोड़ का जोड़ जोड़े तो गठजोड़ बनने और दौड़ दौड़ कर जो दौड़े तो स्वस्थ जोड़ बने ।
घुटने अड़े, कमर दर्दीली, फेफड़े थके, हृदय का दम फूले या खून कम बने, जो भूख न लगे हाजमा गतिरोध बने तो मानव तो क्या बेजुबान जीव-जंतु भी दौड़े. दौड़ें कैसे, जोड़ें कैसे और ना जोड़ें तो आगे बढ़ें कैसे, धन जोड़ें नाम जोड़ें, जोड़ें कि स्वास्थ्य जोड़ें.
प्रश्न कठिन उत्तर सरल .
होश में दौड़े या बेहोश दौड़े, जागृत दौड़े या सोते हुए दौड़े, या विचार मात्र को दौड़े कि शरीर मात्र से दौड़े। योग प्राणायाम से दौड़ें या स्थूल काया को विश्राम दें । 6 घंटे की नींद के साथ दौड़े तो तनाव पीछे छूटे। फास्ट फूड तो सब बच्चों को स्लो ही कर दे तो कैसे कोई दौड़े और जो दौड़ना छोड़े तो जोड़ना अपने आप छूटे।
प्रथम सुख निरोगी काया, वेदोक्त स्थापना है सदियों से, तो आज से दौड़े भले 50 मीटर दौड़े परंतु रोज दौड़े । निर्मल स्वास्थ्य 24 घंटे की साधना है और चित्त की शांति से ही रक्त के बहने का दबाव तथा रक्त में बहने वाली शक्कर नियंत्रित होगी । स्वस्थमेव जयते जटिल है किंतु स्वस्थ मेव जयते आसान है दौड़े तो सही

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