Sunday Lunch is Hypnotic

22 September 2024

रविवार की दोपहर – मनोहारी दाल-बाटी का निंद्रा आगोश

कहने को तो रविवार, 1843 से सभ्य समाज में अवकाश का नियत दिन है. इस साप्ताहिक अवकाश दिवस की दोपहर विशिष्ट प्रकार की अनुभूति हो, पर्व समान अवसर होता है. जब गर्मी के मौसम की दोपहर या बारिश के मौसम की दोपहर या सर्दी की दोपहर का शुभारंभ होता है तब इमरजेंसी सेवा के पुलिस ओर हॉस्पिटल में कार्यरत कर्मियों के अतिरिक्त सभी सुधिजन के जीवन में यह रविवार की दोपहर न जाने कैसी अफीम जैसी नशेमन हो उतरती है जिसका शब्दों में विवरण लगभग असंभव है.

आमतौर पर रविवार की सुबह बहुत शिथिल भाव से अपना शुभारंभ तो करती है, एक भारी भरकम नाश्ते के रूप में प्रस्तुत होती है. यह नाश्ता औषधि के लगभग लोडिंग-डोज याने बड़ी खुराक एके रूप में मिलता है. वहीं दोपहर आते-आते चाहे जितना नियम पालन करते हुए यह रविवार का दिन घरेलू चिक-चिक का प्रदर्शन करते हुए फीस्ट-डे यानी दावत-दिवस के रूप में उपस्थित होता है जहां दाल बाटी या बाफले के साथ चूरमा जैसे मोहनभोग किसी भी अवकाश अधीन भोजन भक्त के लिए मोटी रिश्वत का समुचित कारण होता है. और जैसा आमतौर पर होता है रिश्वत काम कराने के लिए हामी होती है यह ब्रह्मा-महाभोज नींद के उस आगोश में धकेल देता है जहां सोफे पर बैठे-बैठे या बिस्तर पर आधे लेटे हुए टीवी के सामने या बिन-बेग में पड़े हुए दोपहर की दावत से पीड़ित इस भोले नागरिक को सोता हुआ शेर होने में देर नहीं लगती.

रविवार की यह दोपहर न केवल घर के मुखिया पुरुष को धराशायी करने के लिए पर्याप्त होती है बल्कि हफ्ते भर छुट्टी ना मिलने वाली घर की गृहणी महिला को भी यह दावत, हीन भावना से पीड़ित करने के लिए अपनी सहभागिता प्रस्तुत करती है. यही हाल ऊर्जा से भरपूर बच्चों का भी होता है. जब रविवार की दोपहर अपने स्कूल या कॉलेज से मुक्त यह जिज्ञासु छात्र अपने मोबाइल स्क्रीन या टीवी स्क्रीन का परित्याग कर दावत के वशीभूत हो निंद्रा आगोश में समा जाते हैं.

आश्चर्य का विषय यह नहीं है कि ऐसा रविवार की दोपहर को ही क्यों होता है?

बल्कि यह है कि रात के भोजन अथवा अन्य अवकाश के दिन दोपहर में इस तरह का दृश्य प्रस्तुत नहीं हो पाता है. यह सुख जो रविवार को प्राप्त है वह किसी अन्य दिवस को प्राप्त नहीं है. रविवार की अवकाश की अवधारणा का प्रतिपादन किसी ने भी किया हो, 6 दिन के कामकाजी समयसारणी के बाद पूरे दिन का अवकाश न केवल एक मानसिक शांति को प्रदान करता है बल्कि शारीरिक श्यानता को शिथिल कर मस्तिष्क की जैविक घड़ी को थाम ही देता है.

मानव शरीर रविवार का जिज्ञासु है जिसकी प्रतिक्षा हर शाम को की ही जाती है परंतु रविवार के आने की सबसे अधिक हर्ष का क्षण शनिवार की शाम को होता है जब सोमवार से शनिवार के सारे नियम शनिवार की शाम से शिथिल हो रविवार को अपने शिथिलतम रूप में प्रदर्शित होते हैं. क्या नौकरी वाले या व्यवसायी या घरेलू कारज में संलिप्त जातक सभी को इस साप्ताहिक अवकाश को अनन्य प्रतीक्षा रहती है.

रविवार की छुट्टी की शुरुआत ब्रिटिश काल में 1843 में हुई जो कालांतर 1890 में ब्रिटिश शासन ने सबके लिए रविवार के दिन छुट्टी घोषित की. यह भी कहा जाता है कि जिस दिन ईशा मसीह ने अपने शरीर को त्यागा उस दिन को गुड फ्राइडे था और रविवार के दिन उन्हें जीवित देखा गया. अतः जीवित देखने जाने की इस घटना को एक पवित्र दिन याने ईस्टर संडे के रूप में मनाया जाता है. एक अन्य मतानुसार, ईसाई धर्म के अनुसार ईश्वर ने दुनिया को 6 दिन में बनाया और रविवार को विश्राम किया था इसीलिए ब्रिटिश एंपायर के सभी कॉलोनी देशों में रविवार का दिन, अवकाश का दिन के रूप में मनाया जाता है. अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संस्था के अनुसार रविवार का दिन सप्ताह का आखिरी दिन है और इसी दिन की छुट्टी की मान्यता 1986 में मिली थी.

सनातन मान्यता के अनुसार रविवार सप्ताह का पहला दिन होता है अंतिम दिन नहीं. रविवार सूर्य देवता का दिन है और रविवार को सूर्य अपनी सबसे अधिक ऊर्जा लिए प्रस्तुत होते हैं सूर्य प्रकाश का सबसे बड़ा स्रोत स्रोत है और प्रकाश को सनातन धर्मं में सकारात्मक भावों का प्रतीक माना जाता है. प्रकाश में सभी तरह के रोग ओर शोक मिटने की क्षमता के स्थापित तथ्य हैं जो विटामिन डी के अतिरिक्त हैं. इस सबके बाद भी रविवार का मोहक क्षण दोपहर का भोजन ही माना गया है जो किसी भी अन्य दिन की तुलना में भिन्न रूप से हैवी वेट होता है. सामिष निरामिष भोज की दावत का कार्य मेनू शनिवार की रात के भोजन के समय से आरम्भ हो जाता है.

हम भारतीयों की एक विशिष्ट आदत है कि भोजन करते समय इस भोजन का मजा लेते हुए अगले भोजन के लिए कार्य योजना न केवल बना लें बल्कि जिम्मेदारी भी बाँट देना कि सब्जी मंडी चले जाना, तुम किराना ले आना ओर तुम खाना बना लेना. रविवार का दोपहर भोज भारतीय परिवार में एक बड़ा प्रोजेक्ट है जो जेब की क्षमता अनुसार निर्धारित होता है. रविवार अद्भुत है, कल्पना की उड़ान है, भोजन ओर अवकाश है, आलस ओर विश्राम है, हर क्षण का उल्लास है.

Leave a comment

Blog at WordPress.com.

Up ↑