यात्रा वृतांत : ओरछा
(राम दरबार, मध्य प्रदेश)
राम ऐसी ऊर्जा है जो कल्पों से एक अवधारणा के रूप में न केवल जनमानस में प्रेरणा के स्रोत हैं बल्कि एक विचारधारा के वाहक भी हैं जो जनमानस में सामाजिक व्यवहार के प्रति एक विभिन्न उदाहरण प्रस्तुत करती है और इसीलिए राम स्वीकार्य हैं, पूजनीय हैं, अविस्मरणीय हैं. आस्तिक मानस के लिए श्रीराम, प्रभुराम के रूप में स्थापित हैं तो नास्तिक के लिए मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम के पूर्वज रूप में स्थापित हैं.
भले ही राम घट घट में हैं तो राम कथा भी मन मन में स्थापित है और 12 कलाओं में प्रवीण श्रीराम से संबंधित कोई कथानक जो श्रीराम के विग्रह रूप में स्थापना से संबंधित हो तो कथानक रुचिकर प्रतीत होता है.
कथन ऐसा है कि त्रेता युग की कैकई माता के राजा दशरथ से वरदान मांग लेने से श्री राम को 14 वर्ष का वनवास स्थापित हुआ. आगे का घटनाक्रम तो जगजाहिर है परंतु इस कलयुग में 400 बरस पहले माता केकई ने पुनः जन्म लिया और राम भक्ति में राम की राजा के रूप में स्थापना करने के लिए अपना सर्वस्व होम करने का प्रयास भी किया. कथाक्रम ऐसा प्रस्तुत हो तो आश्चर्य होता है, मानव की कल्पनाशक्ति पर और सनातन के भक्ति भाव पर.
ओरछा के तत्कालीन शासक मधुकर शाह बुन्देला के राज्यकाल (1554-92) के दौरान उनकी रानी कुंवर गनेश राजे अयोध्या से लाई थी जिन्हें कैकई के कलियुगी अवतार रूप माना जाता है जिनके अथक प्रयासों से राजा राम को ओरछा राज्य का राजा के रूप में प्रस्थापित करने का संकल्प त्रेतायुग के पश्चाताप लि पूर्ति करने का प्रयास है.
रोचक कथा प्रसंग है कि 17वीं शताब्दी के आरंभ में मध्य प्रदेश के उत्तर में झांसी और ग्वालियर के समीप ओरछा के राजा मधुकर शाह जहां श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे वहीं उनकी पत्नी कुंवर गणेश राजे श्रीराम की अनन्य भक्त थीं.
कथा प्रचलित है कि कृष्णभक्त, राजा मधुकर शाह और राम भक्त रानी कुंवर गणेश राजे में विवाद हुआ तो राजा को चुनौती को रानी ने स्वीकार किया और रानी ने अयोध्या की ओर प्रस्थान कर राम को ओरछा लाने का निश्चय किया.
महीनों की तपस्या के बाद श्रीराम ने स्वप्न में रानी को तीन स्थितियों का पालन करने पर ओरछा चलने का वचन दिया. उन्होंने तीन शर्तें रखीं- पहली यह कि वे ही ओरछा के राजा होंगे तथा विस्तार नहीं करेंगे, दूसरी- यह यात्रा पैदल यात्रा केवल पुष्प नक्षत्र में होगी, तीसरी- रामराजा की मूर्ति जिस जगह रखी जाएगी वहां से पुन: नहीं उठेगी. तीन वचनों से सहमत होकर रानी ने अयोध्या से प्रस्थान किया था.
अयोध्या के राजा से निवेदन किया गया कि राजाराम और उनके दरबार के स्थापना के लिए योग्य मंदिर का निर्माण कराया. अयोध्या से ओरछा की दूरी समाप्त होने पर भगवान श्रीराम के मूर्ति विग्रह स्वरूप को महल रुपी नवनिर्मित मंदिर में स्थापित करने के पूर्व समीप स्थित भोजशाला में विश्राम हेतु रखा गया. राजा राम अपने दरबार के साथ इसी स्थल पर अपने वचन के वशीभूत हो सदा के लिये स्थापित हो गये थे. नवनिर्मित मंदिर आपने रामराजा के दरबार से वंचित रह गया ओर रामदरबार भोजशाला में आज भी दर्शन हेतू विराजमान हैं. ये पृथ्वी पर कदाचित एकमात्र स्थान हो जहां भगवान राम अपने लिए नियत मंदिर या भवन में नहीं विराजे हैं बल्कि भोजशाला में विराजे हैं. राजा राम के लिये निर्मित मंदिर विपन्न रह गया और भोजशाला मंदिर बन गया.
इस पवित्र स्थल पर राजा राजाराम के अतिरिक्त कोई राजा नहीं है शासक नहीं है तथा प्रातः काल और सायं काल राजाराम को मध्य प्रदेश शासन की ओर से गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया जाता है. रामराजा के मंदिर की भव्यता न केवल दर्शनीय है बल्कि आध्यात्मिक लौ से आलोकित है जो किसी भी व्यक्ति के मन को मोह लेती है.
ओरछा वैसे भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है जहां नदी बेतवा पर रिवर राफ्टिंग की सुविधाएँ उपलब्ध हैं. यह पूरा क्षेत्र हरियाली से आच्छादित है और मनमोहक है. चतुर्भुज महल, जहांगीर महल, ऊँट-खाना और छतरीयोँ की श्रृंखला अविश्वसनीय और दर्शनीय प्रतीत होती है .
भवनों और प्रस्तीरों की विहंगम श्रृंखला पूरे क्षेत्र में आपकी नैसर्गिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और साहसिक भूख को तृप्त करने के अद्भुत प्राकृतिक स्थल है. अब यहाँ उच्च स्तरीय होटल और रिसोर्ट भी उपलब्ध हैं जो एक विशिष्ट यात्रा में सहायक है.
झाँसी रेलवे स्टेशन से मात्र 17 किलोमीटर दूरी पर स्थित यह रमणीय स्थल सड़क से आसानी से पहुँचा जा सकता है. समीपस्थ हवाई अड्डा ग्वालियर है जहां से ओरछा 128 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. और ओरछा जाने का उत्तम समय सितंबर से फ़रवरी के मध्य है. ओरछा अब सनातनियों के लिए वैवाहिक आयोजनों का भी स्थल बन गया है जहां देश-विदेश से धनी परिवार अपने बच्चों का विवाह करने आते हैं. ओरछा का सौंदर्य सेल्यूलॉइड पर कहानी रिकॉर्ड करने के लिए अब मुंबई फ़िल्म उद्योग भी अपनी फ़िल्मों की कहानी की शूटिंग करने को उपस्थित होने लगा है.


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