सीरीज रिव्यू-
पंचायत
जिस प्रकार पेय पदार्थों में पानी से उत्तम कोई अलौकिक पेय नहीं है इसी प्रकार टेली सीरीज, पंचायत के तृतीय अंक का आनन्द भी अलौकिक व उत्तम है.
निर्मल
नैसर्गिक
नितांत भारतीय
और
प्रासंगिक…
ग्रामीण परिद्रश्य के परिवेश में बुना हुआ यह कथानक शासकीय योजनाओं की बानगी के साथ साथ राजनीति के भिन्न आयामों को भी रोचक ढंग से आलोकित करता है. यहां तक कि लोभ के चलते प्रधानमंत्री आवास योजना के अन्तर्गत एक अतिरिक्त घर प्राप्ति का कथानक भी शिक्षा प्रदान कर देता है.
प्राइम ओ टी टी प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित यह 8 अंको की प्रस्तुति न केवल दर्शनीय है बल्कि गांव की समस्याओं के साथ साथ उनके निराकरण के अदभुत विचार के साथ प्रस्तूत होती है जैसे विधायक को सबक सिखाने के लिये उसका श्वेत घोड़ा ही खरीद लेना.
ग्रामीण क्षेत्र में भी वैमनश्य्ता, राजनीति, बदला और गाली-गलौच, मार-पीट के बीच सामाजिक सरोकार प्रदर्शित किया गया है.
कलाकार अदभुत हैं और आपको विष्मित करते है. बिना शक यह मनोरंजक सीरीज है. एक प्रेम प्रसंग भी है जो अपनी मंथर गति से 1980 के अपने दशक का स्मरण करवा देता है जब संकोच, लिहाज और परम्परा रुपी बाधाओं से प्रेम कथायें चला करती थीं.
टिप्पणी-
अनिवार्य रूप से देखने योग्य

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