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पड़ोसी धर्म और विवाद का विज्ञान – बुद्ध भी न समझ पाए !

दो पड़ोसियों के मध्य होता संवाद या यूँ कहें कि विवाद-

क्या मैं आपका अच्छा पड़ोसी हूँ ?

नहीं!

तो क्या आप मुझे आपका अच्छा पड़ोसी बनने में सहायता करेंगे?

वो कैसे!

जैसे आप आपने घर का पानी या कचरा मेरी घर की सीमा में न आने दें तो मैं आपको अच्छा पड़ोसी बनने का वचन देता हूं!

और मैं यह न करूँ तो?

तो भी मैं एक अच्छा पड़ोसी बनने का प्रयास करूंगा आपके सहयोग के बिना !

वो कैसे?

मैं प्रयास करूँगा की आपके टपकते नल को सुधरा दूँ.

और?

मैं प्रयास करूँगा कि आपका फेंका हुआ कचरा, कचरा पेटी में डाल दूँ!

अच्छा!

मैं प्रयास करूँगा की आपकी गाड़ी मेरे घर के सामने खड़ी हो तो मैं अपनी गाड़ी कहीं और पार्क करके आपके निर्णय का सम्मान करूँ!

यह तो ज्यादा हो जायेगा ?

मेरे पास आपसे विवाद करने का कोई कारण नहीं है. आखिर आपको और मुझे यहीं रहना है तो मेरी ओर से विवाद न उत्पन्न हो ये प्रयास अवश्य करूँगा.

फिर भी विवाद पैदा हो तो क्या कर लोगे?

कुछ नहीं ! आपके बच्चो को नैतिक शिक्षा की कहानी सुनाना आरम्भ करूँगा कि जीवन जीने की उत्तम शैली सह-अस्तित्व की है जिसके बिना हमारा अस्तित्व संभव नहीं है.

मौन धारण ओर पलायन.

दो पड़ोसी व्यक्तियों के बीच में होने वाली हाथापाई की नौबत उत्पन्न होने के पूर्व, महीना-दो-महीना दोनों पड़ोसियों के मानस के मध्य एक अंतरद्वंद्व हुआ करता है. यह अंतर्द्वंद एक सीढ़ीनुमा क्रम का पालन करते हुए असंतोष – विषाद – दु:ख और वैचारिक संघर्ष का ना केवल पालन पोषण करता है बल्कि समय के चलते कालांतर में उसकी परिणिति हाथापाई याने फौजदारी में हो तो भी कोई आश्चर्य नहीं है. और ऐसी स्थितियां बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक में पुष्प पल्लवित होती दिखाई पड़ती है. बस अंतर यह है कि बच्चे विवाद उत्पन्न कर उसे अस्थायी जान तुरंत सुलह-सलाह कर लेते हैं और बड़े-बूढ़े विवाद को अपने मानस में एक स्थाई स्थान देते हैं जिसके कारण दु:रूह स्थितियां उत्पन्न होती हैं जो पुलिस-स्टेशन और न्यायालय तक अपना रुख करती हैं जिसमें न केवल समय बल्कि अतिशय धन-संपदा की भी हानि होती है. पड़ोसियों के बीच शांति का आरम्भ आपसी सम्मान से होता है.

 

पड़ोसियों के मध्य होने वाला होने वाला विवाद अंतर्मुखी या बहिर्मुखी हो, अंतर्द्वंद की सीढ़ियां चढ़ बहिर्द्वंद में परिवर्तित होता है, भले इसमें कुछ महीनो से कुछ सालों तक लग जाए. आमतौर पर पड़ोसी एक दूसरे की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नैतिक सम्मान करते हैं और सीमाओं का अतिक्रमण या उल्लंघन नहीं करते हैं और चाहते भी हैं कि कोई पड़ोसी अपने घर का कचरा उनकी सीमा में न फेंक दे अथवा अपनी पार्किंग के स्थान को छोड़ दूसरे की पार्किंग स्थान में अपना वाहन पार्क कर दे या संगीत के उपकरण की ध्वनि अपनी चहारदीवारी में शोर के नियम के डेसिबल अनुसार नियंत्रित रखे.

 

और इसी तरह, पड़ोसियों के मध्य छितराई हुई वायुसीमा या थल सीमा के अतिक्रमण का अंतर्द्वंद आरंभिक दौर में क्षमा करने को हामी ही होता है कि कदाचित विवाद की स्थिति न उत्पन्न हो. कहा जाता है कि एक प्यार करने वाला पड़ोसी एक साधारण पड़ोस को एक जादुई जगह में बदल सकता है. पड़ोस वह सामाजिक ताना-बाना है जो हमारे जीवन को बुनता है. प्रथ्वी ओर काल की गणना के आदिकाल से त्रिगुण का प्रादुर्भाव चल अचल रूप में आलोकित होता रहा है. सत, राज और तम का समावेश जहाँ सभी जीवों का अनिवार्य तत्त्व है वहीँ पड़ोस धर्म भी इन्ही त्रिगुण से पोषित होता है चाहे वह घर के बगल वाला पड़ोस हो अथवा देश के पड़ोस वाला पड़ोस हो जो सत की दैवीय, राज की राजकीय तो तम की असुरी शक्तियों का वाहक ओर साधक होता है.

आप अपने बारे में सोचो या मत सोचो, पड़ोसी आप के बारे समालोचनात्मक राय का विचार कर रहे होते है. पड़ोसियों के मध्य सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाली अनबोले याने बोल-चाल के सम्बन्ध न होने की अवस्था असंतोष में परिवर्तित होती है. पड़ोसियों के मध्य अनबोले की स्थिति सदियों चल सकती है परंतु असंतोष और अंतर्द्वंद में अधिक समय नहीं लगता है. यह हो सकता है कि अंतरद्वन्द की परिणिति बहिर्द्वंद में कब होगी यह उस चिंगारी पर निर्भर है जो अतिक्रमण करता बहता हुआ पानी या अवांछित स्थान पर फेंके हुए कचरे के अतिक्रमण अथवा पार्किंग की जगह के विवाद के रूप में दोनों पक्षों के सामने आज खड़ी हो और यही बहिर्द्वंद, बुद्ध के उसे ब्रह्म वाक्य उसे नियंत्रित होती है कि “आपका मस्तिष्क ही सब कुछ है जैसा आप सोचते हैं वैसे आप हो जाते हैं”. अंतर्द्वंद की दशा को जब आप वैचारिक विवाद की श्रेणी से पड़ोसी को सुधर देने को प्रक्रिया में बाहुबल के माध्यम से विवाद की श्रेणी में ले जाने का दिव्य दर्शन करते हैं तो वह अप्रत्याशित रूप न्यूक्लीयर संघटना के रूप में घटित होने को तत्पर होता है.

पड़ोस हमारे जीवन की साझा कहानी है. पड़ोसी धर्म का पालन भले जटिल हो, है यह सहजीवन का पर्याय है जो पडोसियों के परिवारों के मध्य आपसी सहभागिता, मित्रता और सहिष्णुता का भी प्रतीक है. एक अच्छा पड़ोसी आपातकाल में मित्रों और रिशतेदारों से पहले सहायता को उप्लब्ध होता है भले आपके आपसी संबंध मधुर न हों या बोलचाल न हो. जहां अच्छा पड़ोसी एक धरोहर सिद्ध हो सकता है तो बुरा पड़ोसी रातों का डरावना स्वप्न सिद्ध हो सकता है. जहां अच्छे पड़ोसियों के मध्य आहार- विहार- विचार के नैसर्गिक आदान-प्रदान हो सकते हैं तो सुधि और सहिष्णु पड़ोसी आपने घर के चौके में बनी सब्जी प्रस्तुत कर सकता है तो बदी और असहिष्णु पड़ोसी घर में बनी हुई कल की बासी सब्जी आपके दालान में फेंक सकता है.

जहां विकसित देशों में कुत्ते की उत्सर्जित मल को उठाने का दायित्व श्वान – स्वामी का है तो भारत में श्वान भक्ति का चित्र विचित्र है जहां श्वान पालक सुधि-बदी पड़ोसी का कर्तव्य है कि वह अपने पालतू श्वान को आपके घर के सामने विष्ठा उत्सर्जन करवा कर अपने नैतिक दायित्व से आँखें फेर ले. वहीं अन्य प्रकार के सुधि पड़ोसी जो श्वान पालन में संलिप्त न हों परन्तु केतु ग्रह से पीड़ित हो वे केतु ग्रह शांति के लिए यह क्रिया सुनिश्चित करते है कि वे आवारा श्वान समूह को प्रतिदिन निशुल्क घर के बचे हुए भोजन का भण्ड़ारा उपलब्ध कराते हैं ताकि सभी पडोसियों को घर के सामने प्रातः काल में घृणास्पद विष्ठा दृष्टिगत हो.

पड़ोसी के नैतिक कर्तव्य के सीमा चतुष्कोणीय हो सकती है जो पडोसियों के नैतिक व्यवहार और सहनशीलता पर निर्भर है. एक समझदार पड़ोसी एक ऐसा कंधा है जिस पर भरोसा किया जा सकता है. एक समझदार पड़ोसी प्रकृति के पंचधातु का प्रतीक हो वायु, जल,धरा, अग्नि ओर आकाश का स्वयम्भू देवत्व का वाहक हो सकता है. सजीव होने के लिए निश्चित रूप से आत्मा का धनी होना आवश्यक है. प्रयास कीजिये यह आसान है कि हम अच्छे पड़ोसी बने.

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