रोको रोको…
(२ सुधिजनों का संवाद )
रोको ! रोको ! जनसँख्या वृद्धि रोको!
कौन रोकेगा. ये असंभव है! १४० करोड़ को न समझा पाओगे. कानून न लाद पाओगे.
तो रोको, भ्रूण परिक्षण रोको.
अरे! उसमें तो डॉक्टर को पकड़ो, वही बताता है, लड़का है कि लड़की है.
हाँ , उसको रोको. लेकिन समाज, डॉक्टर को लालच भरी रकम देकर भ्रूण परीक्षण क्यों कराता है.
अरे! समाज का तो नैतिक पतन इतना हो गया है की अपनी पुत्री की हत्या में भी वह हिचकता नहीं है.
तो, डॉक्टर को कैसे रोको.
उसका लाइसेंस कैंसिल कर दो.
अच्छा , यह तो ठीक ही हुआ.
….अब डॉक्टर सुधर गए हैं….
अब भ्रूण हत्या रोको.
अब क्यों हो रही है भ्रूण हत्या?
अरे समाज के धनि मानी लोग विदेश यात्रा कर वहां से भ्रूण परीक्षण करा के, भ्रूण हत्या अपने शहर में करा रहे हैं.
अरे ये तो अन्याय है, रोको रोको.
कैसे रोको! समाज को कैसे रोको.
नैतिक बल और राष्ट्रिय चरित्र की कमी है समाज में. लोभ, मोह, माया, वासना के चलते आम और ख़ास अमरत्व का मिथ्या भाव पाले विज्ञानं की सहायता से अनैतिक कर्म में लगे है.
रोको फिर!
किसे?
विज्ञान को रोको.
वो कैसे रुकेगा, वह तो नित्य-प्रति प्रगतिशील है. पहले सब इश्वर प्रदत्त था. पुत्र की एक्स – वाई की और पुत्री की एक्स- एक्स की जानकारी मात्र थी. अब पुत्र प्राप्ति के लिए विज्ञान वाई गुणसूत्र को प्रथक करा कर पुत्र पैदा करा देता है.
ये भी रोको.
अरे ! क्या क्या रोको. और हर समय दुसरे को ही क्यों रोको. कभी खुद को भी रोको कि यह अनैतिक है, असामाजिक है, दुराचार है….यह कृत्य मैं नहीं करूँगा और मैं स्वयं इसे रोकूंगा
याने…… मैं ……को रोको!
सही है क्या, हाँ ,’ मैं ‘ को रोको, मलिन विचार को रोको.
“मैं” रुकेगा तो १०-२० साल में समाज भी रुकेगा, समाज नैतिक होगा तो सत्य का विचार करेगा, सत्य की राह चलेगा. इस तरह जो मैं रुकेगा तो भ्रूण हत्या रुकेगी, भ्रूण परीक्षण रुकेगा, जनसंख्या की अंधाधुंध बढ़त रुकेगी. कदाचरण रुकेगा तो अनुशासन चलेगा तो प्रगति का पहिया चलेगा, राष्ट्रिय चरित्र का निर्माण होगा, प्रगति से विकास चलेगा, सम्रद्धि होगी ओर मानव धर्म का जीवन प्रथ्वी पर बढेगा .
तो निष्कर्ष क्या हुआ!
रोको किसको!
मैं को रोको.
किसके पास है ये मैं.????
स्वार्थ का ‘ मैं ‘सबके पास है और त्याग का ‘मैं’ या मैं सुधरूंगा का ‘ मैं ‘ किसके पास है ????
निपट सन्नाटा!
…सत्य है, मैं….. परिवर्तन का हामी नहीं…..

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