चलचित्र समीक्षा –
कहानियों का संसार अद्भुत है और नयेपन की कहानी आपको चमत्कृत भी कर देती है. ऐसी ही एक कहानी का चलचित्र नेटफ्लिक्स पर कल देखने में आया जिसमें एक दिव्यांग दुनिया को सदा अच्छा समझने की कोशिश में बिगड़े हुए को भी सुधार लेता है और एक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व का वहन हेतु तैयार कर लेता है. इस कथानक के नायक वरिष्ठ कलाकार कुमुद मिश्रा थोड़े से स्थूलकाय हैं और यही मोटापा उनकी कला को निखार देता है जब वे दिव्यांग के रोल में अपने आप को समावेशित कर लेते हैं.
यह चलचित्र नजरअंदाज संभवत अपने कथानक के साथ-साथ अपने डायलॉग की सम्रद्धता से देखे जा सकने योग्य है तथा एक दिव्यांग की मानसिक सुदृढ़ता को जिस प्रकार उन्होंने अपने हीन भावना के ऊपर हावी नहीं होने दिया है वह लगभग अतुलनीय है. चोर कर्म को त्याजे और लोभ में सुधरे मानस से अभिषेक बेनर्जी ने भी अपनी कला से अद्भूत साक्षात्कार कराया है.
मानव मन की आकांक्षाओं का और परिवार के मूल्यों का और परिवार के संग रहने की आकांक्षाओं का अद्भुत प्रदर्शन है जिसे निर्देशक विक्रांत देशमुख ने उत्तम रुप से उकेरा है. चोर के रूप में अभिषेक बैनर्जी ने अपने आपको सिद्ध किया है जबकि दिव्या दत्ता हमेशा की तरह बड़ी ही प्राकृतिक लगी है. दिव्यांग कुमुद मिश्रा के अभिनय कौशल को इस चलचित्र में 5 स्टार जरूर मिलना चाहिए जिन्होंने अपनी मां की पढ़ाई, धरती की शिक्षा और अपनी अपन्गता के कारण अधुरी इच्छा का मनोहारी चित्रण किया है.
बचपन के प्यार से बरसों बाद मिलने के बाद उसके हाथों से बनी खांडवी के स्वाद से आनंदित होने का दृश्य से अतृप्त इच्छा का प्रदर्शन तो अद्भूत बन पड़ा है.
गुजरात के कच्छ के रण की सफ़ेद रेत पर नेत्रहीन दौड़ का दृश्य और नेपथ्य में नभ पर चमकते तारों का थाल तो गर्म दाल-चावल पर घी की भान्ति बन पड़ा है जो स्वादिष्ट… तृप्तिदायक…सम्मोहक और पूर्णमिदं की अपूर्व अनुभूति से सराबोर कर देता है.
दर्शनीय
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