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राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली
भारत के प्रथम नागरिक और संविधान के प्रमुख का रहवास स्थान है और जब इसके संग्रहालय का संदर्भ आता है तो यह विचार उत्पन्न होता है कि इस सम्पदा की यात्रा अनावश्यक और थकावट वाली उबाऊ होगी.. परंतु ऐसा नहीं है !
25 एकड़ में फैले घने वृक्षों के मध्य स्थित पुराने और नए संग्रहालय की जोड़ी ने आम भारतीय को भारत के इतिहास और आने वाली भविष्य की परिकल्पना से सुशोभित किया है. हालांकि पुराना संग्रहालय अन्ग्रेज काल से घुड़साल के रूप में उपयोग लाया जाता रहा लेकिन अब बीते कुछ बरसों से अंग्रेजों के काल के विभिन्न उपकरण, कुर्सियां, पुरस्कार, भोजन के बर्तन, क्राकरी इत्यादि से सुसज्जित है. 1911 मे कोलकाता से राजधानी के परिवर्तन पश्चात दिल्ली में उपनिवेशवादी ब्रिटेन के राजा तथा रानी के लिए शुद्ध चांदी से बनी लगभग 300 किलो की कुर्सियों का प्रदर्शन भारत के शोषण के दुखद चित्र को प्रदर्शित कर देता है और आंखें नम हो जाती हैं कि किस दुर्दांत तरीके से भारत की नैसर्गिक संपदा का दोहन और शोषण किया गया और राजाओं ने अपने बैठने के लिए भी चांदी की कुर्सियों का निर्माण किया जबकी लगभग पूरा भारत और भारतीय, गरीब बने रहे. जलियांवाला बाग, इंडो – अफगान युद्ध में उपयोग में लाए गए हथियारो और बंदूक का प्रदर्शन भी हृदय को कहीं द्रवित कर देता है कि हम सरल हृदय भारतीय ना जाने किस स्वाभाविक रूप से अतिक्रमणवादियों और अतिवादीयों की भेंट चढ़ते रहे हैं.
हालांकि नए संग्रहालय में संरक्षित वस्तुओं से भारत की गरिमामयी और गौरवशाली परंपरा और इतिहास का प्रभावी प्रदर्शन भी होता है परंतु साथ में अंग्रेजी वायसराय-लॉर्ड- प्रधानमंत्री तथा उनकी मूर्तियों का प्रदर्शन कहीं हृदय में कसक सी छोड़ जाता है. संभवतः इसलिये कि इतिहास याद रखा जाये कदाचित ये कसक भी गांठ बनी रहे ये आज भी स्थापित हैं.
भूतल तथा जमीन से नीचे दो तल में विस्तारित यह संग्रहालय ना केवल भारत के पूर्व राष्ट्रपतियों को प्राप्त पुरस्कारों तथा भेंटों को प्रदर्शित करता है बल्कि उनके दैनिक उपयोग में आने वाली वस्त्र, कलम तथा पुस्तकों का भी भव्य प्रदर्शन करता है. संग्रहालय में राष्ट्रपतियों के सम्मान में भारत के नागरिकों ने जो तैल चित्र या अक्षर चित्र बनाए हैं वह अद्भुत प्रतीत होते हैं.
परंतु हमारे वैज्ञानिक राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को समर्पित एक पेंटिंग दुर्लभ और अविश्वसनीय बन पड़ी है जिसमें चित्र के मध्य में स्थित स्टील के गोल पाइप में राष्ट्रपति महोदय की अद्भुत छवि प्रकाशित होती है. यह वाकई में कलाकार की अद्भुत कृति है जिसे देख मन आश्चर्यचकित हो जाता है .
भारत के राष्ट्रपति भारतीय सेना के सर्वोच्च कमांडर होते हैं अतः उनके अंतर्गत कार्यरत समस्त अधिकारी श्रेणियों के कंधे पर सुशोभित होने वाले निशान का प्रदर्शन, गर्व की अनुभूति से छोड़े बिना नहीं रहता है. यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि भारत के राष्ट्रपतियों को विभिन्न विदेशी राज्यों ने कुलीन श्रेणी की भेंटों से सम्मान प्रदान किया है जो वस्तुतः भारत के नागरिकों को मिला हुआ सम्मान है. यहां आश्चर्यचकित करने योग्य एक अनुपम भेंट इंडोनेशिया देश के द्वारा प्रदान की गई है जो एक पानी का जहाज है जो मात्र लौंग की कलियों और डंठल से बना हुआ है. इसे देखना अपने आप में एक अजूबे से कम ना था.
इसी प्रकार थाईलैंड देश द्वारा भी सोने से बने बर्तनों को भारत के राष्ट्रपति को भेंट किया गया है जो संग्रहालय में प्रदर्शित हैं. संग्रहालय के भूतल से नीचे द्वितीय तल पर सारनाथ के राष्ट्रीय स्तंभ का प्रदर्शन जिस प्रकार किया गया है वह अवर्णनीय है क्योंकि चारों सिंह के मुख के माध्यम से भगवान बुद्ध की शिक्षा की छवि प्रदर्शित होती है.
मूल रूप इसमें चार सिंह हैं जो चारों दिशाओं की ओर मुंह किए खड़े हैं जिनकी पीठ एक दुसरे के पीछे है. इसके नीचे एक गोल आधार है जिस पर हाथी, घोड़ा, एक सांड़ और एक सिंह बने हैं जो दौड़ती हुई मुद्रा में है. ये गोलाकार आधार खिले हुए उल्टे लटके कमल के रूप में है. हर पशु के बीच में एक धर्म चक्र बना हुआ है।
इसके अलावा अशोक स्तंभ के नीचे सत्यमेव जयते लिखा गया है जो मुण्डकोपनिषद का सूत्र है. इसका अर्थ है ‘सत्य की ही विजय होती है‘.
अशोक स्तंभ पर ये चार एशियाई बाघ शक्ति, गर्व, आत्मविश्वास और सच्चाई के प्रतीक हैं.
इसके साथ साथ भारत के नागरिकों को दिए जाने वाले अलंकरण की मूल प्रतियां भी संग्रहालय में संरक्षित है जैसे भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्मभूषण तथा पद्मश्री जो किसी भी भारतीय नागरिक की दिवा-आकांक्षा हो सकते हैं. इसके साथ राष्ट्रपति महोदय के द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली घोड़ा बग्गी भी प्रदर्शित है जो लगभग 100 साल पुरानी है और आज भी कार्य योग्य हैं, जबकि 1990 से 2012 तक के राष्ट्रपतियों द्वारा उपयोग में लाई गई एक बुलेट प्रूफ मर्सिडीज भी प्रदर्शित है जिस पर राष्ट्रीय स्तंभ नंबर प्लेट की जगह स्थापित है जो गर्व की अनुभूति कराता है.
परंतु इस संग्रहालय की सबसे अद्भुत प्रस्तुति तो महात्मा गांधी जी की दांडी यात्रा है जो भारत की स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को प्रदर्शित करती है.
संग्रहालय के थिएटर में इस आभासी प्रदर्शन से आप स्वयं महात्मा गांधी के साथ दांडी यात्रा में पैदल चलने का वास्तविक भान पैदा कर लेते हैं. महात्मा गांधी के साथ पैदल चलने की आभासी चलचित्र घटना को आगन्तुक एक यादगार गतिविधि के रूप में अंकित कर लेते हैं जो एक अद्भूत अनुभव सिद्ध होता है.



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