आस्था की फांस बड़ी दुर्दांत है….
और फ़ांस लग जाये तो छोटी होने के बाद लंबे दिनों तक घाव को पोषती है।
नीम की निमोरी ओर नीम की पर्यावरणीय उपयोगिता कितनी भी क्यों न हो, आमजन के मानस में पूजा तो आम का पेड़ ही जाता है। क्यो, कोई आम की छांव में आ बैठे तो मुस्कान आ जाती है चेहरे पर, अरे भाई, आम फलों का राजा है, इसका फल तो जीभ तो जीभ आत्मा को भी तृप्त कर देता है। वही जनाब कहने से चूकते नहीं कि नीम भले मानव और पर्यावरण दोनों के स्वास्थ्य का हामी वृक्ष है, फिर भी आम के आगे समझौता है।
….और नीम की निमोरी तो जीभ पर चढ़ ही नहीं पाती है भले पौष्टिक हों। बनी रहें पौष्टिक, कलाकार तो आम है चाहे जो हो चौन्सा, दशहरी या देसी टपका… गांव का आम हो या ठेठ शहर का, पत्थर उसके नसीब में उकेरे ही गये हैं जो घाव कहके भी मीठे फल समाज को समर्पित करता है। कड़वा नीम, अच्छा है, प्राणवायु का उत्तम स्त्रोत है ठंडक का हामी है, फिर भी समाज का आकर्षण नहीं है। जब शहर और गांव तपते हैं चैत्र, बैशाख ओर जेठ में तो सबसे पहले नीम की पौध लगाने का ही विचार उत्पन्न होता है।
तेज़ी से बढ़ने वाला, ताप को नीचे रखने को अपनी आर्द्रता न्यौछावर करने को तत्पर नीम ही हृदय रस को भाता है। यही फ़ांस लग जाती है नीम को कि ये कैसा पारितोषिक दिया जा रहा है। आम की भाषा उन्नत और नीम की उन्नत गति भी न होने पाए। ये आस्था की फांस है।

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