कल 31 अगस्त 2022 के नई दुनिया अखबार में दैनिक जागरण के एसोसिएट एडिटर राजीव सचान का एक आलेख है जिसमें उन्होंने कहा है
एक ऐसा ही आतंकवादी तबरीक हुसैन 21 अगस्त को कश्मीर के नौशेरा क्षेत्र में पकड़ा गया वह अपने साथियों के साथ सीमा पर लगे तार काट रहा था, तभी भारतीय सैनिकों की उस पर नजर पड़ी उन्होंने चेतावनी दी तो तबरीक संग घुसपैठ करने आए आतंकी भागने लगे इस पर हमारे सैनिकों ने गोलियां चलाई जिससे तबरीक घायल हो गया और उसके बाकी साथी भाग गए। उसे कंधे और जांघ पर गोलियां लगी उसका काफी खून भी बह गया था उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां
हमारी सेना के जवानों ने उसे 3 बोतल खून दिया। उसका ब्लड ग्रुप ओ– नेगेटिव था जो कि दुर्लभ माना जाता है उसकी सर्जरी हुई और वह अब खतरे से बाहर है.
तबरीक हुसैन ने बताया कि उसे कश्मीर में आत्मघाती हमले के लिए भेजा गया था और इसके लिए पाकिस्तानी सेना की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने ₹30000 दिए थे …..
यक्ष प्रश्न –
यहां प्रश्न देवतुल्य सैनिकों की मानव जीवन के प्रति अपनी संवेदनशीलता और सद्भावना दिखाने हेतु है ? देश की रक्षा करने के लिए बंदूक हाथ में लिए यह सैनिक और सैन्य अधिकारी किसी भी विपरीत स्थिति तक जा सकने को तैयार होते हैं और निहत्थे दुश्मन के प्राण रक्षा करने के लिए भी ये सैनिक अपना रक्त भी बहा देते हैं.
आश्चर्य होता है इस प्रकार के भारतीय मानस पर जहां लोगों के संस्कार में यह घुट्टी पिलाई गई है कि नर सेवा नारायण सेवा है और उसका हमें नियमित रूप से पालन करना चाहिए. महाकवि तुलसीदास जी रचित हनुमान चालीसा में एक पंक्ति है
राम काज करिबै को आतुर
अर्थात जो काम मेरे हिस्से में आया है मैं उसे राम का काज समझते हुए करने को हमेशा उपलब्ध रहूंगा. कश्मीर के सैनिकों की देश की रक्षा के प्रति समर्पण और आस्था का मापक हम पिछले 30 वर्षों से देखते आए हैं. इसी प्रकार कश्मीर के बाढ़-ग्रस्त होने पर वहां के नागरिकों की प्राण रक्षा के लिए अपनी आहुति देने वाले सैनिकों का दुरूह प्रयास भी अद्वितीय रहा है परंतु दुश्मन के निहत्था होने पर उसकी प्राण रक्षा करने को तैयार ये सैनिक और भारतीय सेना हृदय से एक ऐसा आयाम प्राप्त कर लेती है जो निश्चित रूप से अद्वितीय है जिसका उदाहरण विश्व में कहीं नहीं मिलता होगा। भारतीय सेना के इस मानस को भी सादर नमन है….
परंतु, क्या इतना उदार भाव और सदाशय होने की कीमत समाज भी भुगत रहा है?
प्रश्न और उत्तर दोनों प्रासंगिक हों कदाचित…

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