“आत्मा से मिलने जाता हूं…”
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सोचता नहीं, क्या कुछ होने को,
भोर को मैं जल्दी उठ जाता हूं.
उगते सूरज की लालिमा देखने,
काया भूल, आत्मा से मिलने जाता हूं
आलस को तज, फुर्ती के आगोश में,
भास्कर के सौंदर्य दर्शन को आता हूँ.
पग पग बिखरा पड़ा नैसर्गिक,
नैन औ मन तृप्त करने दौड़ जाता हूँ
श्वेत श्याम रोज, स्वर्णिम कभी,
नीले कभी तो रंगहीन मेघ कभी.
नभ में उकेरी चित्रकला देख,
यूं हृदय से आदित्य को भरमाता हूँ.
बहती हवा का दर्श और दर्शन पा,
झुमाझुम यूं नाचता जाता हूँ.
आगोश में प्रभु के स्वयं को पा,
नित्य प्रति मन ही मन इठलाता हूँ.
कुछ पसीने की बूंदे, और थकान,
ऊर्जा का नया संचार हर कोष में.
भोर के निकट आनंद बिरले,
मुक्ति की राह में कदम बढ़ता हूँ.

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