रेवड़ी का लोक: गूंगे का गुड
रेवड़ी का संसार भारत की अपनी धरोहर है जो भोजन तत्व होने के साथ साथ सत्ता प्राप्ति का मार्ग भी है. रेवड़ी कहने को तो शुष्क प्रकार की शक्कर और तिल की मिठाई है जो अनादिकाल से भोजन में उप-आहार की भान्ति प्रस्तुत होता रहा है. परंतु जब तक यह मिठाई है मूल्यवान है परंतु जैसे ही रेवड़ी बँटने के स्तर पर आती है तो यह अनमोल हो जाती है. रेवड़ी के संबंध में कहीं जाने वाली लोकोक्ति भी रेवड़ी की महत्व और स्वीकार्यता को प्रदर्शित करती हैं जैसे अँधा बांटे रेवड़ी अपने-अपने को दे और क्या रेवड़ी बांट रहे हो? इस लोकोक्ति के बहाने देश के विभिन्न राज्यों में देश की विभिन्न सरकारों के माध्यम से रेवाड़ी बांटे जाने का अनादिकाल से जो संसार स्थापित हुआ है वह न केवल अतुलनीय है बल्कि अविश्वसनीय भी है.
रेवड़ी बांटने का नशा अनमोल है तथा आदतन बाध्यता भी है जो राज-सत्ता की न केवल सुनिश्चित पारी नियत करता है बल्कि रेवड़ी पाने वाले को भी इस नशे से बांधे बिना नहीं रहता है. 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद से रेवड़ियाँ बंटना शुरू हुई है जो जाति एवं धर्म के आधार पर बिना देश की सेहत को ध्यान रखते हुए बांटी जाती रही हैं. यहाँ तक कि आरंभ में 10 साल के लिए दी जाने वाली एक प्रकार की रेवड़ी आज दिनांक तक उसी ताकत से बदस्तूर जारी है. देने वाला भी खुश ओर पाने वाला भी खुश ओर जो दर्शक है वो भी रेवड़ी बंटते देख खुश. आखिर उससे ही तो राजस्व की प्राप्ति कर रेवड़ी का अद्भुत लोक रचा गया है. इसका कारण है कि आम भारतीयों का, कुछ मीठा हो जाये का प्रिय ब्रह्मवाक्य पसंद है जिसे सभी स्वीकार कर लेते हैं.
रेवड़ी बंटने से प्राप्त उन्नति सब होने के बाद भी रेवड़ी आज भी जारी है ओर दशको से भरपूर रेवड़ी प्राप्त करने वाला भी रेवड़ी त्यागने को तैयार नहीं है. रेवड़ी की मीठी मीठी संस्कृति ने आम सुधि मानस के स्वाभिमान को निगल लिया है. इस प्रकार पिछले कुछ समय से रेवड़ी के नए-नए आयाम भी प्रस्तुत हो रहे हैं. पानी के बिल की माफ़ी की रेवड़ी, बिजली बिल माफ़ी की रेवड़ी के साथ साथ डिनर सेट या टीवी ओर लैपटॉप का बंटना भी एक प्रकार की रेवड़ी है.
सुपात्र कुपात्र के पात्रता अधिकार से परे चालाक ओर चतुर सुजान इन रेवड़ी का भरपूर लाभ ले पाते हैं. किसान मजदूर गरीब महिला जैसे पात्र को भी इसी प्रकार की थोड़ी बहुत मिल जाये तो रेवड़ी बांटने का परोपकार सिद्ध हो कदाचित.
रेवड़ी, तिल का बना वह मीठा उत्पाद है हालांकि रेवड़ी का सजीव काल दीवाली के समय से मकर संक्रांति तक हैं परन्तु रेवड़ी बांटने का काल बरस भर चलता है जो सत्ता के जीवित होने का परिचायक भी हो सकता है. रेवड़ी से सत्ता या सत्ता की रेवड़ी का विज्ञान जटिल है परन्तु इस कलियुग में अब अनिवार्य प्रतीत होता है ताकि सत्ता की शक्कर निरंतर प्राप्त होती रहे. यूं तो रेवड़ी तिल से बनी होती है और तिल का ताड़ या पहाड़ बनने में देर नहीं लगती परन्तु रेवड़ी की महिमा अपरम्पार है.
रेवड़ी देने वाले और रेवड़ी लेने वाले दोनों ही इसके मीठेपन के शिकार हैं. रेवड़ी के बंटने से देश की अर्थव्यवस्था पर अंकुश लगे ना लगे, भारत की अर्थव्यवस्था का स्थापित नियम है कि धन राशी प्रचलन में रहे जिसके चलते देश के घरेलू सकल उत्पाद में तेजी से वृद्धि हो और रेवड़ी बांटने से पैदा हुआ पैसा अपनी क्रय शक्ति को बढ़ाते हुए देश की क्रयशक्ति को बढ़ाने में भी सहायक हो. यह रेवड़ी जनित परिदृश्य डरावना भले लगता हो परंतु मीठे आस्तित्व में है तो सही.
रेवड़ी कभी शाही या दरबारी बन ही नहीं पाई। उसे आम लोगों का संग-साथ ही ज़्यादा भाया. लखनऊ में आविष्कृत रेवड़ी आज पुरे देश को पहली पसंद है.
कहने को तो चौपायों के झुंड को भी रेवड़ या रेवड़ी ही कहते हैं। इस तरह रेवड़ी का अर्थ हुआ झुंड या समूह की मिठाई यानी आम लोगों की, ख़ास-ओ-ख़ास की नहीं। यहां यह जानना भी दिलचस्प है कि रेवड़ी, बताशों की तुलना में बांटने में आसान और स्वाद में उनसे कई गुनी बेहतर है. रेवड़ी का नशा अनुपम सता की धरोहर है.

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