कहने को तो इस कथा चित्र का नाम साइकिल है और साइकिल की कथा में बहुत से बहुत क्या हो सकता है ऐसा मनोभाव किसी भी मनुष्य में आ सकता है!
मराठी भाषा में बनी हिंदी सब टाइटल के साथ उपलब्ध नेटफ्लिक्स पर यह फिल्म एक भिन्न और अद्वितीय चित्र प्रस्तुत करता है जो भारत की आजादी के बाद के कालखण्ड का है जब गरीबी अपने चरम पर थी. एक ज्योतिषी ब्राह्मण का उसकी साइकिल के प्रति असीम प्रेम और संरक्षकत्व का भाव कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है जो न केवल आंदोलित करता है बल्कि साइकिल के चोरी हो जाने पर उसकी मनोदशा को इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि द्रवित हुए बिना रहा नहीं जाता है.
साइकिल भली है कि मालिक भला है, इस भाव को साइकिल चुराने वाले दो चोर कुछ इस तरह से प्रस्तुत करते हैं कि निर्देशन के प्रति कृतज्ञता का भव उत्पन्न होता है और आंखों की पोर गीले हुए बिना नहीं रहती है. कथानक भले सीधा-सीधा प्रतीत होता हो जो शुद्धत: ग्रामीण परिवेश का है निश्छल लोगों का है, बड़ा अद्भुत हो आध्यात्मिक भी बन पड़ा है. जब ज्योतिषी केशव जी अपनी दी हुई शिक्षाओं को वे स्वयं की अपनी ओर आते हुए देखते हैं और उसे स्वीकार करते हैं, तब यह कथा चित्र ना जाने क्यों एक आध्यात्मिक गीत की भांति आपके हृदय और मस्तिष्क में न केवल पानी की धार की तरह उतर जाता है बल्कि एक अद्भुत अनुभव की छाप भी छोड़ जाता है.
कथानक पूरी कथा में कहीं भी कमजोर पड़ता नहीं दिखता है जो प्राकृतिक छायांकन के बलबूते पर एक अद्वितीय और अकल्पनीय चित्र प्रस्तुत करता है. आप बस विस्तारित नैनों से इस फिल्म के आगोश में हो बहते चले जाते हैं. अभिनेता ज्योतिषी के चेहरे का भाव जो साइकिल के प्रति अनुग्रह का है, वह नित्य प्रति निशब्द टपकता हुआ दिखाई पड़ता है. वहीं दो चोरों के काम में भी निर्देशक ने समुचित अभिनय करवा लिया है. स्कूल के बच्चे, ज्योतिषी की बच्ची और गांव का परिदृश्य अनमोल और दर्शनीय बन पड़ा है. मराठी भाषा, हम हिंदी भाषियों के लिए लगभग समझ में आने वाली है और योग्य हिंदी सबटाइटल, कथानक पर आपकी पकड़ कमजोर नहीं होने देते हैं. और फ़िल्म का अंतिम दृश्य तो वृहत संदेश वाहक है कि अतिशय आसक्ति, दाग़ लगा देती है

अवश्य देखने योग्य
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