यूं तो रणथंभौर के विश्वप्रसिद्ध किले का राजा जयंत के द्वारा पांचवी सदी में निर्माण करना आरंभ किया गया था परंतु लगभग साढे चार सौ वर्ष तक निर्माण होते-होते वर्ष 944 में राजा हमीर देव सिंह चौहान के पूर्वजों द्वारा इस महल का निर्माण पूर्ण हुआ. राजा हमीर देव सिंह के पूर्व उनके पिता भी 32 वर्षों तक इस क्षेत्र में न केवल एक यशस्वी नायक के रूप में स्थापित रहे बल्कि एक पूर्ण कालजई परंपरा के वाहक भी रहे जिन्होंने राजपूताना परंपरा को स्थापित किया और क्षेत्र के निवासियों के भरण पोषण का दायित्व बखूबी निभाया. राव हम्मीर देव सिंह के द्वारा इसी परिसर में अपने पिता के शासनकाल की याद में ३२ खंभे का एक भवन भी बनाया गया है जो न्याय स्तंभ के नाम से प्रसिद्ध है. विश्व प्रसिद्ध गणेश मंदिर इस क्षेत्र ही नहीं समस्त भारतवासियों के लिए अतुलनीय आस्था का केंद्र है
राजा हमीर देव सिंह चौहान कुल के वंशज हैं जो पृथ्वीराज सिंह चौहान के बाद भारत की सहिष्णु भूमि के राजा हुए. शौर्य और पराक्रम में राजा हमीर देव सिंह अनमोल हैं जिन्हें राजस्थान के प्रसिद्ध क़िले रणथंबोर को सुरक्षा के अंतिम दौर में युद्ध का श्रेय जाता है. चौहान का राज्याभिषेक 1283 ई. में हुआ था। वह राजा जैत्रसिंह और रानी हीरा देवी के पुत्र थे, जो उस समय रणथंभौर के शासक थे।
हमीर देव सिंह चौहान अपनी राजपूती आन बान और शान के न केवल पुरोधा रहे बल्कि विदेशी आक्रांता के रूप में आये प्रथम खिलजियों के विरुद्ध हुए प्रथम युद्ध के विजेता भी रहे. सनातनी और क्षत्रिय परंपरा के अद्वितीय वाहक ये वीर अपनी प्रतिज्ञा के पालन के चलते जीवन परिवार और राजत्व गवाँ दिये जिसका कोई उदाहरण कहीं और नहीं मिलता है. ख़िलजी के गुजरात लूट को ले जाते समय कतिपय सरदारों में लूट के हिस्सा बँटवारे में विवाद के चलते २ सरदार राजा हम्मीर देव सिंह की शरण में आ गये जिनकी रक्षा की प्रतिज्ञा ने अलाउद्दीन ख़िलजी को उत्तेजित कर दिया और १३०१ में १० जुलाई को राजा बलिदानी हुए.
कतिपय गद्दार साथियों के कारण हमीर देव का पराक्रम फीका पड़ गया और सत्ता के लोभी परिजनों से विश्वासघात मिलने से उन्हें आत्महत्या करना पड़ी अन्यथा अलाउद्दीन खिलजी जो युद्ध क्षेत्र छोड़कर भाग गया था, को इस क्षेत्र में न केवल जगह मिलती बल्कि यदि हमीर देव सिंह जीवित रहते तो चित्तौड़ का इतना भयावह नई जौहर भी ना हुआ होता.
आश्चर्य की बात यह है कि चित्तौड़ गढ़ की रानियों के चर्चित जौहर के भी पूर्व एक अन्य जौहर की प्रथम युक्ति रणथंभोर में ख़िलजी सल्तनत के भय से ही हुई. जब इस बात का भय हुआ कि ख़िलजी के नर पिशाच मृत देह का भी अपमान करने से नहीं चूकते तो आत्मदाह के रूप में जौहर का निश्चय किया गया था. राजा हमीर देव सिंह के परिवार की नारियों ने जौहर किया तो उनकी अविवाहित बेटियों ने क़िले के भीतर स्थित जल कुंड में जल समाधि लेकर न केवल प्राणोत्सर्ग किया बल्कि शरीर भी नष्ट किया.
इस क़िले की रचना देखने योग्य है जो आज से लगभग डेढ़ हज़ार बरस पूर्व के अभियांत्रिकी कौशल से चमत्कृत तो करती ही है बल्कि उस काल के लोगों की शारीरिक क्षमताओं के प्रति भी आश्चर्य से भर देती है. इस मशीनी युग में जब विशाल भवनों के निर्माण में बरसों लग जाते है तो इस 100 हेक्टेयर से भी अधिक क्षेत्र में बने इस अविजित योग्य क़िले की रचना तो बस देखते बनती है.
भूतल से ७०० फीट ऊँचाई पर इलाक़े के सिरमौर जैसा दमकता ये अनमोल धरोहर दर्शनीय है, विस्मित करती है और आपके पूर्वजों के प्रति एक विचित्र श्रद्धा का भाव उत्पन्न करती है कि शारीरिक बौद्धिक सामरिक और वास्तविक शक्तियों की एक विस्मित करने वाली छवि प्रस्तुत भी करती है.
भारत के सबसे बड़े और पश्चिम में स्थित राज्य राजस्थान के सवाई माधोपुर ज़िले में यह संपदा किसी कोहिनूर हीरे की भाँति पंद्रह मील की दूरी से भी दमकती है जो अपने दर्शन के आकर्षण मोह से छूटने नहीं देती है. यह क़िला यूनेस्को विरासत घोषित है और 1722 स्क्वायर किलोमीटर में फैले रणथंभोर राष्ट्रीय उद्यान में अवस्थित है.
भारत के सनातनियों के लिए रणथंभोर इस क़िले में त्रिनेत्र गणेश जी के मंदिर की स्थापना है भारतीय परिवारों में विवाह के हर उपलक्ष में प्रथम आमंत्रण पत्रिका प्राप्त करते हैं. चतुर्थी और प्रत्येक बुधवार को स्थानीय नागरिकों की बड़ी संख्या प्रभु गणेश जी के दर्शन को उपस्थित होते हैं. यह एकमात्र मंदिर है विश्व में जहां त्रि नेत्र धारी गणेश जी का विग्रह है. दर्शन करने मात्र से एक विचित्र सी शांति ह्रदय और मन में आ जाती है



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