Jovial Jungle

रणथम्भौर का जंगल-

जंगल अपने आप में एक पूर्ण इकाई होकर न केवल पृथ्वी की अनमोल संपदा है बल्कि मानव जाति और समाज के लिए भी अमूल्य धरोहर है. जंगल से वनों उपज के साथ-साथ प्राणवायु भी 12 महीने प्राप्त होती हैं और यदि अवकाश काल में जंगल की यात्रा हो और जंगल की अनुपम अलौकिक अद्भुत प्राकृतिक कालातीतों संपत्ति का दर्शन ना हो तो जंगल जाना लगभग निरर्थक है. जंगल केवल पहाड़ घाटी नदी पत्थर की परिभाषा नहीं है बल्कि छोटे-बड़े पौधों झाड़ियां वृक्षों की ऐसी धात्विक धरोहर है जो मनमोहना होने के साथ-साथ मानस को यह सोचने पर विवश करती है की है प्रभु इस देवालय की रचना आपने कैसे की होगी ?


जंगल की संपदा में जहां दीमक की बाँबिया भी दिखाई पड़ती हैं जो मरे हुए वृक्षों की लकड़ी के सेवन से स्वच्छता बनाए रखने का कार्य करती हैं बल्कि पक्षियों को रहने का स्थान देकर एक पर्यावरणीय संतुष्टि तथा संपूर्णता को उपलब्ध कराती है. बिना किसी निश्चित विन्यास के यत्र तत्र सर्वत्र सजा के बिखरा सा जंगल का सौंदर्य नैनसुख के साथ मन की शांति को भी उपलब्ध होता जाता है.

इसी प्रकार के एक जंगल रणथंबोर में फरवरी के माह में जाने का सहयोग हुआ जहां सुबह 6:30 से आरंभ होने वाली सफारी में 20 सदस्यों को पर्यटकों को बिठाकर ले चलने वाली कैंटर वाहन में उगते सूर्य के साथ जंगल का भ्रमण एक अविस्मरणीय अनुभव रहा.


सवाई माधोपुर से 7 किलोमीटर उत्तर में स्थित रणथंभौर अभ्यारण राष्ट्रीय उद्यान है जहां विभिन्न प्रकार के जीव जंतुओं के साथ जंगल की मूल अवधारणा शुद्ध वायु, बड़े लंबे पेड़, झाड़ियां और ज़मीनी जीव-जंतुओं के साथ आकाश में उड़नशील सुन्दर पक्षियों के भी दर्शन हो जाते हैं. बाघ और हिरन जैसे आपस में बैरी जंतुओं का सहजीवन से साक्षात्कार भी किया जा सकता है. इस अभ्यारण में 1760 स्क्वायर किलोमीटर में फैले इस अभयारण्य के मार्गो के द्वारा अधिसूचित 10 मार्गो से पर्यटक दिन भर के दो-तीन घंटे की जंगल सफारी यात्रा के साथ जंगल के अवयवों और जंगली जानवरों का दर्शन कर सकते हैं. इतने बड़े जंगल का मात्र 20% ही पर्यटकों के लिए आवागमन के लिए खुला है तथा 80% क्षेत्र शुद्ध रूप से जंगल को स्वयं विकसित होने के लिए शासन की योजनाओं के तहत छोड़ दिया गया है.

वैसे तो पर्यटकों के लिए जंगल के राजा या ने बाग को देखने का बड़ा लोभ रहता है जो अपनी काली और पीली पट्टियों की त्वचा के सौंदर्य के अतिरिक्त अपनी भोजन की क्रूर शैली के चलते गुंडा तत्व होते हुए भी राजा का स्थान पा गया है.

सनातनी अवधारणा के चलते बाघ को मां दुर्गा की सवारी होने का सौभाग्य प्राप्त है परंतु जंगल के इस राजा रूपी गुंडा जीव का कार्य जंगल की पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने का है जो कार्य इस जंगल के लगभग 3 हजार स्पॉटेड डीयर याने चीतल वहां की घास व वन उपज को खाकर एकत्र करते हैं. यह जंगल का राजा अपनी क्रूर एवं आसुरी शक्तियों के चलते उदरस्त कर लेता है और इकोसिस्टम को संतुलित बनाए रखने का कार्य करता है

इस यात्रा में जंगल के दर्शन होने के साथ-साथ एक किले का दर्शन भी होता है जो लगभग डेढ़ हजार वर्ष पुराना है और आज भी उसी शान से सीना तान पहाड़ों की चोटियों पर खड़ा है जो जंगल का अमूल्य हिस्सा भी है.

यदि आप सिर्फ बाघ के दर्शन हेतु जंगल की यात्रा के हामी हैं तो जंगल का पक्षियों में एवं अन्य जीव जंतुओं में जो सौंदर्य निहित है वह कहीं खो जाएगा या आप में उत्साह नहीं जग पाएगा परंतु जंगल में आपका प्रवेश से यदि गरुड़, चील, किंगफिशर तथा ब्राह्मणी मैना जैसी चिड़ियों की आवाज, चिड़ियों के बैठने-उड़ने के दर्शन प्रसंग से आपको स्वयं को पुरस्कृत करने को हर्ष होता है तो जंगल की यात्रा ने नि:संदेह आपके मानस की दृष्टि को जाग्रत कर दिया है. कच्ची सड़कों पर चारों तरफ निगाहें घूमते हुए जब आप इस जंगल के अद्भुत अवलोकन को आत्मसात करते हैं तो प्रतीति अद्भुत होती है.

तो आपका हृदय प्रफुल्लित हो आपकी मस्तिष्क को इस बात के लिए इंगित करता है की प्रकृति की लीला इस माया लोक से भिन्न है और माया लोग छोड़ जंगल को कभी-कभी जीना भी एक सनातनी परंपरा करना केवल वॉक है बल्कि उसकी रक्षा करना भी कर्तव्य है

Ranthambore Fort

Leave a comment

Blog at WordPress.com.

Up ↑