द्रष्टा देवांश….
द्रश्य है देवज्ञ, पदार्थ
दिशा दश ओर.
देशांतर में भी दिव्य दिखे
द्रश्य सदा दर्शनीय.
द्रष्टि, दीप्ति दर्श को,
दिगपाल दैदीप्य
दीपक द्रष्टि दोष नहीं,
द्रष्टि देवता तुल्य.
द्रष्टा देवांश है,
देखने को दहके.
दिशाहीन हो द्रश्य प्रपंच,
द्रष्टा दीपो भवः.
देवांश के दिग्दर्शन,
दुर्धुशु ददाति दर्शनं.
दधीची दीन्हे तन,
तो दैदीप्य हुए दिव्यं.
द्रष्टि दोष का दर्प,
दरख़्त सा देहाभिमान.
दुनिया दुखियारी देखि,
दान भी दंडाभिमान.
दुःख दया द्वैत,
दंडकारण्य में दर्शन.
दण्ड- दान दोनों,
देह्धारे को अर्पण.
दाना दाना द्रौपदी,
दक्ष दीपो भवः.
देहधारी अद्वितीय,
द्रश्यमान अदृश्य.
देव दानव का द्वन्द,
अंतर्द्वंद है देखा देखि.
दक्ष का दम चिरंतन,
दिव्या दलन दो घडी….

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