जूना मित्र
कह दिया धडाक से, मेरी सीमाएं हैं
ज्वार फटा, दिखी तल्ख भावनाएं हैं
जैसे मैं मित्र नहीं दशानन हूं
सब कुछ, से हुआ, कुछ नहीं मैं
वर्षों का याराना दरका पल भर में
आंसू ह्रदय से बरसा यूं प्रति क्षण में
जैसे रिश्ते में श्राप लग गया
जान ना पाए यूं कांच लग गया.
मन को समझाया, मित्र मजबूर हैं
मित्र है तो क्या टूटना ही दस्तूर है
मन उलझा जैसे अमरबेल है
मित्रता का क्या यही खेल है.
भला ही है यह मित्र जो कहे,
हौले से कि मेरी सीमाएं हैं
अन्यथा कह देता अपनी सीमा में रहो,
मेरा तो सदा के लिये हृदय विदीर्ण होता
जो भी है जैसा भी है,
मेरा जूना मित्र ही तो है.

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