पूर्णतया रिक्त या रिक्तता की पूर्णता-
रिक्तता, शून्यता या निर्वात या खालीपन, एक अजब स्थित है जो मानव के शरीर, मन, भाव को प्रभावित कर देती है.
नकारात्मक या सकारात्मक ?
खालीपन का भाव, समय की जल जैसी धार के विरुद्ध द्रष्टा का विचार जैसा हो सकता है जो मात्र समय को बहते हुए या बीतते हुए देख रहा है. रिक्तता एक विशेष आभूषण है जो मात्र निर्वात का स्थान नहीं है.
रिक्तता एक निर्मल अवस्था है या मात्र एक स्थिति है कहना जटिल है.
रिक्तता भावाभिमान है या आत्मातीरेक अभिव्यक्ति. ?
आत्मज्ञान है या अल्प ज्ञान ?
ख़ालीपन आभासी है या वास्तविक ?
शून्यता कर्म है या अकर्म या विकर्म ?
निर्वात वीर्य प्रतीक है या अपौरुषेय ?
रिक्तता का भाव अनमोल है या जटिल ?
ख़ालीपन मौन है या शोर ?
रिक्तता अकर्मण्य है या आलस्य प्रतीक ?
कुछ रिक्त हो या कुछ अरिक्त, शारीरिक रिक्तता का मूल स्थान आमाशय है. !
तो विचार, भाव, संवेदना, सद्भावना का रिक्तता का मूल स्थान मस्तिष्क भी है. !
पेट की भूख़ अथवा या मस्तिष्क की भूख एक दूसरे से नितांत भिन्न हैं. माया के इस लोक में रिक्तता और पूर्णता के पर्याय हैं भोजन या ऊर्जा का स्रोत जो आमाशय के माध्यम से शरीर को ऊर्जा से भर दें.
रिक्तता की मस्तिष्क की अवधारणा में विवेक, विचार, भाव, संवेदना या सद्भावना से मानस में रिक्तता हो तो मानव मन मूरख अथवा स्वार्थी या दुष्ट श्रेणी का वाहक हो.
वहीं भूखे पेट की अवस्था रिक्तता की परम अवस्था है जो भारसाधक को अन्याय और अपराध में धकेल सकती है अथवा ऐसी रिक्तता मजदूर या लोभी पैदा कर सकती है. और जिसने भूख को साध लिया तो यह रिक्तता, बुद्ध और कबीर भी उत्पन्न कर सकती है.
आश्चर्यजनक सत्य है कि यदि पेट खाली और आत्मा रिक्त हो तो मानस, मजदूर की भांति जीवन भर आम व्यक्ति के रूप में यापन में उलझा ही रह जाता है. आमाशय यानी पेट और मस्तिष्क के दो छोर ना मिल पाए तो व्यक्ति कहीं नहीं पहुंच पाता है
द्वितीय अवस्था में रिक्तता का प्रयोग अनुपम है. जब पेट तो खाली होकर, व्यक्ति आत्मा से पूर्ण हो संपूर्ण हो अर्थात पेट खाली आत्मा भरी हो तो वह जीवन सामाजिक रूप से सफल है. ऐसा जीवन कबीर, रैदास, सूरदास, रसखान और तुलसीदास ने जिया और अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है
एक अन्य अवस्था में लोभी एवं असंतोषी मानस रिक्तता के माहात्म्य के वशीभूत हो मात्र पेट भरे होने के हामी होते हैं. छल, कपट, घृणा और विद्वेष से पीड़ित यह मानस प्रचुरता से माया के वशीभूत हो मछली के कांटे की भांति बींधे रहते हैं. आत्मा के भाव से रिक्त, ये पलायनवादी धनवान को प्रकृति की लीला इन्हें इस लोक को भोगने का सार्थक जीवन तो उपलब्ध करा देती है परंतु आत्मा का रिक्त भाव कष्टदायक ही है जो कदाचित कलयुग का देवता के है.
अंतिम अवस्था में जब पेट भरा हो और आत्मा भी पूर्णता के भाव से पूर्ण हो तो साधु भाव का अनुपम साधु मन उत्पन्न होता है जिसके वाहक गुरु, भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं.
मर्यादा पुरुषोत्तम राम, श्रीकृष्ण, भगवान बुद्ध इस चतुर्थ अवस्था के वाहक है.
कहने को तो रिक्तता एक अस्थाई भाव है तथा पूर्णता स्थाई भाव है परंतु मानव मन में किसी विशेष हेतु से कोई टिकता या पूर्णता का भाव पूर्ण हो जाए तो आश्चर्य ना हो. ऊर्ज़ा का संवहन जब जहां हो जाये चाहे रिक्तता का मानस हो या पूर्णता मानस.
उसी प्रकार कोई मानस किसी विशेष हेतु के लिए रिक्त हो जाए अर्थात कोई मन, रिक्तता तथा पूर्णता के भाव पर व्यक्तित्व का आम-भाव, साधु-भाव, धनी भाव अथवा संतत्व की उच्च श्रेणी का भाव कुछ इस प्रकार पारगमन करते हुए भ्रमण कर सकता है जो मुक्ति को दृढ़ संकल्पित हो वह रिक्तता एवं त्याग का वह संजोग बना दे .
ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते,
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते।
वह जो दिखाई नहीं देता है,
वह अनंत और पूर्ण है।
यह दृश्यमान जगत भी अनंत है।
उस अनंत से विश्व बहिर्गत हुआ।
यह अनंत विश्व उस अनंत से बहिर्गत होने पर भी अनंत ही रह गया।


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