Begging, An Art Science & Psychology

भीख माँगना कला भी विज्ञान भी मनोविज्ञान भी

व्यक्ति के स्तर से लेकर देश के स्तर तक भीख मांगने का उद्योग अनादि काल से प्रचलन में है जो बिना आरक्षण हर वर्ण, जाति, रंग के नागरिकों द्वारा देश की सीमा से परे हर मानस का एक अनमोल हिस्सा है जो यदा कदा एन केन प्रकारेण प्रदर्शित भी होता रहता है. यह एक ऐसी विधा है जो कला और विज्ञान का घालमेल है जहां मांगने की कला और प्रस्तुति क विज्ञान से भीख का कटोरा चंद सिक्कों से या मिलियन डॉलर से भर जाता है.

भीख मांगने का सॉफ्टवेयर भले ही चुनिंदा में होता हो परंतु यह सॉफ्टवेयर हर व्यक्ति में होता जरूर है. कहते हैं ना, कि जैसा माथा वैसा तिलक याने चौड़ा माथा बड़ा तिलक और छोटा माथा छोटा तिलक. मंदिर के दरवाजे पर बैठे भिखारी भी भक्तों के दर्शन पाते ही भक्त से भीख मांगने का उपक्रम करते करते तुच्छ दानदाता भक्त को भगवान सिद्ध करने का प्रयास कर ही लेते हैं. भिखारी की जो मांग दुआओं से आरंभ होती है, वह भीख न मिलने पर बददुआ में कब बदल जाती है आपको पता भी नहीं चलेगा इतना तेज विज्ञान है भीख का.

भीख का दान लगभग छीना हुआ ही है जो दया की भावना के ब्लकमैल से प्रवत्त ह उत्पन्न होता है . विस्तार से समझे तो कई देश अपनी गरीबी को भी बेच पाने में सफल हो जाते हैं. देश भी अपने गरीब नागरिकों के फटेहाल प्रदर्शन के साथ साथ अपने देश के फटेहाल आँकड़े याने जीडीपी आदि को कुछ प्रकार मार्केट करते हैं कि वे प्रयाप्त भीख पाने के पात्र हो जाते हैं. भीख की इस जबरदस्त व्यावसायिक कला के धनी साधक देश भी दान या कर्ज का पैसा भी बड़ी मात्र में कमाकर चोरी कर अपने घर ले जा चुके होते हैं.

वर्ल्ड बैंक, ए डी बी, आई एम एफ आदि कैश-रिच संस्थान लोन देने का हाथ बढते हैं और वह कब भीख बन कर बैड-लोन बन जाये सबको पता होता है.

भीख का सबसे बड़ा सुख यह है कि पाने वाला सोचता है कि एक और को भोंदू बनाया और देने वाला सोचता है कि आज मैं भगवान बन गया हूँ. मंदिर के सामने उपस्थित भिखारी और देव-दर्शन को उपस्थित हुये भक्त दोनो ही जानते हैं कि वे दोनो ही भीख मांगने उपस्थित हुए हैं बस दोनो के आंकड़े में अन्तर है.

वैसे तो भीख परोपकार के श्रेणी का उत्तम प्रकार है परंतु यह परोपकार एक कारक तत्व भी बन जाता है परजीवी बने रहने का. कहावत है कि जो अपने काम का आनन्द लेते है वे भीख भी दे सकते हैं और जो अपने काम को बेगार समझते हैं वे भीख पर आश्रित हो जाते हैं चाहे वह काम की भीख हो या सहायता की!

प्रश्न बड़ा है कि भीख दी भी जाए कि न दी जाये! कौन पात्र है, कौन अपात्र ? बूढ़ी स्त्री पात्र हैं परंतु जवान पुरुष संशय में ला देते हैं और भीख मांगते बच्चे यह शंका उत्पन्न कर देते हैं कि ये कहीं किसी बच्चा गिरोह के पीड़ित सदस्य तो नहीं! ऐसा नहीं है कि सडकों के चौराहे ही भीख मांगने के अड्डे हैं. बैंक, बैंकिंग कोर्पोरेशन, धन्ना सेठ और धनी देश भी इस परोपकारी भीख के शिकार होते हैं और इस भीख से माध्यम से न केवल अपनी साख बनाते हैं बल्कि कहीं अपने दिल में बची इच्छा को पल्लवित करते हैं कि मैं ईश्वर हुँ या ईश्वर नहीं तो ईश्वर तुल्य हूँ.

ऐसा इसलिए कि देने वाला हाथ तो कठिनाई से ही खुलता है जो दंभ और गर्व से भीख दाता को आल्हादित तो कर ही देता है. वहीं भीख लेने वाला हाथ तो सदैव मांग के विरुद्ध कुछ पाने को तत्पर ही रहेगा.

भीख के स्थापित स्थल को चिन्हित करें तो धार्मिक स्थलों के साथ साथ विकसित और अमीर देश भी भीख देने को आतुर दिखते हैं जिससे वे अपने राजनैतिक हितसाध भी लेते हैं और मांगने वाले देश की प्राकृतिक या व्यवसायिक सम्पदा जैसे तेल, सामरिक पोर्ट आदि पर कब्जा पा लेते है जो भीखदाता के अद्भुत सॉफ्टवेयर का ही एक अद्भूत बाई-प्रोडक्ट है.

भीख का विज्ञान विचित्र है जो एक समय तक दया के भाव से दी जाती है और दया से ही मांगी या ली जाती है. भीख देने वाले को भीख देने की लत लग जाये जाये तो जो आत्मा को आनन्दतीरेक अनुभूति होती है वह अविश्वसनीय है. वहीं निरन्तर भीख लेते लेते एक समयोपरांत अधिकार बनने का योग उत्पन्न हो जाता है. भीख को उत्तेजना देने वाला बटन है, दया जिसके हिट करते ही हाथों से मुद्रा राक्षस छूट जाता है

दया, गरीबी, परजीवी मानस और लत या अधिकार के विचित्र घालमेल में भीख समाज की लगभग अनिवार्य व्यवस्था है जो भावना और मजबूरी का अजीब उत्पाद है. भीख की परिभाषा में कुलीन और अभिजात्य वर्ग इसे लोन, सहायता, उधार, सब्सिडी या नगद सन्व्यवहार का नाम भी देता है. ये नगद का व्यवहार कब भीखनुमा झपट्टे में बदल जाता है भीखदाता को पता भी नहीं चलता है. अमेरिका जैसे देश उक्रेन को मदद या लोन के नाम से भीख ही देते हैं जो कभी वापस नहीं होना है. इसी प्रकार भूकम्प सुनामी या अन्य प्राकृतिक आपदा में दी जाने वाली राज सहायता, भीख का एक परिष्कृत रूप हो सकती है.

लूट और भीख में जो अन्तर समझ आता है वह है दया और दबन्गई का. दबंगई किसी की जांघ पर घुटना रख रकम छीन लेना है तो भीख सीधे मस्तिष्क पर आघात है. भीख और भिक्षा में अन्तर भी है जो सनातन परंपरा का ध्योतक है. सन्तत्व की भावना और संभावना से ओतप्रोत होकर भिक्षा सन्तोष और दया से का प्रतिफल है जबकी भीख इस कलियुग में लगभग जबरिया शुल्क है कि दे दे भीख अन्यथा होगी लूट.

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