Ashram

आश्रम का संस्कार और कलियुग में विहार:

बचपन से आश्रम संबंधी सनातनी धर्म धारणा का श्रवण करते हुए आश्रम व्यवस्था का पूर्ण विवरण इस कलयुग में कैसे बीत जाता है समझना जटिल है. आश्रम व्यवस्था के विभिन्न सोपान की बगिया छात्र जीवन, वैवाहिक जीवन और पश्चात निवृत्ति तथा त्याग के क्रम हैं जो क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थाश्रम और सन्यास आश्रम को परिभाषित करये हैं. परंतु जीवन के आपाधापी में इसे किसी भी स्त्री या पुरुष के लिए पालन कर लेना कलयुग के इस दौर में लगभग असंभव प्रतीत होता है.

आश्रम व्यवस्था के प्रथम चरण में विभिन्न विषयों की शिक्षा ग्रहण तथा ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है जिसके चलते विभिन्न शैक्षणिक आयाम को पूर्ण करते हुए एक सफल जीवन की आधारशिला को स्थान दिया जाता है. इस आधुनिक दौर में ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत यौन संबंधों के प्रति भौतिक या अभौतिक अनिवार्य दूरी बनाए रखने का भी पालन करना होता है. अब कलयुग के इस दौर में जब सोशल मीडिया की पहुंच आसमान लोक और पाताल लोक तक बराबर है तो युवा होते बालकों के लिये यह बाल्याश्रम में ब्रह्मचर्य का पालन कितना संभव है आप स्वयं समझ सकते हैं.

गृहस्थ या वैवाहिक जीवन का द्वितीय आश्रम परिवार के धर्म पालन का प्रतीक है जो साधारण भाषा में कहें तो भोगी अवस्था है जिसमें भौतिक, सामाजिक, भावनात्मक, आर्थिक, रोजगारिक, राजनीतिक तथा यौन संबंधी अवस्थाओं का भोग किया जाता है. कमोबेश यह अवस्था पुरुषार्थ की है जहां बौद्धिक कौशल से भौतिक उत्पादन और संस्कृति संवर्धन का आयाम प्रदर्शित होता है जो न केवल लोभ, घृणा, मदमोह इत्यादि के मायावी आवरण में इस मानव जीवन को जकड़ लेता है. साथ ही इस भोग अवस्था से कोई छूटने न पाए इन परिस्थितियों भी उपस्थित करने में सहायक होता है.

गृहस्थ आश्रम न केवल चार पुरुषार्थ याने धर्म, अर्थ , काम और मोक्ष को दिशा देने में सहायक होता है बल्कि इन्हीं चार पुरुषार्थों के माध्यम से भ्रष्ट होने में भी सहायक होता है. यहां धर्म का अर्थ सही कार्य करने से है यदि यही विचलित हो जाए तो गृहस्थ आश्रम की परिभाषा विकृत हो जाए.
गर्भस्थ आश्रम की भोगी अवस्था एक खिलाड़ी की भांति है जहां भोग भी है योग भी है और रोग भी है.

आश्रम की संस्था का तृतीय चरण निवृत्ति का चरण है जहां अभ्यर्थी मानव, सलाहकार की श्रेणी में उपस्थित होता है और अपने सारे नैतिक भौतिक दायित्वों को अपनी संततियों को सौंपने का उपक्रम करता है जो परिवार, व्यवसाय और कार्यालय सभी स्थानों पर होती है . यह अवस्था शनै शनै, भौतिक लोभ – मोह विशेष से पलायन की है. जहां गृहस्थ आश्रम में अर्थ एवं कम के संचित सत्कर्मों से पलायन कर मोक्ष की ओर प्रस्थान करना होता है. यह अवस्था खेल के कोच की भांति है जहां इस आश्रम का अनुयायी अपने से कनिष्ठों के गृहस्थ आश्रम अथवा शिक्षार्थी को प्रशिक्षित करने के दायित्व संपन्न करता है यह समय निवृत्ति का आयाम है जो वानप्रस्थ आश्रम भी कहलाता है.

अंतिम आश्रम है संन्यास, जहां भौतिक सामाजिक आध्यात्मिक जीवन का परित्याग कर अर्थ – काम जैसे मायावी आयाम का पूर्ण परित्याग कर अरुचि का भाव उत्पन्न किया जाता है तथा जिससे सन्यास उत्पन्न हो जो न केवल मानव की आकांक्षाओं को शून्य स्तर पर ले जाने का प्रयास हो बल्कि शरीर को भी धीरे-धीरे शून्य स्तर पर ले जाने के लिए तैयार करने की अवस्था हो.

जटिल है न

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