Song of Stone

पत्थर
कौड़िया बिखरी पड़ी है, नीले नभ के नीचे
समंदर बीत रहा है, हम रहे सदा नेत्र मींचे.

कहने को पत्थर अनमोल, रितु स्नान को आतुर
मंदिर रहें तो पूजे जाएं, नहीं तो बने रहे निष्ठुर

राह पड़े तो रोड़ा कहलाए, इंसान भी ठुकराए, एक स्थान को टिक जाएं, तो पाषाण भी पूजा जाए

शिला धरा की धाती है, नदी का बिस्तर बनती
ओट शिला की प्राण बचाती, कभी हथियार बनती

पाहन कभी ओला हो कभी पथ पर बिछ जाते
कभी उपल कहते तो कभी इंद्रोपल कहलाते

दृश्य यह सुंदर बना जल के मध्य पत्थर
दृष्टि दृश्य दृष्टा समझे क्यों कहे संगदिल अक्सर

गोल आड़े टेढ़े मनोरम सूखे गीले अकड़े
जीवन इनमें जाना नहीं नाम इनका धरती पकड़े

पत्थर घास में उगते, जल में रहते सुशोभित
चिकने भद्दे अपने स्वरूप से रहे नहीं आहत

युगों युगों से पाषाण, परिवर्तन के हामी
कभी धूल मिट्टी तो कभी लावा के अनुगामी

पहाड़ पाहुणे स्थिर सदा गोल पृथ्वी के गोला
रक्षा करते शरण देते पल में माशा पल में तोला

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