
चिड़ा चिड़ी
सोचा कभी , गाँव की गौरेया, शहर आके धरोहर हो गयी….
सोचा क्यों नहीं, गाँव की बहुलता, शहर में नगण्य हो गयी…
सोचा मैंने, गाँव गाँव में पलने फलने वाली घरेलु चिरेया….
देखते देखते विकास की अद्भुत, सप्रेम शहीदी भेंट हो गयी….
कभी थी ये, सर्दी गर्मी में घर दालान की रोचक रौनक…..
नैनसुख की हामी, उर्जा पुंज, निगाहों से ओझल हो गयी…
सोचा, चिरेय्या खा खा के भी कभी मोटी क्यों नहीं होती
न शांत बैठती , टहनी टहनी चहकती जाती कोने कोने…
सच में, ये कैसी धड़कन है खेत-खलिहान की, किसान की..
लचीला एकहरा शरीर लिए, परागण के महती काम की….
जमा कुछ न करती, इश्वर का अनुराग करती फुदकती….
वीतराग पर नृत्य करती संगीत का राग बेराग छेडती… ..
देखा मैंने, चौकस चिरेय्या , आकाशी शत्रु से बचती फिरती …
थोडा भोजन, छोटी उड़ान, अति ख़ुशी से उड़ती फिरती…
छोटा घोंसला बना, अंडे दे, छोटा परिवार अपना सजा लेती …
चिचियाते बच्चों को दाना खिला, यूं उडा लेती ये चिरैया…
भोर होते प्रकट हो सबको राग सुना जगा लेती ये चिरैया…
सोचा कभी तुमने , रात होते कहाँ जाती सोने को ये चिरैया….
और दिन भर खेतों में कराती परागण, बीज बना जाती ये चिरैया…
थोड़े बीज खाकर, कैसे लाभ करा जाती ये मायावी चिरैया .
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