छोटे होते परिवार और शिथिल होती संस्कार की भावनाए एक परिवार की पहचान तो बन ही रही है लेकिन उन्नति के सुनहरे पथ पर न केवल परिवार की अवधारणा की क्षति हो रही है बल्कि संस्कार भी नेपथ्य में अपने आप स्थान प्राप्त कर रहे हैं.
यदि संस्कार शिक्षा और पालन पोषण के चलते परिवार और कैरियर की प्रगति के संबंध में पारिवारिक विवाद, कचहरी तक पहुँच जाए तो एक दुरूह स्थिति का न केवल सामना करना होता है बल्कि दु खद परिस्थिति भी बन जाती है.
कुछ ऐसा ही एक चलचित्र शास्त्री विरुद्ध शास्त्री में देखने का अनुभव हुआ जिसमें एक ज़ोरदार कथानक के साथ मूर्धन्य कलाकार परेश रावल ने सत्तर वर्षीय दादा का पात्र बख़ूबी निभाया है. साथ ही अपने पोते में संस्कृति और संस्कार को सहेजने का जो श्रम किया है वह अद्वितीय है. परिवार को जोड़े रखने में एक भिन्न चित्र प्रस्तुत करता है.
कलयुग के इस दौर में परिवार निरंतर रूप से छोटे होते जा रहे हैं. माता पिता दोनों की व्यावसायिक दुविधा के चलते नई पौध का संस्कारित उद्भव का ही हास हुआ जाता है. जिस घर में दादा दादी के वटवृक्ष की छाँव में पोते पोती का पालन पोषण होता है वे जीवन के नैतिक मूल्यों और संस्कारित व्यवहार निश्चित रूप से भविष्य में शुद्ध वाहक भी होते हैं और इसी का प्रदर्शन इस चलचित्र में स्पष्ट हुआ है.
कोर्टरूम ड्रामा का दुखद चित्रण कहीं भोजन में कंकड़ की भाँति चुभता ज़रूर है परंतु सुखांत तक पहुँचते पहुँचते इस चलचित्र का स्वाद अनुपम पड़ता है
देखने योग्य ✔️

Fast Food: Dangerous Affair
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