चाह चहेती…अजन्मे की ….
मानव जन्म को मैं सज्ज हूँ,
उस मृत्युलोक में जीने को
भले श्रमसाध्य तुम बनाना,
पर मेहनत का रस देना.
कष्ट भले भाग्य में लिखना,
नैतिक बल की भेंट दे ना.
भूख भले पूरी न मिटाना,
पर रोटी तुम चैन की देना.
फल की आस करूँ, मैं भले अति,
परिणाम में सहमति देना.
जीवन समर है, अनन्त काल से,
तनिक हिम्मत भी देना.
धैर्य से पालन करते जाऊं,
मन ऐसा मलंग कर देना.
रस और रास भर लूँगा,
तुम बस विवेक ज्ञान देना.
मानव जन्म ही त्वरा से भरा,
ऐसा सेवा भाव भी देना.
मेरा-तेरा का विष न भरना,
सब, तेरा का अमृत देना.
कण कण क्षण क्षण अनमोल
प्रभुलीला है, ये भाव देना.
भेद समझें सरल जटिल का,,
मन ऐसा निर्मल कर देना.
मन बुद्धि चित्त और अहंकार,
को लगाम कसने का बल देना.
पञ्च तत्व के काम आऊँ ऐसे,
उर्जा का वो समागम देना.
द्रश्य का श्रवण करूँ
और गुंजन का द्रश्य देना.
मैं, को यूं तज दूँ कि,
ऐसी दिव्य यात्रा ही देना.
रंग राग की माया बिखरी है,
न भूलूं तुम्हें, ज्ञान देना.
प्रकृति में हो जाऊं मैं एकसार ,
पुकार यही मेरी बार बार.
भय क्रोध घ्रणा का संसार,
मुझे मुस्काने का अधिकार देना.
आने जाने का यह मृत्यु लोक है,
यात्रा का हेतु, समझने देना.
देना देना की रट लगायी है,
भक्ति सेवा प्रेम भी देना.
मुक्ति की हमारी चाह चहेती,
पुकार सुन छोड़ न देना.

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