समंदर का खाली हो जाना…
कहते खारा पानी बड़ा शीतल होता है,
समंदर कभी भी मीठा नहीं होता है .
जलराशि अथाह और प्रेम कुछ नहीं,
अहंकार से सबको परे धकेलते रहना है.
लहरों की शान, नभ जैसे पसरी पड़ी है,
पीने को पानी भी नहीं, भंडार भरे हैं.
फिर भी शांत मन, सूरज के आगे अर्पित है,
खारे को मीठा पानी बनाने को समर्पित है.
ये समंदर, बैरी नहीं तो मित्र भी नहीं,
प्यासे की भांति नदी को पीता जाता है.
सोचते सब ये प्यार है या अश्वमेघ यज्ञ,
पूरी प्रथ्वी को कब्ज़ा का अद्भुत दर्प है.
तेज प्रतापी है यह पारावार उद्वेग्राहित,
भूला है कि कभी मुझे भी खाली होना है.
कहा नहीं कभी, कि जो प्राप्त है पर्याप्त है,
मानव जैसे मोह का अनंतर विष भंडार है.

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