आवारा श्वान : आशीर्वाद को आतुर
जब से नगर में सड़कों पर गाय गायब हुई है तब से गली के आवारा कुत्ता मण्डली की तो जैसे लॉटरी लग पड़ी है. कुछ कुत्ता प्रेम और कुछ वैधानिक निर्णय के चलते गली में व्यर्थ-भ्रमण के हामी ये कुकुर प्रजाति को ऐसी इम्यूनिटी (निरोध क्षमता) प्राप्त हुई है कि समाज की सर्वजीव-समभाव की पुरातन परंपरा के ध्वजवाहक यह शिकारी जाति हो गई है. कुत्तों के आवारापन पर अब कोई रोक नहीं है और ना ही प्रजनन पर कोई प्रभावी रोक दिखाई पड़ती है. घरों में बचने वाली रोटियां और हड्डियां इन आवारा चौपाये के उदरस्त होने का आसान उपाय है जो अब आसानी से उपलब्ध होने से खाना, सोना और प्रजनन करना तीनों ही पूर्ण हो जाते हैं.
गली में बच्चों का निकलना, महिलाओं का पैदल चलना या बुजुर्गों के घूमने की दैनिक घटना अब कुत्तों की दया पर ही निर्भर है जहां वह अपने बलिष्ठ शरीर के साथ दल बनाकर किसी को भी दौड़ाने के लिए आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं. मानव मन की व्यथा-कथा इतनी है कि ना तो नागरिक इन कुत्तों के प्रकोप से बचने का कोई प्रभावी कार्य कर पा रहे हैं और ना ही वे शासन पर उचित कार्यवाही का दबाव डाल पा रहे हैं. संभव हो कदाचित, तो कुत्तों की नसबंदी के लिए जारी मुहीम के अतिरिक्त, नगर के आवारा श्वान-दल की भी टीकाकरण की मुहिम चलायी जाये. नगर के कुत्ता प्रेमी एवं अधिकार हेतु जागरूक संरक्षक संस्थाएं और गैर-शासकीय संस्थाओं के माध्यम से किया जाना भी एक उपाय हो सकता है ताकि इंदौर के लाल अस्पताल में कुत्ता काटे से इंजेक्शन लगवाने के लिए आए नागरिकों को थोड़ी-बहुत सहायता हो सके. प्रश्न तो निरे आयेंगे कि आवारा कुत्ते को टीका कैसे लगेगा ? अभी नसबंदी के अभियान में कुत्ता पकड़ने का परिवाद दर्ज कराए जाने पर श्वान पकड़ने की गाड़ी के आते ही कुत्ते के श्रवण यंत्र में वह आवाज इस प्रकार दर्ज है कि वह गाड़ी की पकड़ में आने से पूर्व ही अपना इलाका बदल देते है. गाड़ी के जाने के संकेत होते ही कुत्ता गैंग वापस आ जाती हैं ओर इलाके पर कब्ज़ा पुनः कायम हो जाता है.
कुत्ता प्रेम उचित है और इसी प्रेम के चलते नागरिक अपने घरों में न केवल कुत्ते को पालते हैं बल्कि उसकी उचित सेवा सुश्रुषा और सुरक्षा भी करते हैं. बदनसीब तो नगर की गली के आवारा कुत्ते हैं जो उन निराकार कुत्ता प्रेमियों के प्रेम के हामी होते हैं जो स्वयं कुत्ता ना पाल सकते की स्थिति में घर में रात की बची रोटी को आवारा कुत्ते के स्वास्थ्य को पोषित करने के प्रयासों में रहते हैं. यही एक स्थिति है जिसके कारण नगर की हर गली में कुत्तों का प्रादुर्भाव है और साइकिल बाइक या पैदल किसी भी उपागम से आप यात्रा करें, कुत्तों की अचरज भरी निगाहों में आप हमेशा उपस्थित रहेंगे फिर चाहे उनके जवान दांतों में आपकी साड़ी आए, पजामा-पेंट आए या छोटे बच्चे साइकिल से गिर जाए और घायल हो जाए या दांत लग जाए तो चिकित्सकों या सरकारी अस्पतालों के चक्कर ही क्यों ना लगाना पड़े.
समस्या विकट है. वैधानिक नियम से इन्हें एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर छोड़ना संभव नहीं है. नसबंदी कठिन है, टीकाकरण और भी कठिन है. यह संतति बढ़ती जाएगी और अगले कुछ वर्षों में कुत्तों का आतंक आपको न केवल घर से बाहर निकलने में दो-चार बार सोचने पर मजबूर करेगा बल्कि आपके सुबह मैदान, बगीचे, पार्क में होने वाली फिटनेस ट्रेनिंग का पैदल दौड़-भाग का चालान ये आवारा कुत्तों का समूह इस तरह काट देगा कि आपकी आउटडोर में होने वाली गतिविधि न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाएगी. ऐसा होते ही मधुमेह, ब्लड प्रेशर जैसी जीवन शैली बीमारियों के प्रभावी नियंत्रण में कमी आएगी जिससे देश के जीडीपी पर प्रभाव पर बुरा प्रभाव तो पड़ेगा ही एक बड़ी संख्या फिटनेस के लिए असुरक्षित हो जाएगी. एक उपाय हो कदाचित कि रहवासी संघ ओर कॉलोनी संघ अपने निवास क्षेत्र में उपस्थित कुत्तों के लिए वे यह अनिवार्य करें कि हर घर एक आवारा कुत्ते को अपने घर में बांध ले और वही सेवा सुरक्षा करें जो प्रतिदिन प्रातः इन कुत्तों को भोजन द्वारा करते हैं या उन्हें पानी देने की पूरी व्यवस्था करते हैं. गली का आवारा कुत्ता बर्बर हो सकता है और यही कुत्ता यदि घर में पाल लिया जाए तो पर्याप्त अनुशासन से यही श्वान साहसी हो सकता है. पूरी रात, जो आवारा कुत्ते गली मोहल्ले में अपनी उपस्थिति उपलब्ध कराते रहते हैं यदि वह घर में रहे और समुचित प्रकार से पाल लिए जाएं तो न केवल आसुरी ताकतों से घर की सुरक्षा होगी बल्कि श्वान प्रेम की वह गंगा बहेगी कि हम एक उन्नत श्रेणी के भारतीय के रूप में भी स्थापित हो सकेंगे.
अमेरिकी नागरिक, डोर से बंधे अपने कुत्ते को मल-विसर्जन करा कर मल एकत्र कर एक निश्चित स्थान पर आपने हाथों से निपटान करते हैं. कहा गया है कि इस पृथ्वी पर श्वान एकमात्र प्राणी है जो अपने से ज्यादा अपने मालिक को प्यार करता है. आवारा कुत्ते का मालिक कोई नहीं होना चाहता जबकि कुत्ता भी चाहता है तो उसका मालिक आवारा ना हो और वह एक घर को जाए.
क्या आप इसके लिए तैयार है?
क्या सरकार प्रत्येक नागरिक को कुत्ता पालने के लिए अनिवार्य करने का कोई अधिनियम जारी करेगी?
क्या सरकार इस हेतु कोई राज सहायता इस संबंध में प्रस्तुत करेगी जिससे लोग अपने घरों को इन देसी स्वान प्रजाति से आलोकित और प्रकाशित कर सके
इससे न केवल आवारा कुत्तों को एक घर मिल जाएगा बल्कि घर को भी एक कुत्ता मिल जाएगा और गली से कुत्ते संभवत गायब हो जाएँ.
यह समस्या कुछ इतना विकट और विकराल रूप ले चुकी है कि इस समस्या पर चर्चा तो सब करना चाहते हैं कि ऐसा होना चाहिए या यह होना चाहिए, लेकिन वही नागरिक जो यह निरोध हेतु चर्चा करते हैं वह स्वयं बिस्कुट, डॉग-फीड और रोटियां सुबह-सुबह थैलों में भरकर ले आते हैं और जवान बूढ़े और पप्पू कुत्तों को भरपूर मात्रा में परोसते हैं.
कुत्ता भोजन केंद्र एक स्थान पर नियत कर दें जहां सभी कुत्ता प्रेमी अपने घर का बच्चा हुआ भोजन रखें तो एक नई समस्या खड़ी होती है. कुत्ते एक बड़ी संख्या में वहां उपस्थित हो आपस में भी लड़ते हैं और भगदड़ उत्पन्न होती है. पैदल चलने वाले इधर-उधर भागते हैं और कुत्तो की लड़ाई-झगड़े में उत्पन्न हुआ, एड्रीनलीन हार्मोन इतनी उत्तेजना दे देता है कि आवारापन के हामी कुत्ते के रास्ते में आने वाला पांव उनके दांतों में उलझ जाते हैं. अब आशीर्वाद कौन दे रहा है यह आप जाने, कुत्ता आशीर्वाद दे रहा है या भोजन देने वाला.
यह समझना होगा कि डॉग-बाइट हो जाने पर चिकित्सा विज्ञान द्वारा रेबीस से बचाव ले इंजेक्शन लगाए जाने का प्रावधान है और यदि कुत्तों के साथ निरंतर रहने वाले लोग इस तरह की रिस्क से बचना चाहते हैं तो जंतुजनित संक्रमण से बचाव के टीके हर वर्ष लगाने होंगे और कुत्ते को भी हर वर्ष एंटीरेबीज इंजेक्शन से टीकाकरण कराना भी सुनिश्चित करना होगा. लगभग असंभव हो कदाचित यह परंतु प्रयास तो किया ही जा सकते हैं.

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