Maheshwar : River Side

नर्मदा तीरे महेश्वर धाम

दो बरस पूर्व नवंबर माह में जब मैं अपने भाइयों के साथ इंदौर के दक्षिण पश्चिम में स्थित 90 किलोमीटर दूर नर्मदा नदी के तट पर महेश्वर नगर में पूज्य मां के देह त्याग उपरांत अस्थि विसर्जन के प्रयोजन को गया तो ऐसा प्रतीत हुआ कि मां नर्मदा अपने निर्जल मन से पावन जल में मेरी जननी को आत्मसात कर रही है. अस्थियां तो तिरोहित हो गई परंतु महेश्वर में नर्मदा माई का रूप और स्वरूप आंखों अद्भुत रूप से अंकित हो गया. समझ नहीं पाया कि जो नैनों को भा जाता है वह बार-बार क्यों आकर्षित करता है? यौवन अवस्था में इस देह-आकर्षण का दोष प्रस्फुटित होते हार्मोन को दिया जा सकता है परंतु नर्मदा के साथ एक रूप दर्शन का आकर्षण मन कर्म और भाव की अद्भुत अद्वितीय अनुभूति प्रस्तुत कर ही देता है. गत वर्ष की मेरी नर्मदा महेश्वर धाम यात्रा भी ऐसा ही आकर्षण यात्रा थी और इस बार तो ऐसा प्रतीत हुआ कि इस बार तो जैसे मां नर्मदा ही मुझे बुला ही रही थी कि आ जा पुत्र देख जा तेरी तिरोहित मां को और अनंत काल से जीवन का सार बिखराती जूनी नदी मां को... अनंत काल से पुरानी इस नदी मां को इस शनिवार की यात्रा का योग हुआ. मुझे घाट दर्शन के साथ-साथ सहस्त्रधारा दर्शन व नदी के दो पाटों के मध्य स्थित महेश्वर नगर की महारानी रानी अहिल्यादेवी होलकर के द्वारा 350 वर्ष पूर्व स्थापित छोटे से शिवलिंग-नुमा मंदिर में महादेव के शिवलिंग के दर्शन का भी लाभ मिला. अर्वाचीन काल से नदियों के किनारे पर ही नगर संस्कृति विकसित होती थी और नर्मदा नदी के किनारे स्थित महेश्वर नगर के वैभव संपन्नता और यशस्वी नेतृत्व का अंदाज स्वयं देखकर ही लगाया जा सकता है जो माहिष्मती नगर के किले, द्वार, भवन, मंदिर और किले की दीवारों पर स्थित सैनिकों के प्रस्तर-कलाकारी, हाथी-घोड़े, फूल-बूटे तथा पत्थरों पर अन्य नक्काशी देखकर नैन और मन दोनों ही विस्मित हो जाते हैं. संलग्न चित्रों में आपको किले के दीवार के प्रस्तर पर उकेरी गई कला में अद्भुत संयोजन व वर्गाकार या आयताकार रूप में समानता भी दिखाई पड़ती है. कुछ मूर्तियां आक्रांता द्वारा तोड़ी गई हैं तो कुछ अपने पूर्ण रूप में शेष हैं जिनमें विशाल प्रवेश द्वार के दाएं स्थित भव्य मंदिर की छत पर पालथी मारकर बैठी एक मूर्ति तो सजीव चित्रण प्रस्तुत करती है जैसे हंसते हुए बुद्ध अपने स्थान पर जगमगा रहे हो. किले की बाहरी दीवार पर कुछ परकोटे बने हैं जो नियमित आयताकार और चौकोर वर्ग से बने हुए हैं जहां मेरी बेटी आकांक्षा उस पर बैठ गई तो एक आदर्श और दर्शनीय चित्र क्लिक हुआ जैसे 300 वर्ष पुराना स्टूडियो का यह कोई ठिकाना हो या उस काल का सेल्फी प्वाइंट हो. चमकती धूप, दमकती जलधारा और महकती हवा का सानिध्य नर्मदा तीरे पर हो तो यह आध्यात्मिक भाव धीरे से मन-मस्तिष्क में उतर आता है और कहीं कोने में हृदय के एक कोने में कृतज्ञता का स्वर्णिम भाव भी जागृत हो जाता है जो न जाने क्यों मानव मन स्वीकार नहीं कर पाता, कह नहीं पाता, सोच नहीं पाता परंतु रहता जरूर है, मन में चाहे वह मन राम हो अथवा रावण हो. नर्मदा मैया की 1312 किलोमीटर की दोनों की परिक्रमा करने का रिवाज है जो 3 वर्ष 3 माह 13 दिन में पूर्ण होने का पारंपरिक कथन है जिसमें आस्था-अनुरागी बारिश के चर माह में स्थगित रखते हुए यह यात्रा पूर्ण करते हैं. आधुनिक काल में बस-टैक्सी और दो पहिया वाहन से भी यह यात्रा की जा रही है जो लगभग 15 से 20 दिनों में भी पूर्ण हो जाती है जिस स्थान से आप शुरू करें उसी स्थान पर समाप्त करने के भी नर्मदा मैया को अपने दाएं हाथ पर रखते हुए समाप्त करने के स्थापित परंपराएं हैं. नर्मदा नदी मां के अनन्य भक्त और लेखक जबलपुर वासी श्री अमृतलाल जी वेगड़ नेयह यात्रा परिक्रमा यात्रा कई वर्षों में पूर्ण की थी. उनकी पुस्तक, सौंदर्य की नदी नर्मदा, में महेश्वर धाम में नर्मदा के सौंदर्य का अद्भुत वर्णन मिलता है जो महेश्वर घाट से 3.30 किलोमीटर पश्चिम में सहस्त्र-धारा के नाम से प्रसिद्ध है. घाट से नाव की सवारी कर सहत्र-धारा के समीप पहुंचा जाता है. नाव से उतरकर 400 मीटर की दूरी पर नदी के किनारे-किनारे पैदल चलते हुए जाने पर यह अनुपम अद्वितीय अकल्पनीय और अतुलनीय दृश्य के दर्शन होते ही आप स्तब्ध खड़े रह जाते हैं, जब मां नर्मदा नदी अपने आप को धीमा कर पत्थरों के बीच में अहिस्ता से चलते हुए धीमे और कर्णप्रिय वाद्य-स्वर के साथ बहती हैं. सूर्य का पर्याप्त प्रकाश हो तो यह हजार-धारा का दृश्य नेत्रों में वह मन में कौतूहल भर देता है जो आपको निर्विकार भाव से मौन के आगोश में भर कानों में कल-कल बहता मिश्री सा मीठा स्वर से आलोकित कर देता है. यदि आप उस क्षण मौन हो जाएं और संभव हो तो विचार शून्य हो जाएं तो प्रकृति की इस अनुपम लीला रचना का सिंहनाद से आप का साक्षात्कार हो सकता है और यदि आप थोड़े से संवेदनशील हो तो नदी मां का आर्तनाद का भी आप श्रवण कर सकते हैं. सहस्त्रधारा नाम में ही अर्थ निहित है और यह निर्मल दृश्य दर्शन आपको प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव से परिचित करा सकता है. यह दृश्य अलौकिकता की एक छोटी सी झलक से इस पावन और पवित्र अनादि काल से पोषक नदी के पथ संचलन से आप को अभिभूत कर देता है. विवाद का विषय हो सकता है कि मां गंगा और मां नर्मदा की उत्पत्ति पहले किसकी हुई परंतु यह निर्विवाद सत्य है कि नदी के विभिन्न पथों ने सदा से सूर्य की भांति जीवन को जीवन दिया है और वापसी में कुछ भी नहीं चाहा है या मांगा है जबकि यह नदी-यात्रा का अविकल संदेश देकर समुद्र में लीन होने को मार्गों ओर नगरों से समर्पित हो जाती हैं. महेश्वर की नदी के दोनों किनारों के मध्य में थोड़ा सा हिस्सा पथरीला है जहां रानी अहिल्याबाई होल्कर ने एक छोटा सा महादेव मंदिर बनवाया था. इस मंदिर की प्राचीर पर बैठकर असीम शांति की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है जहां चारों ओर जल ही जल बहता हुआ दिखाई देता है. बारिश के मौसम में बाढ़ आने पर यह मंदिर डूब जाता है जहां कहा जाता है कि नर्मदा महादेव को चरण स्पर्श कर अपने महाभूत तत्व से जलाभिषेक कर देती हैं. कल्पनाएं कदाचित अविश्वसनीय प्रतीत होती हो परंतु वास्तविकता अधिक कल्पनातीत प्रतीत होती है जो बिना बिजली बिना पंप बिना मोटर गुप्त-विज्ञान के नियमों के अमरकंटक से जलधारा को 1312 किलोमीटर तक सदियों से बहने दे देती है. केवट कृष्णा ने हृदय केस निश्चल भाव से दर्शन कराए और महेश्वर घाट के विहंगम सम्मुख दर्शन में भी सहयोग दिया. दाल बाफले का भोजन भी उपलब्ध हो गया था ऐसा लगा जैसे तीर्थ यात्रा संपन्न हुई

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