मूवी रिव्यू: Dry Day
Every saint has a past and every sinner has a future.
Or
It’s not important that adults produce Children but its children who produce Adults.
Or
Alcohol is bad omen but Politics is even worse!
कदाचित ये मुहावरे इस कथाचित्र पर सही बैठते हों.
अमेजॉन प्राइम पर ड्राई डे चलचित्र के अवलोकन का अवसर हुआ जिसमें पंचायत फेम जितेंद्र कुमार और अन्य कलाकारों ने एक ग्रामीण परिदृश्य में राजनीति और सामाजिक बुराइयों का वह चित्र प्रस्तुत किया है कि आप अभिभूत हुए बिना नहीं रह पाते हैं. शिक्षक पिता की पुत्री द्वारा एक राजनीतिक गुंडे के रूप में अपने पति को सुधारने के प्रयासों से सजी यह प्रस्तुति सम्मोहक है.
शराब सेवन की बुराइयों से गरीब तबके में शराब से पनपती अतिगरीबी के बावजूद नशाबंदी की महिम का आशावाद न केवल आकर्षित करता है बल्कि राजनीति के स्वार्थ, घृणा, विवाद और षड्यंत्र के विभिन्न पहलुओं को प्रकाशित भी करती है.
कई बार लगता है कि राजनीति, शतरंज के 64 चौसर मे बिछा द्वंदयुद्ध है या अखाड़े का मल युद्ध है.
आपको अह्सास होगा कि खुले में यह शतरंज है तो बन्द कमरे में मल्ल युद्ध है.
पार्षद के चुनाव में खड़े होने को लालायित, जितेंद्र कुमार का अभिनय हमेशा की तरह उच्च कोटि का है जो अपने होने वाले शिशु के समक्ष एक राजनीतिक गुंडे के बाप कहलाने के लिए कतई राजी नहीं है.
और शराब सेवन का घोर आदी होने के बावजूद अभिनेता द्वारा शराब की परिभाषा सत्यानाशी कर देने के उपरांत आमरण अनशन पर गाइड के देवानंद होने को आतुर हो जाते हैं.
राजनीतिक उतार चढ़ाव से सजी यह कहानी बीच में उग्र और गम्भीर हो जाती है और अंत बड़ा ही अद्भुत बन पड़ा है जो आपको देखने के लिए लालायित भी करेगा.
देखने योग्य है Dry Day.

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