Temple of Eternity: Mahakaal

अवंतिका में महाकाल मंदिर – नये स्वरूप में लीला सौंदर्य


(यात्रा वृतांत)


अनंत काल से संस्कृतियां और मानव-समाज की धार्मिक और अध्यात्मिक अवधारणायें उपस्थित है और संभवतः सर्वशक्तिमान ईश्वर की कल्पना, काल से पूर्व की अवधि से शाश्वत रूप से उपस्थित है. समय से विस्तृत, ईश्वर की परिकल्पना मानव की बुद्धि से परे होने पर ही संभवतः “महाकाल” की अवधारणा अवतरित हुई है. अनंत काल से इस पृथ्वी पर काशी और अवंतिका जैसी नगरी अपना अस्तित्व इतिहास के रूप में काल रूपी शिव की उपस्थिति बनी रही है जो मानव मन की धरोहर के रूप में संस्कृतियों में प्रसारित होती रही. ऐसी ही एक पवित्र स्थली उज्जैन के रुद्रसागर झील परिसर में महाकालेश्वर-मंदिर के रूप में उपस्थित है जहां अर्वाचीन-काल से विशाल और सिद्ध शिवलिंग स्थापित है जो सनातनियों के बल, बुद्धि, कौशल और आध्यात्मिकता जैसे सुधि विचारों का शीतल स्त्रोत है. महाकाल मंदिर में अनादिकाल से स्थापित इस शिवलिंग में जनमानस की अद्भुत आस्था है जो प्रतीकात्मक शिवलिंग के महाकाल रूप में आलोकित एवं प्रदर्शित है.


अभी हाल में महाकाल मंदिर परिसर का कायाकल्प हुआ है और सौभाग्यवश महाकाल गर्भग्रह में दर्शन उपरांत महाकाल-लोक का दर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ. यह अनुभव प्रत्येक भारतीय सनातनी को द्रवित कर देगा जिसमें शिव की पुराण कथाओं का दर्शनीय चित्रण किया गया है जो हमारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री जी के सपने को प्रदर्शित करता है. समुद्र मंथन उपरांत निकले विष का पान करते शिव-भोले की अनन्य प्रतिमा बड़ी रोचक बन पड़ी है जो मंत्रमुग्ध कर संदेश देती है कि जीवन, मंथन में उत्पन्न होगा और विषपान भी करना होगा क्योंकि प्रत्येक मानव का सनातन कर्तव्य सेवा ही तो है. रावण के 10 शीर्ष व 10 बाहु की मूर्ति के हिमालय रूपी शिवलोक को उठा लेने का मूर्तिचित्र आश्चर्यचकित कर देता है कि किस प्रकार एक साधारण मानव भी अपनी भक्ति और प्रेम भाव से ईश्वर महाकाल को भी हिला सकता है तथा ईश्वर भी भक्तों के प्रेम में आकंठ डूबने को कदाचित सदा उपस्थित हो जाते हैं.


सर्वशक्तिमान सत्ता को आप चाहे जिस रूप स्वरूप में माने या ना माने ईश्वर की उपस्थिति पंचतत्व में आदि-पुरुष, आदि-शक्ति दुर्गा, कार्तिकेय, प्रथम पूज्य गणेश और सदा से प्रतीक्षारत नंदी देव में आलोकित प्रतीत होती है. कहा जाता है कि चित्र, हजार शब्द कहते हैं और महाकाल लोक मेंखुले आसमान के नीचे स्थित मूर्तियों का विहंगम द्रश्य इस कथन को चरितार्थ करते हुए आपको मुग्ध कर देता है. नंदीदेव पर विराजित शिव की बारात का मूर्ति चित्र खुले आसमान के नीचे जीवन को यौवन सा प्रदर्शित कर देता है जो शिव जैसे योगी को भी नियम रूप में करना है. माया महाठगनी के ब्रह्मवाक्य को इस मूर्तिचित्र के माध्यम से शिव-बारात प्रदर्शित करती है जो शिव के शक्तिस्वरूपा पार्वती से मिलन का प्रतीक है जो प्रकृति के भौतिक ओर पुरुष के मनोवैज्ञानिक स्वरुपा है . सुधिमानस चित्त हर प्रकार से सोचने को विवश हो जाता है जैसे शिव-पार्वती महाशिवरात्रि को होती है वह मानव के मोक्ष की आकांक्षा उर्जा रूपी आदिशक्ति से संभव है?


घोड़े के खुले वन में दौड़ने की भांति विचारों की झड़ी इस महाकाल लोक में आपको भाव-विव्हल होने से रोक नहीं पाती है और वास्तविक माया और आभासी मोक्ष के मध्य यह बारात रुपी जीवन आपकी आंखें नम किए बिना प्रस्तुत नहीं होता है. सप्त ऋषि और नवग्रह से संपन्न यह महाकाल लोक आपकी हमारी नई पीढ़ी को पुरातन काल से उपलब्ध ऋषि रूपी वैज्ञानिकों से जीवन का अद्भुत साक्षात्कार करा देती है. श्री श्री वशिष्ठ, गौतम, भारद्वाज, विश्वामित्र, अत्री, जमदग्नि, कश्यप ऋषियों ने ही पृथ्वी के रहस्य और समाज के नैतिक नियमों को प्रतिपादित किया है. नवग्रह हमारे पूजा कर्मकांड में सदैव स्थान पाते रहे हैं जो यहां महाकाल लोक में भी अपनी गरिमामई उपस्थिति से प्रकाशित है. शिव के गणों में मुख्य देव काल-भैरव भी अपने वाहन श्वान पर विराजित हो उपस्थित कराए गए हैं. शिव के द्वारपाल अष्ठभुजाधारी वीरभद्र देव के द्वारा राजा दक्ष का शिरच्छेदन का मूर्तिचित्र, लोमहर्षक प्रतीत होता है. शांत भाव से आलोकित एक अन्य नैनाकर्षक मूर्ति अति दर्शनीय है जो गहरे पीतवर्ण में प्रकाशित है. यह मूर्ति शिवपुत्र कार्तिकेय के गंभीर स्वभाव के विभिन्न रूपों को प्रदर्शित करती है.

इस महाकाल लोक के परिसर में स्थापित विभिन्न मूर्तियों से भिन्न एक विशाल मूर्ति अद्भुत बन पड़ी है जो त्रिपुरासुर संहार की है जिसमें महाप्रभु ब्रह्मा जी के रथ संचलन में महाकाल प्रभु ने पाशुपतास्त्र का संधान किया है जिसके द्वारा त्रिपुरासुर के तीन असुर भाइयों का विनाश संभव हो पाया था. यह विहंगम दृश्य आपको निःशब्द कर देता है और आप स्थितप्रज्ञ हो इस मूर्ति रूप से निर्वचनीय कथा का रसास्वादन करते चले जाते हैं जैसे इस संहार की कथा आपके मन के नेपथ्य में गूंजती रहती है. इस भव्य मूर्ति को देख शिव प्रभु के जीवन के मूल्यों की शुचिता को बनाए रखने हेतु संहार की अवधारणा को समझा जा सकता है. त्रिपुरासुर के असुर धार्मिक थे परंतु शक्ति और माया में भर जाने से माया में खो गए जिससे उनका संहार करने महामानव को स्वयं उपस्थित होना पड़ा था. महामना और प्रथमपूज्य गजानन महाराज की मूर्ति अद्भुत रूप से वायुशैली में स्थापित है जिसमें श्री गणेश भगवान के दोनों पैर नृत्य शैली में हवा में अवस्थित हैं. एक और विशाल प्रतिमा शिव भोले की चतुर्भुज दक्षिण मुकुटधारी मनमोहक है जिसे देख आप की नमो नमः कहे बिना नहीं रह पाते हैं. इसके अतिरिक्त समाधिस्थ शिव की मूर्ति अतिविशाल है जो हिमालय में कहीं शिव के ध्यान मग्न हो परमानंद की अवस्था में प्रस्तुत होती प्रतीत होती है. साधुमन को यह प्रस्तुति ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या के बौद्ध-सोच का आधार बन जाती है और ऐसी कई मूर्तियों को देख शिव-पुराण में वर्णित शिवलीला का प्रस्तुतीकरण विस्मय से भर देता है और आप धार्मिकता की अग्रणी अवस्था या ने आध्यात्मिक हुए बिना नहीं रह पाते हैं.


झील के चारों ओर स्थित यह पवित्र लोक सनातनियों के आकर्षण के मुख्य केंद्र बिंदु हो गया है जहाँ महाकाल के गर्भगृह में दर्शन के साथ स्वर्ण आच्छादित शीर्ष कलश के दर्शन मोहक हैं ओर आप सम्मोहित हुए बिना नहीं रहते हैं. रात्रि काल में भी इस लोक में की गई विद्युत सज्जा से एक अद्भुत द्रश्य उपस्थित हो पड़ता है जो नैनों को ओर मानस को द्रष्टि, द्रष्टा ओर द्रश्य के त्रिकोण में आनंदित कर देता है.

कसक बस यह रही कि श्रद्धालुओं की संख्या अधिक होने से व्यवस्था चरमरा जाती है. हर शिव भक्त चाहता है कि उसे गर्भगृह में महांकाल शिवलिंग के दर्शन और स्पर्श हो जायें परंतु आम श्रद्धालु के लिए यह निकट भविष्य में तो संभव प्रतीत होता नहीं है . प्रशासन भी गर्भगृह में तथा भस्मार्ती में उपस्थिति की ऑनलाइन व्यवस्था करता है परंतु असफल प्रयासों से असंतोष उत्पन्न हो रहा है. इस पूरे प्रयास में आम व्यक्ति की श्रद्धा को अनावश्यक ठेस लग रही है.

सुझाव-

गर्भगृह को छोड़ मंदिर के चारों ओर के निर्माण को परिष्कृत किया जाने के बिंदुओं पर विचार किया जाना चाहिए ताकि श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या न केवल त्वरित दर्शन प्राप्त कर सके, प्रतीक्षा पंक्ति छोटी रहे और उज्जैन के निवासी जो प्रतिदिन दर्शन के अभिलाषी होते हैं उन्हें भी सुविधा हो.

प्रशासन को भीड़ नियंत्रण में निष्णात संस्थानों से सलाह लेकर कार्य करना चाहिए

वी आई पी संस्कृति को इस प्रकार परिवर्तित करना चाहिए याने दर्शन इतनी तेज गति से हों कि वी आई पी भी आम व्यक्ति की पंक्ति वीआईपी प्रवेश की उपयोगिता समाप्त हो जाये.

किसी भी धर्मस्थल में सशुल्क दर्शनों की परंपरा का निर्वहन बंद होना ही धर्म को सुदृढ़ करेगा. मंदिर में दर्शन निःशुल्क हों यथा महाकाल लोक के भ्रमण हेतु शुल्क उचित होगा

क्या प्रशासन और धर्मगुरु गण इस और ध्यान देंगे ?

Leave a comment

Blog at WordPress.com.

Up ↑