डॉक्टर की व्यथा कथा
कर्म हमें सौंपा है,
ईश्वर के जैसा है
मानव जीवन रहें स्वस्थ
रखने का जैसा है.
शरीर विज्ञान पढ़े जो,
झुक झुक जाते हैं
संशय से भरे
प्रयोग सदा करते जाते हैं
यह मशीन नौ माह में
प्रकृति ने बनाई है
जटिल रचना इसकी
थोड़ी हमने समझ पाई है
धमनी शिरा नाड़ी
मन हृदय मस्तिष्क
अंदर क्या है घटित है
दुविधा में रहे चिकित्सक
जो हाथ लगे रोगी चंगे हो
तो भरपूर मान पाई
समय ऐसा आया
मरे मरीज तो ये कूटा जाए
धीरज आस्था विश्वास
सब खोया कलयुग ने
चिकित्सक अपमान पाएंगे
नहीं सोचा था किसी ने
बढ़ी आमदनी पैसा अपार
चाहिए उपचार निशुल्क
शिक्षक और वैद्य की
सम्मान नहीं करें मुल्क
पथ पर दुर्घटना में
हलाक़ हों तो गम नहीं
नियति मान सह लेते
जिम्मेदार नगर निगम नहीं
उम्र पूरी हो घर में
अवसान का स्वागत है
जो अस्पताल में हो निधन
तो डॉक्टर का पीटना तय है
लाखों की दवाई खाली
अंतर विशेष न आया
बीमारी को दोष नहीं
कूटने को डॉक्टर बुलाया
चिकित्सा विज्ञान गणित नहीं
जहाँ दो और दो होते चार
हर रचना भिन्न है
नहीं समझे से समझदार
पहले कहे जाते थे ईश्वर
ये डॉक्टर भी कभी
अब दोषी ठहराए जाते हैं
जैसे अमर हो सभी
कौरव की भांति सब
रोगी होते ही क्रोधित
उपचार में महंगाई देख
डॉक्टर को करें शोधित
कब यह सिलसिला थमेगा
धीरज का फूल खिलेगा है
है निजी उपचार महंगा तो
सरकारी में सस्ता पड़ेगा
सोच ये बदलना होगी
उपचार सस्ता नहीं
सस्ते में सुविधा नहीं
सरकारी में रोगी हँसता नहीं
जो मानो चिकित्सा को सेवा
तो आगे हो तुम
सस्ता अस्पताल बनाते नहीं
नहीं तो सस्ता उपचार कराते
समाज का ही हुआ है पतन
नैतिकता अब रही नहीं
इलाज तो मुफ्त मिले
क्या उसमें लागत नहीं
किडनी बदलें और हृदय भी
भले हूँ मैं जमानती और अपराधी
सरकार की मैं धरोहर
मुफ्त का मैं सदा अधिकारी
जो गर्मी गुस्सा यहाँ
वैद्यकी पर दिखाते
क्या एक शब्द भी
पुलिस थाने में कह पाते…..

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