सरकारी अस्पताल में, मैं व्यवस्था का राउंड ले रहा था कि एक जवान सज्जन मेरे सामने उपस्थित हो गए,
....क्या डॉक्टर साहब आपकी ओपीडी में कंडोम तक नहीं है !!
लॉकडाउन के बाद की स्थिति के कारण हमारे कंडोम सप्लाई में बाधा आई है इसलिए कंडोम नहीं है, ऐसा मैंने जवाब दिया.
फिर भी मैंने सिस्टर से पूछा, सिस्टर, देखिए जरा स्टोर में...
सिस्टर लपकती हुई स्टोर गई, एक डब्बा मिल गया मैंने डब्बा खोला, कहा, जितने चाहिए आपको ले लीजिए उन्होंने कंडोम ले लिए और उनके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई समस्या का निदान और निवारण दोनों हो गया मुझे भी अच्छा लगा और डिब्बा मैंने सामूहिक वितरण के लिए एक स्थान पर रखवा दिया. दोपहर की चाय के समय जो हम सब बैठे तो मैंने सिस्टर से कहा कि सिस्टर आपकी स्टोर में जो है उस पर एक निगाह रखा कीजिए हमेशा, कोई चीज बचने ना पाए
तो सिस्टर कहने लगी,क्या बताऊं सर आपको, आप हसेंगे वह मरीज यहां से कंडोम लेकर गया और आधा घंटे बाद वापस कर गया कि यह तो एक्सपायरी डेट के हैं.चाय का कप हाथ से छूट गया हंसी और आंख में आंसू दोनों एक साथ आ गए. हे भगवान कितना जागरूक है आज का भारतीय जो निरोध की भी एक्सपायरी डेट देख रहा है.
खैर बहुत बातें हुई लेकिन मस्तिष्क में कहीं छप गया कि, ज्ञान मिलते से ही जतलाना क्यों अनिवार्य हो जाता है!!
समाज को पता है है कि हर एक वस्तु की एक एक्सपायरी डेट है, परंतु यह एक्सपायरी डेट पता नहीं है कि किसकी कब है। पृथ्वी और सूरज की भी अवसान तिथि है भले वह आज से 5000 बरस बाद हो। मानव समेत प्रत्येक जीवमात्र की भी अंतिम दिनांक एक मोटे अंदाज में नियत है। तितली 14 दिन, चिड़िया 2 बरस, कुत्ता 14 बरस, शेर चीता बाघ 16 बरस तो हाथी 75 और मानव 100। यहां तक कि निर्जीव वस्तु की भी उम्र है बेहतरीन लोहे से बनी वस्तु भी 100-200 बरस में भंगार हो जाती है।
लेकिन सबसे विचित्र है दवाई की एक्सपायरी डेट...ये दिनांक के समाप्त होते ही भारत में विष तत्व के रूप में स्वयम्भू घोषित कर दी जाती है। जबकि समझने की बात यह है कि एक्सपायरी डेट वाकई में शेल्फ लाइफ का परिचायक है। कोई भी नई औषधि बाजार में आने के पूर्व, पर्याप्त रिसर्च के द्वारा खराब होने के काल की गणना के बाद ही कमर्शियल रूप से पैक की जाती है। वैक्यूम टाइट पैक में टेबलेट/कैप्सूल आदि लंबे समय तक नमी से सुरक्षित रहकर अपनी पोटेंसी और टेक्सचर कायम रख लेते हैं। लिक्विड / एलिक्सिर / सिरप आदि की शेल्फ लाइफ कम होती है फिर भी उचित प्रिसरवेटिव के सहारे अपनी कार्य क्षमता बनाये रखते हैं। एक्सपायरी डेट आ जाने पर भी इन औषधि की शेल्फ लाइफ समाप्त होने से कई बार इस दवाई को रीसायकल किये जाने के प्रावधान भी है. जबकि अमूमन ये औषधि नष्ट कर दी जाती हैं. औषधि के निर्माण के समय उसकी पोटेंसी याने कार्य क्षमता 100% के आसपास रखे जाने के स्थापित नियम हैं जो 95 से 105% के मध्य तक हो सकती है. केमिकल एनालिसिस में ये मापदंड जांचे जाते हैं. और कोई भी व्यक्ति इन दवाई की शुद्धता की जाँच करा सकता है. अवसान तिथि के आने पर इन औषधियों की पोटेंसी घट कर 90% या 80% तक रह जाने की सम्भावना अवश्य होती है. किन्तु कोई भी औषधि अवसान तिथि के गुजर जाने के बाद विष नहीं बन जाती है या कोई नए दुस्प्रभाव नहीं पैदा कर देती है. यह भी हो सकता कि अवसानीत औषधि का वह उपचार-प्रभाव ना आ पाए जो उससे अपेक्षित है.
हालाँकि कुछ एंटीबायोटिक्स इसके अपवाद है जिन्हें अवसान तिथि के बाद लेने से कुछ बीमारी पैदा हो सकने की सम्भावना हैं लेकिन ऐसी औषधि अब प्रचलन से कमोबेश बाहर हैं और नयी औषधियां अधिक सुरक्षित है. यह बात अवश्य है कि यदि टेबलेट/कैप्सूल का पैकिंग ख़राब हो जाये या पंचर हो जाये और हवा, आर्द्रता पानी मिल जाये या दवाई की शीशी खुल जाये कोई मलिन पदार्थ उसमें गिर कर मिल जाये तो औषधि के चाहे गए असर पैदा करने वाले तत्व अपना प्रभाव नहीं पैदा कर पाएंगे और मेटाबोलिज्म की स्थापित क्रिया द्वारा शरीर से बाहर कर दिए जायेंगे. पैकिंग के ख़राब हो जाने से औषधि न लेने की सलाह सामान्य ज्ञान से रखी जाना अनिवार्य है. आकस्मिकता की स्थिति में भी अवसानित औषधि के सेवन की सलाह नहीं दे जाती है
प्रत्येक नयी औषधि को व्यावसायिक रूप से प्रस्तुत करने के पहले ट्रायल का एक समय बद्ध कार्यक्रम पूर्ण किया जाता है जिसके अनुसार चूहे/ गिनी पिग/ बंदर में जैसे जानवरों में औषधि या वैक्सीन के प्रभाव देखे जाते हैं. इसके बाद ही मानवों में प्रयोग किये जाते है. इस पूरी प्रक्रिया में सालोंसाल लग जाते हैं. इसी दौरान इन औषधियों के अवसान तिथि की गणना भी की जाती है. कुछ औषधि एक साल के अवसान तिथि लिए होती हैं जैसे ओ. आर. एस. (जीवन रक्षक घोल) के पाउडर और विटामिन की गोलियां. अमूमन औषधि की पोटेंसी निर्माण तिथि से 3 बरसों तक कायम रह जाती है. इसका यह तात्पर्य नहीं है कि आप एक्सपायरी डेट की दवाई संभल के रखे रहें और प्रयोग में लेते रहें.
दवाई खरीदते समय देखे जाने वाली बातें :
· जो दवाई जिस नाम से आपके चिकित्सक ने लिखी है वह आपके चिकित्सक का उस दवाई विशेष में भरोसा दर्शाती हैं तो आप को ध्यान रखना होगा कि जो लिखी गयी औषधि है आपको वही प्राप्त हो. केमिस्ट के यह कहने पर कि यह दूसरी कंपनी की वही दवाई है तो ऐसी दवाई को लेने से इनकार करना आपका अधिकार है.
· दवाई क्रय करते समय औषधि का नाम, बैच नंबर और अवसान तिथि अनिवार्य रूप से देखे जाने चाहिए. आम तौर पर थोड़े अतिरिक्त लाभ के लिए आपके दवाई विक्रेता पुरानी दवाई भी बेच सकते हैं.
· दवाई की शीशी की जाँच कर लें की वह खुली हुई शीशी तो नहीं है.
· इन्सुलिन खरीदते समय जो इन्सुलिन आप पहले से ले रहे हैं वह रंग याद रखे और उसी रंग से मैच अवश्य कर लें.
· इन्सुलिन इंजेक्शन 40 और 100 यूनिट प्रति एम.एल. में आते हैं तो केमिस्ट को स्पष्ट निर्देश दें कि किस ताकत की औषधि/इन्सुलिन आपको चाहिए.
· मधुमेह के रोगी प्रोटीन/ कफ सिरप/ टॉनिक आदि शुगर फ्री भी उपलब्ध हैं तो अपने केमिस्ट से स्पष्ट मांग कीजिये की मुझे शुगर फ्री उत्पाद चाहिए.
· इंजेक्शन के कांच के वायल में उपलब्ध होते हैं तथा उन्हें लूज़ प्राप्त नहीं करना चाहिए
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